बांहें पसार कर तुर्की का स्वागत क्यों?

श्रुति व्यास
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(image) प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार को भारत और तुर्की के कारोबारियों के एक सम्मेलन में कहा कि वे बांहें पसार कर तुर्की के लोगों के स्वागत के लिए तैयार हैं। उन्होंने कहा कि वे भारत में आएं और निवेश करें क्योंकि भारत निवेश के लिए इतनी आकर्षक जगह पहले कभी नहीं रहा है। जब उन्होंने यह न्योता दिया उस समय तुर्की के राष्ट्रपति रज्जब तैयब एर्दोआन भी मंच पर मौजूद थे। प्रधानमंत्री मोदी का इस न्योते में कोई नई बात नहीं है। पहले भी जितने देशों के प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति भारत आते हैं, उनके साथ आने वाले कारोबारी प्रतिनिधिमंडल को मोदी ऐसा न्योता देते रहे हैं। वे जब भी विदेश जाते हैं तो वहां भी दोनों देशों के कारोबारियों की बैठक में प्रधानमंत्री न्योता देते हैं। वे यह दावा करते हैं कि उनकी सरकार के आने के बाद कारोबार का माहौल बदला है और भारत में लोगों के लिए कारोबार करना आसान हुआ है। सो, कहा जा सकता है कि रूटीन के तहत प्रधानमंत्री ने तुर्की के कारोबारियों को न्योता दिया।
तुर्की के साथ साझा सरोकारों के आधार पर संबंध मुश्किल है। पाकिस्तान के प्रति उसका रुख दोस्ताना है।
लेकिन क्या तुर्की के साथ भारत किसी साझा सरोकार के आधार पर संबंध बना सकता है? इस सवाल का जवाब ना होगा। इसके कई कारण हैं। एक कारण खुद राष्ट्रपति एर्दोआन हैं, जो पाकिस्तान को अपना दूसरा घर मानते हैं। वे तुर्की के बाहर पाकिस्तान को अपना घर बताते रहे हैं और 2009 में पाकिस्तान ने उनको अपने सर्वोच्च नागरिक सम्मान निशान ए पाकिस्तान से सम्मानित किया था। वे दुनिया के सिर्फ चौथे नेता हैं, जिन्होंने पाकिस्तान की संसद को संबोधित किया है। पाकिस्तान के साथ इस निजी जुड़ाव के आधार पर ही वे कश्मीर में पाकिस्तान के दावे को भी स्वीकार करते हैं। उन्होंने भारत आने से पहले भी कहा कि कश्मीर एक बहुपक्षीय मुद्दा है और इसके समाधान के लिए वे भारत और पाकिस्तान के बीच मध्यस्थता के लिए तैयार हैं। कश्मीर पर उनका यह रुख भारत को कतई मंजूर नहीं है और यह बात प्रधानमंत्री के साथ हुई शिखर वार्ता के दौरान उनको दो टूक अंदाज में समझा दी गई। एर्दोआन दुनिया के उन चंद नेताओं में से हैं, जो परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह, एनएसजी की सदस्यता के लिए पाकिस्तान का समर्थन करते हैं। भारत इस सदस्यता के लिए प्रयास कर रहा है, लेकिन चीन की अड़ंगेबाजी के कारण कामयाबी नहीं मिल रहा है। चीन चाहता है कि पाकिस्तान भी इस समूह में शामिल हो और इस काम में तुर्की उसकी मदद कर रहा है। सो, पाकिस्तान के प्रति तुर्की का जो नजरिया है, वह भारत के साथ उसका साझा सरोकार नहीं बनने देगा। हां, आतंकवाद के मसले पर जरूर दोनों देशों के साझा सरोकार बनते हैं। पिछले दिनों तुर्की के सबसे मशहूर शहर इस्तांबुल में भी हवाईअड्डे पर आतंकवादी हमला हुआ था। तभी मोदी और एर्दोआएन की शिखर वार्ता में आतंकवाद पर चिंता जाहिर की गई और दोनों देश इससे साझा मुकाबले के लिए तैयार हुए। पहले भी आतंकवाद की फैक्टरी के रूप में काम कर रहे तालिबान का विरोध करता रहा है। इसको लेकर पाकिस्तान के साथ उसके संबंधों में थोड़ी तनातनी भी रही, जब पाकिस्तान की ओर से तालिबान का समर्थन किया जा रहा था। लेकिन अब पाकिस्तान ने भी तालिबान का समर्थन बंद कर दिया है। सो, यह कहा जा रहा है कि आतंकवाद पर भारत और तुर्की की सोच समान है।
कश्मीर में पाकिस्तान के दावे को तुर्की स्वीकार करता है। राष्ट्रपति एर्दोआन ने भारत आने से पहले भी कश्मीर को बहुपक्षीय मुद्दा बता कर भारत और पाकिस्तान के बीच मध्यस्थता का प्रस्ताव दिया था। एर्दोआन परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह, एनएसजी की सदस्यता के लिए पाकिस्तान का समर्थन करते हैं। यह भी भारत के हितों के खिलाफ है।
परंतु पाकिस्तान के प्रति तुर्की का जो रवैया है वह भारत को उसका स्वाभाविक साझेदार देश नहीं बनने देगा। इसके मुकाबले भारत का संबंध कूटनीतिक होगा। भारत को भी एनएसजी की सदस्यता के लिए तुर्की के समर्थन की जरूरत है। इसलिए अगर दोनों देशों के कारोबारी संबंधों में इजाफा होता है और दोनों के साझा हित बढ़ते हैं तो हो सकता है कि आने वाले दिनों में तुर्की भारत का समर्थन करे। हालांकि उसके बिना शर्त समर्थन की संभावना कम है और ऐसा सिर्फ पाकिस्तान के कारण होगा। असल में तुर्की और पाकिस्तान के बीच नाभिनाल का संबंध है। भारत की आजादी से पहले इस उपमहाद्वीप के मुसलमान तुर्की का समर्थन करते थे। ऑटोमन साम्राज्य से मुक्ति की लड़ाई और खिलाफत की स्थापना में उनका हर तरह का समर्थन तुर्की को मिलता था। आजादी के बाद जब पाकिस्तान अलग मुल्क बना तब दोनों देशों के कूटनीतिक संबंध मुस्लिम भाईचारे की वजह से और मजबूत हुए। अभी दोनों के बीच कारोबारी संबंध भी बहुत अच्छे हैं। पाकिस्तान हथियारों की बड़ी खरीद तुर्की से करता है। अभी अगर अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के लिहाज से देखें तो भारत और तुर्की में बहुत कम चीजें साझा हैं। दोनों का कारोबार कम है, दोनों के साझा सरोकार कम हैं और दोनों के साझा दोस्त भी कम हैं। एक अमेरिका को छोड़ दें तो दोनों के साझा दोस्त भी नहीं हैं। वैसे भारत पिछले कुछ समय से सऊदी अरब के साथ संबंध बेहतर बनाने में लगा हुआ है, जिसके साथ तुर्की के अच्छे संबंध हैं। फिर भी यह मानने में कोई हिचक नहीं है कि तुर्की के साथ हमारे साझा सरोकार कम हैं और भारत के हितों के मुद्दे पर तुर्की दूसरे पाले में खड़ा है। तभी आजादी के एक साल बाद 1948 दोनों देशों के बीच बने कूटनीतिक संबंध अभी तक ज्यादा फले फूले नहीं हैं। इसलिए बांहें पसार कर उसके स्वागत का कोई खास अर्थ नहीं है।
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