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‘प्रियंका’ से अपेक्षाएं, चुनौतियां और सवाल...

राकेश अग्निहोत्री राहुल गांधी की टीम की महासचिव प्रियंका गांधी अपने सहयोगी पदाधिकारियों से विचार विमर्श के साथ अब मिशन यूपी पर पहुंच रही हैं... वह भी तब जब पति रॉबर्ट वाड्रा ईडी की मैराथन पूछताछ सिलसिला खत्म नहीं हुआ.. यानि कांग्रेस खासतौर से राहुल सोनिया प्रियंका से बढ़ती अपेक्षाएं तो सियासी दबाव से खड़ी हुई चुनौतियों से इनकार नहीं किया जा सकता .. चाहे फिर वह  जांच एजेंसियों की  प्रियंका गांधी के पति रॉबर्ट वाड्रा से पूछताछ.. हो या फिर राहुल गांधी जिस राफेल मुद्दे को छोड़ने को तैयार नहीं उससे जुड़ी सीएजी रिपोर्ट सोमवार को संसद में पेश किए जाने की चर्चा.. 

ऐसे में प्रियंका ने लखनऊ पहुंचने से पहले दिल्ली से ही उत्तर प्रदेश में नकली शराब से हुई 100 से ज्यादा मौत पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर निशाना साध कर भाजपा सरकार पर सिर्फ सवाल ही खड़े नहीं किए.. बल्कि अपनी आवाज में ऑडियो जारी कर सोशल मीडिया के माध्यम से खासतौर से उत्तर प्रदेश की जनता को संदेश दिया कि वह बड़ा लक्ष्य लेकर लखनऊ आ रही हैं, जिनका कहना हम सब मिलजुलकर नई राजनीति की शुरुआत करेंगे.. यानी संकेत साफ है कि प्रदेश में अस्तित्व के संकट से जूझ रही कांग्रेस 80 सीटों वाले उत्तर प्रदेश पर फोकस बनाकर राहुल-प्रियंका देश को अब फ्रंट फुट पर खेलने का संदेश और स्पष्ट कर देना चाहते हैं.. 

तो सवाल खड़ा होना लाजमी है कि क्या लोकसभा चुनाव के अंतिम 3 महीने में चौतरफा बढ़ती अपेक्षाओं और विरोधियों के दबाव के बीच नेहरू-गांधी परिवार की यह भाई-बहन की जोड़ी आखिर कांग्रेस को कितना और किस हद तक मजबूती देती है.. क्या मोदी की राह में कांग्रेस रोड़ा बनेगी या फिर मोदी विरोधी दूसरे राजनीतिक दलों से समन्वय नहीं बन पाने के कारण राहुल का यह दांव उल्टा पड़ेगा..जो अंततः क्या त्रिकोणीय संघर्ष में मोदी का रास्ता ही साफ करेगा..

सोमवार 11 फरवरी की तारीख कांग्रेस ने राष्ट्रीय महासचिव प्रियंका गांधी के लखनऊ दौरे के लिए मुकर्रर की है.. जो अपने सहयोगी  पश्चिमी उत्तर प्रदेश के प्रभारी और राष्ट्रीय महासचिव ज्योतिरादित्य सिंधिया  और राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी के साथ लखनऊ पहुंचेगी.. प्रियंका गांधी और ज्योतिरादित्य दोनों ने अपनी आवाज में ऑडियो सोशल मीडिया पर वायरल कर इसका संदेश दे दिया है ..

पूर्वी उत्तर प्रदेश के अपने प्रभार वाले क्षेत्र में सीधे सक्रिय होने से पहले पहले 4 दिन उत्तर प्रदेश की राजधानी में सहयोगियों के साथ चिंतन-मंथन कर  प्रियंका चुनावी रणनीति बनाने जा रही लेकिन पहले ही दिन जिस पर देश की नजर रहेगी वह होगा रोड शो.. अमेठी-रायबरेली से बाहर केंद्र में मोदी की भारी भरकम सरकार के रहते योगी राज में जहां मायावती-अखिलेश पहले ही गठबंधन कर सोनिया राहुल की सीट को छोड़ कर आगे बढ़ चुके हैं.. 

उस उत्तर प्रदेश में जहां मोदी की पैनी नजर तो प्रबंधन के महारथी अमित शाह खुद अपनी सक्रियता बनाए हुए हैं.. ऐसे में प्रियंका गांधी की पॉलिटिक्स में टाइमिंग और बन रहे परसेप्शन को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.. खासतौर से जब  कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल ने  दौरे के 1 दिन पहले  प्रेस कॉन्फ्रेंस कर  हर राफेल से जुड़ी सीएजी रिपोर्ट की ओर ध्यान आकर्षित किया .. 

जो सोमवार को सदन में पेश की जा सकती है.. राहुल गांधी लगातार रफेल मुद्दे पर मोदी को   घेरते रहे ऐसे में इस रिपोर्ट के तथ्य जब सामने आएंगे और चर्चा का विषय बनेंगे तो इस ज्वलंत मुद्दे पर उत्तर प्रदेश के दौरे पर जा रहे राहुल गांधी से सफाई मांगी जा सकती तो नए सवाल किए जा सकते हैं..  तो दूसरी  ओर प्रियंका गांधी के पति रॉबर्ट से अवैध संपत्ति और भ्रष्टाचार पर ईडी द्वारा पूछताछ तो ठीक इसी समय प्रियंका गांधी का कांग्रेस की बैठक में अधिकृत तौर पर शामिल होकर उत्तर प्रदेश पर फोकस बनाना, यानी मायावती और ममता की तुलना में पहले ही आमने-सामने आ चुके नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी जिस तरह अलग अलग फोरम पर देश के अलग-अलग क्षेत्रों से एक दूसरे पर सीधा हमला कर रहे..

तब प्रियंका का मैदानी दौरा और बंद कमरे की रणनीति मायने रखती है.. जिस तरह प्रियंका ने ऑडियो जारी कर जाति, धर्म, समुदाय से ऊपर युवा महिला पर फोकस बनाते हुए भविष्य के निर्माण के लिए नई राजनीति की शुरुआत का आह्वान किया उसमें संदेश सिर्फ बसपा, सपा, गठबंधन के लिए नहीं बल्कि मोदी और शाह की भाजपा के लिए भी छुपा है.. उत्तर प्रदेश से बाहर  के उन नेताओं की भी  प्रियंका गांधी के  इस दौरे पर  नजर जरूर रहेगी चाहे फिर वह ममता बनर्जी हो  या फिर नीतीश कुमार से लेकर तेजस्वी यादव और  रामविलास पासवान ही क्यों ना हो .. 

उत्तर भारत की नई पॉलिटिक्स से  दक्षिण भारत के राजनीतिक दलों  के लिए भी संदेश छुपा होगा .. फिर भी सवाल आखिर प्रियंका कौन सी नई राजनीति  शुरू करने के मकसद से  कांग्रेस को एक नई दिशा देने जा रही .. क्या विपक्ष  के इस आरोप में दम है कि  राहुल गांधी के भरोसे  सत्ता में लौटने का ख्वाब पूरा नहीं होने वाला.. राहुल गांधी के फ्रंट फुट पर राजनीति करने का बयान को यदि प्रियंका गांधी के नए भविष्य के निर्माण के लिए नई राजनीति के आगाज को जोड़ा जाए तो संदेश यही जाता है.. 

कि मोदी और शाह के दबाव में कांग्रेस नहीं आएगी तो महागठबंधन के दूसरे सहयोगियों की अनदेखी अब बर्दाश्त के बाहर है.. शायद बहन और कांग्रेस ने यह तय कर लिया कि डरने का कोई सवाल नहीं और मोदी को डरा कर कोई भी काम कराया जा सकता है.. यानी आने वाले समय में आरोप-प्रत्यारोप हो या फिर चुनाव के दूसरे मोर्चे सभी जगह कांग्रेस आक्रमक अंदाज में आगे बढ़ना चाहेगी ..

फिर भी प्रियंका के सामने तमाम चुनौतियों से इनकार नहीं किया जा सकता, लेकिन पहली और सबसे बड़ी चुनौती लखनऊ दौरे के पहले दिन को यादगार-सफल बनाना ही नहीं होगा, बल्कि विरोधियों और सहानुभूति रखने वाले दूसरे राजनीतिक दल और अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं के साथ मतदाताओं को साधना होगा चुनाव भले ही ज्यादा दूर ना हो, लेकिन जिस तरह आरोप-प्रत्यारोप के बीच सदन से लेकर सड़क तक काउंटर कर विरोधी को कमजोर और प्रसांगिक साबित करने के साथ अपनी बात को प्रभावी और असरदार साबित करने की होड़ हमेशा लगी रहती है.. 

इस मोर्चे पर भी प्रियंका राहुल के लिए चुनौती से इनकार नहीं किया जा सकता.. क्योंकि प्रियंका की तुलना उनकी दादी इंदिरा गांधी से हो रही तो मायावती और ममता की तुलना में भी प्रियंका को खुद को भीड़ जुटाऊ नेता साबित करना होगा.. तो इस भीड़ को वोट में तब्दील करना भी  किसी चुनौती से कम नहीं होगा.. क्योंकि 2009 में लोकसभा की 21 सीटें कांग्रेस के खाते में आई थी तो उसमें तेरा सांसद उस पूर्वी उत्तर प्रदेश से थे जिसका जिम्मा प्रियंका गांधी को सौंपा गया है .. उस वक्त  कांग्रेस का मत प्रतिशत बढ़कर 18 तक पहुंच गया था.. 

जबकि 2014 से विधान सभा चुनाव 2017 मेक कांग्रेस का ग्राफ फिर गिरा .. कांग्रेस को उत्तर प्रदेश में  कभी ब्राह्मण दलित और मुसलमान  ताकत देते रहे  जिनके समर्थन के दम पर  कांग्रेस ने न सिर्फ पर राज किया बल्कि अपना अस्तित्व भी बचाया.. दलित वोट बैंक पर मायावती का तो मुस्लिम वोट बैंक अखिलेश की सपा के साथ रहा तो ब्राह्मण बीजेपी के साथ चला गया था .. कांग्रेस  इन 3 वर्ग पर फोकस कर  चुनाव में जाना चाहेगी .. 

चुनाव से पहले जो हालात इस वक्त बंद पड़े उसमें अब  भाजपा ,कांग्रेस  और सपा बसपा गठबंधन के त्रिकोणी संघर्ष से इनकार नहीं किया जा सकता..इससे पहले अखिलेश की सपा और राहुल की कांग्रेस  का गठबंधन  यानी हाथ की साइकिल पर सवारी भी  फ्लॉप और फेल साबित हुई थी .. एक बार फिर  राहुल गांधी ने  अखिलेश की तरह ही कांग्रेस के अपने सहयोगी ज्योतिरादित्य  जैसे युवा जुझारू चेहरे को  बहन प्रियंका के साथ  जोड़ी बना कर सामने लाया .. 

कांग्रेस की इस तिकड़ी को  भगवाधारी योगी आदित्यनाथ हों  देश के स्वाभिमान जगाने का दावा करने वाले हिंदू सम्राट नरेंद्र मोदी हों या फिर बेहतर प्रबंधन के महारथी अमित शाह के मुकाबले कम से कम सोमवार को अपनी छाप छोड़ना होगा तो लोकप्रियता प्रियंका को साबित कर दिखाना ही होगा .. इसमें सिर्फ संगठन कार्यकर्ता ,समर्थक और जनता ही नहीं  मीडिया की भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता.. 

क्योंकि लोग दादी इंदिरा की तरह प्रियंका का अंदाज ए बयां देखना चाहेंगे तो भीड़ के मापदंड पर भी लोकप्रियता का आकलन होगा ..तो देखना दिलचस्प होगा कि न्यूज़ चैनलों में प्रियंका कितना स्पेस घेर पाती हैं तो सोशल मीडिया से लेकर प्रिंट मीडिया प्रियंका की एंट्री को विरोधियों के लिए कितनी बड़ी चुनौती बताते हैं.. रोड शो के बाद राहुल के साथ प्रियंका की प्रेस कॉन्फ्रेंस गौर करने लायक होगी.. 

आखिर प्रियंका खुद चुनाव लड़ने पर सस्पेंस चाहे फिर वह वाराणसी से ही क्यों न हो या फिर मां सोनिया गांधी की रायबरेली सीट इतनी जल्दी खत्म करेंगी.. क्या पूर्वी उत्तर प्रदेश से आगे देश में चुनावी प्रचार का हिस्सा से जुड़े सवाल का आखिर कितना स्पष्ट जवाब देंगी तो मायावती और अखिलेश जिन्होंने सोनिया गांधी और राहुल गांधी की सीट पर उम्मीदवार नहीं खड़े करने का ऐलान किया.. उस बसपा, सपा गठबंधन के खिलाफ प्रियंका और राहुल उत्तर प्रदेश की धरती से आखिर क्या संदेश देंगे.. 

क्योंकि राहुल गांधी ने इस गठबंधन के ऐलान के वक्त दुबई से साफ कर दिया था कि वह और कांग्रेस उत्तर प्रदेश में फ्रंट फुट पर खेलेंगे.. आखिर योगीराज में नकली शराब से हुई मौत पर पहला बड़ा हमला करने वाली प्रियंका कांग्रेस के चुनावी एजेंडे में किसे सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी कहें या फिर दुश्मन साबित करेंगे.. कुंभ के शाही स्नान की तारीख निकलती  जा रही तब प्रियंका प्रयागराज में स्नान के साथ अयोध्या में राम दर्शन को लेकर क्या अपने पत्ते खोलेंगी.. 

प्रियंका गांधी का राजनीति में आगाज देश की महिला राजनीति को भी एक नई दिशा दे सकता है.. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए मायावती से लेकर ममता बनर्जी महिला नेतृत्व पहले  ही चुनौती देता रहा है तो अब युवा ग्लैमरस  और गांधी परिवार से जुड़ी प्रियंका गांधी को भी नजरअंदाज करना भाजपा के लिए आसान नहीं होगा..

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