Loading... Please wait...

लूट या टूट के मझधार में फंसा देश

पुन्य प्रसून वाजपेयी देश के सामने खड़े सवाल अतीत को खंगाल रहे हैं और भविष्य का ताना-बाना अतीत के साये में ही बुन रहे हंै। देश लूट या टूट के मझधार में आकर फंसा हुआ है। देश संसदीय राजनीतिक बिसात में मंडल-कमंडल की थ्योरी को पलटने के लिये तैयार बैठा है। देश के सामने आर्थिक चुनौतियां 1991 के आर्थिक सुधार को चुनौती देते हुये नई लकीर खींचने को तैयार है। देश प्रधानमंत्री पद की गरिमा और ताकत को लेकर नई परिभाषा गढ़ने को तैयार है और बदलाव के दौर से गुजरते हिन्दुस्तान की रगों में पहली बार भविष्य को गढ़ने के लिये अतीत को ही स्वर्णिम मानना दौड़ रहा है। उलझते हालातों को समझें तो देश के सामने पहली सबसे बड़ी चुनौती भ्रष्टाचार की लूट और सामाजिक तौर पर देश की टूट के बीच से किसी एक को चुनने की है।

कांग्रेसी सत्ता 2014 में इसलिये खत्म हुई क्योंकि घोटालों की फेहरिस्त देश के सामने इस संकट को उभार रही थी कि उसका भविष्य अंधकार में है। देश के सामने भ्रष्टाचार की लूट से कहीं बड़ी लकीर सामाजिक तौर पर देश की टूट ही चुनौती बन खड़ी हो गई। संविधान से नागरिक होने के अधिकार वोटर की ताकत तले इस तरह दब गये कि देश के 17 करोड़ मुस्लिम नागरिक की जरूरत सत्ता को है ही नहीं, इसका खुला एहसास लोकतंत्र के गीत गाकर सत्ता भी कराने से नहीं चूकी। नागरिक के समान अधिकार भी वोटर की ताकत तले कैसे दब जाते हैं, इसे 14 करोड़ दलित आबादी के खुलकर महसूस किया। यानी संविधान के आधार पर खड़े लोकतांत्रिक देश में नागरिक शब्द गायब हो गया और वोटर शब्द हावी हो गया। इसे कौन पाटेगा ये कोई नहीं जानता।

दूसरी चुनौती 27 बरस पहले अपनाये गये आर्थिक सुधार के विकल्प के तौर पर राजनीतिक सत्ता पाने के लिये अर्थव्यवस्था के पूरे ढांचे को ही बदलने की है और ये चुनौती उस लोकतांत्रिक सत्ता से उभरी है जिसमें नागरिक, संविधान और लोकतंत्र भी सत्ता बगैर महत्वहीन है। यानी किसान का संकट, मजदूर की बेबसी, महिलाओं के अधिकार, बेरोजगारी और सामाजिक टूटन सरीखे हर मुद्दे सत्ता पाने या ना गंवाने की बिसात पर इतने छोटे हो चुके हैं कि भविष्य का रास्ता सिर्फ सत्ता पाने से इसलिये जा जुड़ा है क्योंकि पाठ अलोकतांत्रिक होकर खुद को लोकतांत्रिक बताने से जा जुड़ा। यानी देश बचेगा तो ही मुद्दे संभलेंगे और देश बचाने की चाबी सिर्फ राजनीतिक सत्ता के पास होती है। यानी सत्ता के सामने संविधान की बिसात पर लोकतंत्र का हर पाया बेमानी है और लोकतंत्र के हर पाये के संवैधानिक अधिकारों को बचाने के लिये राजनीतिक सत्ता होनी चाहिये।

देश के सामने ये चुनौती है कि लोकतंत्र के किस नैरेटिव को वह पंसद करती है। क्योंकि मनमोहन सिंह के अर्थशास्त्र की राह पर मोदी सत्ता है और संघ परिवार के स्वदेशी, खेती, किसानी और मजदूर की राह पर कांग्रेस है। नैरेटिव साफ है कांग्रेस ने मनमोहन सिंह के इकोनॉमी का रास्ता छोड़ा है लेकिन पोस्टर ब्वॉय मनमोहन सिंह को ही रखा है। तो दूसरी तरफ मोदी सत्ता अर्थव्यवस्था के उस चक्रव्यूह में जा फंसी है जहां खजाना खाली है पर वोटरों पर लुटाने की मजबूरी है। यानी राजकोषीय घाटे को नजरअंदाज कर सत्ता को बरकरार रखने के लिये ग्रामीण भारत के लिये लुटाने की मजबूरी है। इस कड़ी में सबसे महत्वपूर्ण और आखरी चुनौती है सत्ता के लिये बनती वह बिसात जो 2014 की तुलना में  360 डिग्री में घूम चुकी है। इसकी परतें एक्सीडंेटल प्राइम मिनिस्टर मनमोहन सिंह से ही निकली है। मनमोहन सिंह या नरेन्द्र मोदी, दोनों दो ध्रुव की तरह राजनीतिक बिसात बता रहे हैं।

एक तरफ एक्सिडेंटल पीएम मनमोहन सिंह को लेकर उस थ्योरी का उभरना है जहां पीएम होकर भी मनमोहन सिंह कांग्रेस के सामने कुछ भी नहीं थे। यानी हर निर्णय कांग्रेस पार्टी-संगठन चला रही सोनिया और राहुल गांधी थे। तो दूसरी तरफ नरेन्द्र मोदी की थ्योरी है जहां पीएम के सामने ना पार्टी का कोई महत्व है ना ही सांसदों का और ना ही कैबिनेट मिनिस्टरों का। तो अपने ही वोटरों से कट चुके बीजेपी सांसद या मंत्री की भूमिका क्या होगी, ये भी सवाल है। यानी एक तरफ सत्ता और पार्टी का बैलेस है तो दूसरी तरफ सत्ता का एकाधिकार है। लोकसभा चुनाव में बीजेपी ही नहीं संघ परिवार के सामने भी ये चुनौती है कि उसे सत्ता गंवानी है या बीजेपी को बचाना है।

गडकरी की आवाज इसी की प्रतिध्वनि है। तो दूसरी तरफ सोशल इंजीनियरिंग की जो थ्योरी कांग्रेस से निकल कर बीजेपी में समाई अब वह भी आखरी सांस ले रही है। क्षत्रपों के सामने खुद को बचाने के लिये बीजेपी के खिलाफ एकजुट होकर कांग्रेस की जमीन को मजबूत करना भी है और आखिर तक मोदी सत्ता से जुड़कर अपनी जमीन को खत्म करना भी है। यानी चाहे-अनचाहे मोदीकाल ने 2019 के लिये एक ऐसी लकीर खींच दी है जहां लोकतंत्र का मतलब भी देश को समझना है और संविधान को भी परिभाषित करना है। इकोनॉमी को भी संभालना है और राजनीति सत्ता को भी जनसरोकार से जोड़ना है। 

100 Views

बताएं अपनी राय!

नीचे नजर आ रहे कॉमेंट अपने आप साइट पर लाइव हो रहे है। हमने फिल्टर लगा रखे है ताकि कोई आपत्तिजनक शब्द, कॉमेंट लाइव न हो पाए। यदि ऐसा कोई कॉमेंट- टिप्पणी लाइव हुई और लगी हुई है जिसमें अर्नगल और आपत्तिजनक बात लगती है, गाली या गंदी-अभर्द भाषा है या व्यक्तिगत आक्षेप है तो उस कॉमेंट के साथ लगे ‘ आपत्तिजनक’ लिंक पर क्लिक करें। उसके बाद आपत्ति का कारण चुने और सबमिट करें। हम उस पर कार्रवाई करते उसे जल्द से जल्द हटा देगें। अपनी टिप्पणी खोजने के लिए अपने कीबोर्ड पर एकसाथ crtl और F दबाएं व अपना नाम टाइप करें।

आपका कॉमेट लाइव होते ही इसकी सूचना ईमेल से आपको जाएगी।

© 2019 ANF Foundation
Maintained by Quantumsoftech