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हिंसा कलंक कई, और उठा पहला कदम

बलबीर पुंज
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हाल में दिल्ली उच्च न्यायालय ने 1984 की सिख विरोधी हिंसा में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रहे सज्जन कुमार को उम्रकैद की सजा सुनाई है। इससे पहले संबंधित एक अन्य मामले में भी अदालत ने दो दोषियों की सजा की घोषणा की थी, जिसमें एक को फांसी की सजा हुई थी। बीते 34 वर्षों में इस मामले में जिस प्रकार और जिस गति से दोषियों को सजा मिल रही है, उससे पीड़ित पक्षों को केवल आधा-अधूरा न्याय ही मिला है- क्योंकि इस सामूहिक हत्याकांड में शामिल कई अन्य अपराधी आज भी जीवित है और बाहर घूम रहे है। उम्मीद है कि आने वाले समय में इस हिंसा का दंश झेल चुके हजारों सिख परिवारों को पूरा और निर्णायक न्याय मिलेगा। 

यह किसी विडंबना से कम नहीं है कि जब कोई अकेला व्यक्ति किसी आपराधिक कृत्य में लिप्त पाया जाता है या उसपर हत्या और बलात्कार जैसे घिनौने अपराध का आरोप लगता है- तब अक्सर अपराधी/आरोपी अल्पकाल में कानून की पकड़ में आ जाता है और एक समय बाद अदालत ने उसकी उपयुक्त सजा भारतीय दंड संहिता के अनुरूप निर्धारित भी कर देती है। किंतु सामूहिक हत्याकांड या सामूहिक जघन्य अपराधों में ऐसा कदाचित ही संभव हो पाता है। 1984 का घटनाक्रम उसका ही एक प्रमाण है। 

लगभग साढ़े तीन दशक पहले घटी सिख विरोधी हिंसा को दंगा कहना उचित नहीं होगा, क्योंकि वह एकतरफा सामूहिक नरसंहार था। 31 अक्टूबर 1984 को अपने दो सिख सुरक्षाबलों द्वारा तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की निर्मम हत्या के बाद दिल्ली और उसके आसपास के दर्जनभर क्षेत्रों में भड़की हिंसा में हजारों निरपराध सिखों को निशाना बनाया गया। अकेले दिल्ली में 3,000-5,000 सिखों को प्रायोजित हिंसा में मौत के घाट उतार दिया गया,  दर्जनों महिलाओं का बलात्कार हुआ, तो हजारों सिख विस्थापित हो गए। 

बात यहां केवल 1984 की सिख विरोधी हिंसा तक सीमित नहीं है। उसी कालखंड में जम्मू-कश्मीर में हिंदुओं को भी चिन्हित करके मौत के घाट उतारा जा रहा था। उस दौर में घाटी के मूल निवासी कश्मीरी पंडितों की संख्या लाखों में थी। 13-14वीं शताब्दी से कश्मीर के मूल ध्वजावाहक हिंदुओं को मजहबी उन्माद में प्रताड़ित किया जाता रहा है, जिसमें उनका बलात् मतांतरण भी शामिल था। किंतु 1989-90 में जिहादियों ने पूरे समुदाय- लगभग पांच लाख हिंदुओं को पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद और जिहाद के माध्यम से घाटी से ही पलायन के लिए बाध्य करते हुए उन्हे अपने देश में शरणार्थी और विस्थापित बना दिया। 

कश्मीर को हिंदू-विहीन करने की पटकथा 1980 के दशक में तब लिखी गई, जब घाटी में दबा हुआ दशकों पुराना इस्लामी कट्टरवाद और जिहाद फिर से सुरसा मुख की भांति फैलने लगा। उस कालखंड में कई मंदिरों को या तो ध्वस्त कर दिया गया या फिर उन्हे क्षति पहुंचाई गई। अकेले फारुख अब्दुल्ला के कार्यकाल में जिहादियों ने 31 मंदिरों को जमींदोज कर दिया था, जबकि स्थानीय प्रशासन और निवासी केवल मूकदर्शक बने रहे। वर्ष 1989 तक जाने माने अधिवक्ता और भाजपा कार्यकर्ता पंडित टिकालाल टपलू और तत्कालीन न्यायाधीश नीलकांत गंजू को सार्वजनिक रूप से मौत के घाट उतार दिया गया था। 

कवि सर्वनंद कौल प्रेमी, सामाजिक कार्यकर्ता सतीश टिकू, श्रीनगर दूरदर्शन के निदेशक लस्सा कौल के साथ हृद्यनाथ वांचू सहित कई अन्य कश्मीरी पंडितों की हत्या कर दी गई थी। 4 जनवरी 1990 को एक स्थानीय उर्दू अखबार 'आफताब' ने हिजबुल-मुजाहिदीन के आतंकियों की प्रेस विज्ञप्ति जारी की, जिसमें लिखा था- ‘हमारे संघर्ष का उद्देश्य कश्मीर में इस्लाम की सर्वोच्चता को स्थापित करना है, यदि किसी ने भी हमारे मार्ग में बाधा डाली, तो उसे मिटा दिया जाएगा।’ उसके बाद घटनाक्रम स्वतंत्र भारत के इतिहास में काले अक्षरों से अंकित है। 

विडंबना देखिए, 1992 में ढहाई गई एक मस्जिद पर जो स्वघोषित सेकुलरिस्ट-उदारवादी-प्रगतिवादी आज भी हंगामा काटते है और 1993 में मुंबई में हुए सिलसिलेवार बम धमाकों को प्रतिक्रिया बताकर इस आतंकी हमले को न्यायसंगत बताने का प्रयास करने से थकते नहीं है- वह जमात घाटी में कश्मीरी पंडितों की सामूहिक हत्या और मंदिरों को जमींदोज करने की शर्मनाक घटना पर गत तीन दशकों से मौन है। क्यों? 

गत वर्ष सर्वोच्च न्यायालय ने कश्मीरी पंडितों के नरसंहार के मामलों की नई सिरे से जांच और सुनवाई संबंधी मांग को खारिज कर दिया था। जम्मू-कश्मीर सरकार के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 1989 और 2004 के बीच 219 हिंदुओं की हत्या हुई थी और 24 हजार से अधिक लोगों ने पलायन किया था। किंतु स्थिति इससे कहीं अधिक भयावह थी। गैर-सरकारी संगठन ‘रूट इन कश्मीर" के अनुसार, 1989-1990, 1997 और 1998 में जम्मू कश्मीर में 700 कश्मीरी पंडितों की हत्या की गई थी, जिसमें 200 से अधिक प्राथमिकी दर्ज की गई थी। एक अन्य ‘पनुन कश्मीर’ नामक संगठन के अनुसार, 1341 कश्मीरी हिंदुओं की हत्या की गई थी। 

क्या इनमें से किसी भी एक मामले में कोई परिणाम निकला? क्या इस्लामी कट्टरवाद का शिकार हुए लोगों के परिजनों को आजतक कोई ठोस न्याय मिला है? सिख विरोधी हिंसा के दौरान जिन गुरुद्वारों को उपद्रवियों ने नुकसान पहुंचाया था, उनका आज सरकारी सहायता और सिख समाज के आत्मबल के कारण जीर्णोद्धार हो चुका है। वही कश्मीर में इस्लामी हिंसा का शिकार हुए खंडित मंदिरों की स्थिति किसी से छिपी नहीं है। 

इसी तरह 30 जनवरी 1948 को गांधीजी की सार्वजनिक रूप से गोली मारकर नृशंस हत्या कर दी गई थी, जिसमें "चितपावन ब्राह्मण" समाज के नाथूराम गोडसे ने अपना अपराध न केवल स्वीकार किया था, अपितु अदालती सुनवाई के बाद 15 नवंबर 1949 को उन्हे फांसी पर भी चढ़ा दिया गया था। उस समय गांधीजी की हत्या के तुरंत बाद महाराष्ट्र के पुणे, सतारा, कोल्हापुर, सांगली, अहमदनगर और सोलापुर आदि क्षेत्रों में चितपावन ब्राह्मणों और गोडसे उपनाम वाले लोगों को कांग्रेसियों ने चुन-चनकर अपनी घृणा का शिकार बनाया था। 

संभवत: आज की अधिकांश युवा पीढ़ी को इस बात की भनक तक भी नहीं होगी कि गांधीजी की हत्या के बाद असंख्य निरपराध ब्राह्मणों को मौत के घाट उतारा गया था, जो उस समय राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया की सुर्खियां भी बनी थी। सैकड़ों निर्दोष ब्राह्मणों के घरों और दुकानों को या तो जला दिया गया था या फिर उन्हें लूट लिया गया। क्या उन निरपराध ब्राह्मणों के एक भी हत्यारे को आजतक सजा मिली? 

बात यहां केवल हिंसा तक सीमित नहीं थी। गांधीजी की हत्या में संलिप्तता के आरोप में तत्कालीन नेहरु सरकार ने राजनीतिक दुर्भावना से प्रेरित होकर तुरंत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध लगा दिया था, जिसके बाद तत्कालीन सरसंघचालक गुरु गोलवलकर सहित 17 हजार से अधिक स्वयंसेवकों की गिरफ्तार कर लिया गया। कई स्वयंसेवकों को पुलिस हिरासत में अमानवीय यातनाएं तक दी गई थी। जब अदालत में गोडसे से संघ के संबंध होने का कोई प्रमाण नहीं मिला, तब सरकार प्रतिबंध हटाने के लिए विवश हुई। 

जब 12 जून 1975 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के तत्कालीन न्यायाधीश जगमोहन लाल सिन्हा ने भ्रष्ट आचरण मामले में इंदिरा गांधी की लोकसभा सदस्यता को रद्द कर दिया, तब बदले की भावना और निजी स्वार्थ हेतु 13 दिन पश्चात इंदिरा गांधी ने आपातकाल घोषित करते हुए संविधान को स्थगित कर दिया। इस दौरान इंदिरा सरकार ने दमनकारी नीतियों का अनुसरण करते हुए न केवल सामान्य नागरिकों के मौलिक अधिकारों का गला घोंटकर उन्हे प्रताड़ित किया, अपितु इसका विरोध करने वाले सभी विपक्षी नेताओं और विरोधियों को चिन्हित करके गिरफ्तार कर जेल में ठूस दिया। इनमें से कई लोगों का जेल में भीषण शारीरिक और मानसिक उत्पीड़न हुआ था। 

उपरोक्त सभी देश के ऐसे कुछ सामूहिक अपराध है, जो भारत के माथे पर कलंक के समान है। 1984 में सिख नरसंहार मामले में आया हालिया निर्णय, संभवत: उसी काले धब्बे को मिटाने की दिशा में पहला कदम है।

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