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संगठन को सुबुद्धि से जोड़ें

शंकर शरण
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राजनीति में केवल नीयत से कुछ नहीं होता। महात्मा गाँधी की नीयत बहुत अच्छी थी! पर उन के कदमों से देश बँटा, लाखों निरीह लोग बेमौत मरे और एक स्थायी दुश्मन नया पड़ोसी देश बन गया। इसलिए ‘सही नीयत’ के दावे के साथ सही मार्ग भी जरूरी है।

केवल दावे को लें, तो स्तालिन या माओ ने पूरी मानवता के कल्याण का दावा किया था। उन की लोकप्रियता भी वैश्विक थी। अतः असल चीज कथनी नहीं, करनी है। उन की करनी थी: विस्थापनवादी तानाशाही। जनता को विस्थापित कर पार्टी, पार्टी को विस्थापित कर आंतरिक गुट, अंततः उस गुट का भी विस्थापन कर एक नेता सारी बुद्धि, नीति का सर्वेसर्वा बन गया। शेष सब को हुक्म था कि वे बस  जयकार और प्रचार करें। स्तालिन और माओ के देशों की भयावह दुर्गति उस कारण भी हुई। 

सब को विस्थापित कर खुद सब सोचने, करने, थोपने की गहरी सीमाएं हैं। समाज की चेतना, कर्मशीलता तथा आपसी सहयोग के वातावरण का कोई विकल्प नहीं है। भारत में यह गारंटी करना ही राज-धर्म था। पश्चिमी देशों ने तो हाल में यह सीखा। तब कैसा दुर्भाग्य, कि यहाँ हिन्दूवादी ही अपनी धर्म-परंपरा छोड़ कम्युनिस्टों वाले छल-बल-जबर पर उतर आए! 

उन्हें अपने दलीय सहयोगियों पर भी विश्वास न रहा। समाज के जानकारों, अनुभवियों की तो दूर रही। बड़े-बड़े जन संगठन दिखावे के लगते हैं, जिन के पास कोई सार्थक काम या योजना नहीं है। सब से वही स्तालिनवादी अपेक्षा है कि ‘‘पार्टी को बढ़ायें ’’। यहीं से विस्थापन शुरू होता है। समाज की सेवा के बदले उपेक्षित किया जाता है। अंतिम परिणति सभी अन्य को मूर्ख, चापलूस या दास समझने में होती है। 

ऐसी राजनीति से समाज की भलाई नहीं होती। दावे, प्रचार और लफ्फाजियाँ चाहे जितनी हो। वही तो सोवियत संघ और लाल चीन में भी था। उसी नकल में यहाँ नेहरू युग से आज तक आंडबरपूर्ण, मिथ्या प्रचार चलता रहा है। अपने संगठन तो मनचाहे चलाते ही रहे, समर्थक बौद्धिक मंडलियों को भी निर्देश देने की जिद है। क्या लिखें, किस पर बोलंह या मौन रखें, कौन सी किताब पढ़ें, न पढ़ें, किस लेखक को सम्मान दें, किसे मंडली में रखें या हटा दें, आदि निर्णय कोई रंगरूट ‘संगठनकर्ता’ खुद कर लेता है! कोई असहमति दिखाए, तो जामे से बाहर हो जाता है। यह पार्टी-मानसिकता और विस्थापनवाद का ही उदाहरण है। 

हैरत यह कि इसी के साथ स्वामी विवेकानन्द और हिन्दू ज्ञान-परंपरा की जयकार भी चलती रहती है! पर हमारे किस शास्त्र में राज-कर्मचारी को विद्वान से, या राज्य-कर्म को धर्म से ऊपर बताया गया? आज यहाँ अनेक नेता बड़े विद्वानों से भी सीधे मुँह बात नहीं करते। बल्कि उन्हें ‘दंडित’ तक करते हैं, क्योंकि उन्होंने सच लिखा, कहा और बाजरूरत आइना दिखाया। यानी अपना धर्म निभाया। ऐसे धर्म-पालक विद्वानों को उपेक्षित अपमानित करना हिन्दू नहीं, कम्युनिस्ट परंपरा है। क्या हमें इस का आभास है? 

स्वामी विवेकानन्द के समय दुनिया भर में राजनीतिक पार्टियाँ थी। भारत में भी थी। देश पराधीन और बदहाल भी था। किन्तु विवेकानन्द ने समस्याओं का हल पार्टी गतिविधि में नहीं, वरन धर्मोत्थान के लिए शिक्षा में देखा। उन्होंने चालू राजनीति की सीमाएं देख ली थी। आज के शासक पुराने राजाओं की तरह स्वाधीन नहीं, बल्कि ‘कठपुतले’ हैं। आशय था कि ये वोट या समर्थन राजनीति के दास है। वे प्रायः इसी के लिए सब कुछ करते हैं। 

इसीलिए, यदि हिन्दू धर्म-समाज की सच्ची चिन्ता हो, तो दलबंदी के बाड़े से निकल कर सोचें। हर अच्छे-बुरे को ‘पार्टी’ से जोड़ कर देखने की आदत भारी भूल रही है। कई भले हिन्दू मानते रहे कि सत्ता पाकर ही वे देश की सेवा कर सकेंगे। परन्तु यह भी विवेकानन्द की सीख के विरुद्ध है। उन्होंने प्रभुत्व के सहारे को भ्रामक बताया था।   

लेकिन हिन्दूवादियों ने प्रभुत्व ही नहीं, सर्वग्रासी दलबंदी को भी आधार बना लिया। शिक्षा तक को नहीं छोड़ा। विश्वविद्यालयों को दलीय राजनीति का अखाड़ा बनने से रोकने के बदले वे भी उस में कूद पड़े। इस प्रकार, देश-हित विस्थापित और अपने दल की बढ़त प्रमुख हो गई। उन्होंने कभी परख नहीं की कि उन के संगठनों के बढ़ते जाने से क्या देश-हित की वृद्धि हुई?

अंततः तमाम सत्ता संस्थान अपने हाथ लेकर भी वे धर्म, शिक्षा और समाज की अवनति रोकने को कुछ न कर सके। बल्कि, शिक्षा क्षेत्र में अपनी अकर्मण्यता को ‘उपलब्धि’ तक कह बैठे! पूछने पर सारी कैफियत कम्युनिस्ट तर्कों से दी जाती है। स्वामी विवेकानन्द या हिन्दू परंपरा से नहीं। 

जबकि शिक्षा से दलीय राजनीति का धंधा टंटा हटा देने से रेडिकल, हिन्दू-विरोधी तत्व जल्द समाप्त हो जाते। उन की ताकत ही युवाओं को ज्ञान, तथ्य से भटकाकर केवल आकर्षक लफ्फाजियों का शिकार बनाने में है। दशकों से यहाँ कम्युनिस्टों ने कांग्रेसी सत्ता का इस्तेमाल कर सार्वजनिक शिक्षा का जो घोर राजनीतिकरण किया, उसी से उन्हें हिन्दू-विरोधी दुराग्रह फैलाने में सहूलियत होती है। इस की काट भाजपा की जय और कांग्रेस की क्षय बोलकर नहीं हो सकी, नहीं हो सकती। पर हिन्दूवादी छात्र और शिक्षक भी दलीय राजनीति के मोहरे बनकर देश-सेवा की बजाए पार्टी-सेवा में फँसे रह गए।

दरअसल, कई मामले संगठन से नहीं, बुद्धि से तय होते हैं। भारत में इस्लामी दबाव इस का उदाहरण है। इस की हैसियत यहाँ पचास वर्ष पहले से बढ़ी है। जबकि यहाँ कोई रसूखदार इस्लामी पार्टी ही नहीं है! तब मुसलमानों के लिए विशेष सरकारी संस्थाएं, सुविधाएं और संवेदनाएं कैसे बनती, बढ़ती गई? यहाँ तक कि कुछ हिन्दूवादियों ने भी इसे बढ़ाया। 

फलतः यहाँ हिन्दुओं की तुलनात्मक कानूनी स्थिति पहले से आज गिरी है। यह केवल वोट-बैंक राजनीति और जनसांख्यिकी दबाव से नहीं हुआ। आज भी भारत में देश-भक्त, हिन्दू और मानवतावादी बहुत अधिक हैं। तब दबाव उलटा कैसे बना? इस का उत्तर ढूँढने के बदले हिन्दूवादी संगठन दूसरों को दोष दे अपनी पीठ ठोकने लगते हैं। यह दुःखद के साथ-साथ चिन्ताजनक भी है। 

सही उत्तर यह है कि हिन्दूवादियों ने हिन्दू-हित या देश-हित के हर बिन्दु पर पहले पार्टी-हित बढ़ाने की चिन्ता रखी। साथ ही, कहीं साहस का परिचय न दिया। मामूली जेल तक जाने का कष्ट नहीं उठाया। इसीलिए, हिन्दू धर्म हित के असल मुद्दे उठाने के बदले सदैव सांकेतिक, सुविधाजनक मुद्दे चुने, जैसे गोरक्षा या एक राम-मंदिर। यदि बुनियादी मुद्दे उठा कर लड़ा जाता तो ये सब स्वतः सुलझ चुके होते। दिखावटी मुद्दे केवल दलीय स्वार्थ साधने भर काम आते रहे। 

अतः हिन्दूवादी नेताओं, संगठनों को सचमुच चिंतन करना चाहिए। रुटीन बैठक, कोरी पार्टीबाजी, दिखावे, जिद और अज्ञान से दूर होना चाहिए। संगठन को सुबुद्धि से जोड़ें। सुबुद्धि के बिना संगठन सिर-विहीन देह है। जैसी सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी थी जिस के भी करोड़ों सदस्य थे। 

अपने भी सुयोग्य लोगों को जिम्मेदारी देनी चाहिए, न कि महज चुनावी तिकड़मियों, दावेदारों, बड़बोलों को। इस में कांग्रेस से भी सीख सकते हैं। अच्छी-बुरी नीतियाँ कांग्रेस नेतृत्व तय करता है, पर उन को लागू करने के काम देश-विदेश के सुयोग्य व्यक्तियों को देता है।  

सो, संगठन-वृद्धि की प्राथमिकता से उबरें। स्वामी विवेकानन्द की सीख थी कि यदि सच्चा सेवा-भाव हो, तो कम लोग भी बड़ी-बड़ी स्थितियाँ बदल सकते हैं। वह तनिक भी गलत साबित नहीं हुई है। 

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