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कांग्रेस और भाजपा की चुनावी सीमा

अजित द्विवेदी
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कांग्रेस कभी अखिल भारतीय पार्टी रही है। अब भाजपा का दावा है कि वह अखिल भारतीय पार्टी है। सांसदों और विधायकों की संख्या के लिहाज से वह कांग्रेस से काफी आगे हो गई है। पर भौगोलिक रूप से उसका बहुत व्यापक विस्तार नहीं हुआ है। दूसरी ओर कांग्रेस की भी भौगोलिक सीमाएं सिकुड़ती जा रही हैं। उसकी पहुंच कम होती जा रही है। देश के 29 राज्यों में से एक दर्जन भी राज्य ऐसे नहीं हैं, जहां ये दोनों पार्टियां पूरी तरह से फैली होने का दावा कर सकें। 

इन दोनों के साझा असर वाले राज्यों की संख्या तो और भी सीमित है। गुजरात, मध्य प्रदेश, राजस्थान, असम, छत्तीसगढ़, कर्नाटक, गोवा, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश ये नौ राज्य हैं, जहां दोनों पार्टियां मजबूत स्थिति में हैं और इनके बीच आमने सामने का मुकाबला है। इनके अलावा भाजपा उत्तर प्रदेश व झारखंड में और कांग्रेस पंजाब, तेलंगाना व केरल में अपने दम पर मजबूत है। 

महाराष्ट्र में दोनों पार्टियां अपनी सहयोगी पार्टियों के दम पर ही सफल होती हैं और बिहार में भाजपा की ताकत जदयू के कारण बनी है। दोनों राज्यों का पिछला चुनाव अपवाद है। तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल, ओड़िशा जैसे बड़े राज्यों में ये दोनों पार्टियां अप्रासंगिक सी हैं। 

भाजपा की चुनावी सीमा का पिछले पांच साल में विस्तार हुआ है। पांच साल पहले उसकी पहुंच और भी सीमित थी। इसके बावजूद उसने बहुमत हासिल कर लिया। अगर बारीकी से देखें तो लोकसभा चुनाव 2014 में भाजपा को मिला बहुमत उन्हीं नौ-दस राज्यों से मिला है, जहां उसका आधार पहले से मजबूत रहा है। वह नए इलाके में सेंध नहीं लगा पाई थी। 

उसने उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, गुजरात, मध्य प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ के दम पर बहुमत हासिल किया। इन आठ राज्यों की कुल 273 में भाजपा को 216 सीटें मिलीं। उसकी सहयोगी पार्टियों को 28 सीटें मिलीं। यानी 273 में से एनडीए को 244 सीटें मिलीं। ये आठ कोर प्रदेश हैं, जहां 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद भी भाजपा जीतती रही और बिहार को छोड़ उत्तर प्रदेश, झारखंड, महाराष्ट्र व गुजरात में जीत हासिल की। पर अब स्थिति बदलने लगी है। इसका कारण यह है कि एकाध राज्यों को छोड़ कर कांग्रेस बाकी राज्यों में वापसी करने लगी है। जहां भाजपा के साथ उसका सीधा मुकाबला है वहां तो वह मजबूत हुई ही है वह दूसरे राज्यों में भी गठबंधन बना कर भाजपा को रोकने की आक्रामक राजनीति कर रही है। नरेंद्र मोदी की सुनामी में 2014 में जो प्रादेशिक क्षत्रप पीट कर हाशिए में चले गए थे उनका आत्मविश्वास लौटा है और वे उठ खड़े हुए हैं। इन क्षत्रपों के मजबूत होने से भाजपा की सीमा सिकुड़ने लगी है। मिसाल के तौर पर भाजपा 2014 में बिहार में 30 सीटों पर लड़ी थी और 22 पर जीती थी। लेकिन इस बार वह 17 सीटों पर लड़ने को तैयार हो गई है। 

उत्तर प्रदेश में उसने 71 सीटें जीती हैं पर वहां अगर सपा, बसपा, कांग्रेस और रालोद का तालमेल होता है तो भाजपा के लिए बहुत मुश्किल होगी। तीन लोकसभा और एक विधानसभा सीट के उपचुनाव के नतीजों से यह सचाई जाहिर हो गई है।

इस बीच मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के चुनाव नतीजे आए, जहां कांग्रेस ने भाजपा को हरा दिया। कांग्रेस की यह जीत 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के लिए खतरे की घंटी है। इससे पहले गुजरात में भी इसी तरह कांग्रेस ने भाजपा को कड़ी टक्कर दी थी। सो, अब कांग्रेस मुकाबले में लौट आई है पर उसी सीमा के अंदर, जो पहले से परिभाषित है।  दोनों पार्टियां सीमा का विस्तार नहीं कर पा रही हैं। उलटे भाजपा ने तेलंगाना की अपनी मामूली सी जमीन भी गंवा दी। उसके विधायकों की संख्या पांच से घट कर एक हो गई। 

सो, अब सवाल है कि कांग्रेस और भाजपा अपनी सीमा के अंदर लड़ते हैं तो उनकी क्या स्थिति रहेगी? इसे उनके असर वाले राज्यों को ए, बी और सी श्रेणी में बांट कर समझा जा सकता है। भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए ए श्रेणी वाले राज्य हैं – राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात, असम, कर्नाटक, गोवा, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और हरियाणा। 

इन दस राज्यों में लोकसभा की कुल 183 सीटें हैं, जो मोटे तौर पर इन दो पार्टियों के बीच बंटेंगी। हाल में हुए चुनावों के आंकड़ों के आधार पर यह माना जा सकता है कि दोनों पार्टियों को यहां आधी आधी सीटें मिल सकती हैं। यानी आदर्श स्थिति में दोनों के खाते में 91-91 सीटें जा सकती हैं। 

इसके बाद कांग्रेस के लिए ए श्रेणी वाले राज्य पंजाब, तेलंगाना और केरल हैं, जहां कुल 50 सीटें हैं। बहुत बेहतर स्थिति में भी कांग्रेस इन तीन राज्यों में 20 से ज्यादा सीटें शायद ही जीत पाएगी। उसे पंजाब में अकाली दल व आप, तेलंगाना में टीआरएस और केरल में एलडीएफ से कड़ी टक्कर मिलेगी। 

इसी तरह भाजपा के ए श्रेणी वाले राज्यों उत्तर प्रदेश और झारखंड में उसके पास अभी 93 सीटें हैं। पर उत्तर प्रदेश में सपा, बसपा, कांग्रेस और रालोद मिल कर लड़ने वाले हैं और झारखंड में कांग्रेस, जेएमएम, जेवीएम और राजद का गठबंधन बन रहा है। ऐसे में भाजपा के लिए एक तिहाई सीटें यानी 30 सीट बचानी भी मुश्किल होगी। 

भाजपा के लिए बी श्रेणी वाले राज्य महाराष्ट्र और बिहार हैं। महाराष्ट्र में वह शिव सेना और बिहार में जदयू के दम पर चुनाव लड़ेगी। अभी इन दोनों राज्यों में उसके पास 45 सांसद हैं। पर बिहार में वह अपनी जीती हुई पांच सीटें छोड़ कर लड़ेगी। सो, सामान्य समझ के हिसाब से भी उसकी सीटें इन दोनों राज्यों में आधी रह जाने वाली है। उसे 20 से 22 सीटें मिल सकती हैं। उसके सी श्रेणी वाले राज्यों आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, केरल, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, ओड़िशा आदि में कुल मिला कर सीटों की संख्या दहाई में पहुंच जाए तो बड़ी बात होगी। उसकी चुनावी सीमा को देखते हुए लग रहा है कि डेढ़ सौ सीटों का आंकड़ा पार करना उसके लिए बेहद चुनौती वाला होगा। 

दूसरी ओर कांग्रेस की सीमा का भले तीन राज्यों में जीतने के बाद विस्तार हुआ है पर देश का बड़ा हिस्सा चुनावी रूप से उसके लिए अब भी बंजर है। बड़े राज्यों में वह सहयोगी पार्टियों के दम पर खड़ी है। बिहार, उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल आदि राज्यों में सहयोगी उसके लिए सीट छोडेंगे तो वह कुछ जीत पाएगी। यहीं स्थिति महाराष्ट्र और कर्नाटक में भी रहने वाली है। पिछले चुनाव में तो एनसीपी के साथ होने के बावजूद कांग्रेस महाराष्ट्र में सिर्फ दो सीटें जीत पाई थी। सो, उसके लिए सवा सौ सीटों का आंकड़ा पार करने के लिए हर जगह गठबंधन होना जरूरी है और भाजपा से सीधी टक्कर वाले राज्यों में भाजपा से कम से कम बराबरी का मुकाबला होना जरूरी है।

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