अयोध्या मामले में राजनीति का मौका

अजित कुमार -- अयोध्या में राम जन्मभूमि मंदिर और बाबरी मस्जिद की जमीन के मालिकाना हल को लेकर चल रहे मुकदमे में देश की सर्वोच्च अदालत में जो कुछ हो रहा है उससे इस मसले कई पक्षों को राजनीति करने का मौका मिल रहा है। इस मामले में 29 अक्टूबर को सुनवाई शुरू होनी थी। सुप्रीम कोर्ट के पिछले चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने 29 अक्टूबर से सुनवाई की तारीख तय की थी। अब इस मामले में अगली सुनवाई 29 जनवरी को होने वाली है। 

यानी बीच के तीन महीने में इस मामले में कानूनी प्रक्रिया बिल्कुल आगे नहीं बढ़ी है। वह जहां थी वहीं खड़ी है। इससे पहले यह मामला सात साल से लंबित था। पर ऐसा लग रहा था कि 29 अक्टूबर के बाद सुनवाई होगी और यह मामला अंतिम फैसले तक पहुंचेगा। पर चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने इसे पहले जनवरी के पहले हफ्ते तक टाला। फिर यह मामला दस जनवरी तक टला और अब 29 जनवरी तक टल गया है। 

अदालत के इस रुख से अयोध्या मामले पर राजनीति तेज हुई है। हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दो टूक अंदाज में कह दिया है कि इस पर सरकार की भूमिका तभी है, जब अदालती प्रक्रिया पूरी हो। यानी मामले के लंबित रहते सरकार न तो अध्यादेश लाने जा रही है और न किसी कानून की पहल करने जा रही है। सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई टल रही है और सरकार कोई पहल नहीं कर रही है, ऐसे में दूसरी ताकतों को राजनीति करने का मौका मिल रहा है। अगले हफ्ते प्रयागराज में कुंभ का मेला शुरू हो रहा है वहां इसे लेकर राजनीति और तेज होगी। 

अयोध्या मामला टलने का ताजा कारण जस्टिस उदय उमेश ललित बने हैं। उन्होंने खुद को सुनवाई से अलग कर लिया। दो दिन पहले ही चीफ जस्टिस ने पांच जजों की बेंच बनाई थी, जिसे दस जनवरी से सुनवाई शुरू करनी थी। पर सुनवाई शुरू होते ही मुस्लिम पक्ष की ओर से पेश वकील राजीव धवन ने अदालत में कहा कि जस्टिस यूयू ललित 1994 में भाजपा के नेता कल्याण सिंह के वकील रह चुके हैं। हालांकि उन्होंने जस्टिस ललित को संविधान पीठ से अलग होने की मांग नहीं की पर जस्टिस ललित ने खुद को बेंच से अलग कर लिया और इस तरह फिर सुनवाई टल गई। 

अब 29 जनवरी की नई तारीख सुनवाई के लिए तय की गई है। चीफ जस्टिस अब नई बेंच बनाएंगे। इस बीच मंदिर का मुद्दा बना रहे हिंदुवादी संगठनों को राजनीति का मौका मिल गया है। यह प्रचार शुरू हो गया है कि एक साजिश के तहत सुनवाई टलवाई जा रही है। ध्यान रहे मुस्लिम पक्ष की ओर से पेश वकीलों सहित कुछ और वकीलों ने पिछले साल कहा था कि इसकी सुनवाई लोकसभा चुनाव के बाद होनी चाहिए। तब चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने यह मांग ठुकरा दी थी। मौजूदा चीफ जस्टिस ने यह मांग ठुकराई नहीं है पर अपने आप हालात ऐसे बन रहे हैं कि सुनवाई टल रही है। 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक जनवरी को दिए गए अपने एक इंटरव्यू में कांग्रेस से अपील की थी कि वह अपने वकीलों के जरिए सुनवाई में अड़ंगा डालने का प्रयास न करे। उन्होंने एक तरह से यह संकेत दिया था कि अगर कांग्रेस अड़ंगेबाजी नहीं करे तो मामले की जल्दी सुनवाई हो सकती है। पहले से यह चर्चा चली हुई थी और सोशल मीडिया के जरिए प्रचार हो रहा था कि कांग्रेस अपने वकीलों के जरिए सुनवाई टलवा रही है। गुरुवार के घटनाक्रम के बाद यह अटकलें और तेज हो गई हैं कि कांग्रेस किसी तरह से सुनवाई टलवा रही है। 

अगर यह धारणा मजबूत होगी तो जमीनी स्तर पर कांग्रेस के खिलाफ गुस्सा बढ़ेगा और लोगों में बेचैनी बढ़ेगी। इसका क्या राजनीतिक असर होगा वह अलग बात है पर जमीनी स्तर पर माहौल जरूर बिगड़ेगा। ध्यान रहे उत्तर प्रदेश के प्रयाग राज में 14 जनवरी से कुंभ मेले की शुरुआत हो रही है, जिसमें सारे हिंदू समूह मौजूद रहेंगे और विश्व हिंदू परिषद की धर्म सभा भी होगी। इसमें मंदिर को लेकर कुछ प्रस्ताव मंजूर हो सकता है। 

अब सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस पांचवें जज को नियुक्त करके नई संविधान पीठ बनाएगी, जो 29 जनवरी को बैठेगी और तय करेगी कि इस मामले पर कब से और कैसे सुनवाई हो। अगर अब कोई अड़चन नहीं आती है और फरवरी के पहले हफ्ते में सुनवाई शुरू हो जाती है तब भी लोकसभा चुनाव से पहले इसके किसी फैसले तक पहुंचने की उम्मीद कम हो गई है। 

सुप्रीम कोर्ट में रोजाना सुनवाई का मतलब होता है कि हफ्ते में तीन दिन सुनवाई होगी। ऐसे में किसी तरह से मामला मार्च तक खींच जाएगा और तब तक आम चुनाव की घोषणा हो जाएगी। अगर सुनवाई पूरी हो भी गई तो इसकी संभावना कम है कि अदालत चुनाव प्रचार के बीच फैसले का ऐलान करे। सो, ऐसा लग रहा है कि भाजपा सरकार के इस कार्यकाल में मंदिर का मसला नहीं सुलझ पाएगा। उसे मंदिर पर बिना किसी ठोस फैसले के चुनाव में जाना होगा। ऐसे में उसे इस मसले पर बहुत सफाई देनी होगी। 

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