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पांच साल का हिसाब देने का समय

अजित द्विवेदी
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पांच साल के अपने कामकाज का हिसाब देने का समय आ गया है। उन्होंने खुद कहा था कि वे लोकसभा चुनाव में अपने पांच साल का हिसाब देंगे। लोकसभा चुनाव की घोषणा से पहले वे एक सौ जनसभाएं करने वाले हैं। कायदे से इसमें उनको अपनी सरकार के कामकाजा का ब्योरा देना चाहिए और आराम से बैठना चाहिए। क्योंकि बकौल खुद उन्होंने इतना काम किया है, जितना 60 साल में देश में नहीं हुआ। वे कहते हैं कि 60 साल में देश में कोई काम नहीं हुआ। फिर भी 50 साल तक कांग्रेस सत्ता में रही। सो, जब उन्होंने 60 साल के बराबर काम पांच साल में कर दिया है तो उनको कौन हटाएगा! वे आराम से घर बैठे चुनाव जीतेंगे! लोग उनके काम का सिला देंगे! आखिर उन्होंने अपने काम के प्रचार पर 52 सौ करोड़ रुपए खर्च किए हैं! लोगों को काम से फायदा हुआ हो या नहीं पर इतने भारी भरकम प्रचार से उनको पता तो चल ही गया होगा कि सरकार ने उनके लिए कितना काम किया है! 

इतना काम करने और उस काम का इतना प्रचार करने के बावजूद हैरानी की बात है कि प्रधानमंत्री अपनी सभाओं में लोगों को अब भी यहीं बता रहे हैं कि कांग्रेस ने क्या क्या नहीं किया था या क्या क्या गलत किया था। पांच साल सरकार में रहने के बावजूद पूरी भाजपा विपक्ष के मोड से बाहर नहीं निकली है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित पार्टी के सारे नेता ऐसे प्रचार कर रहे हैं जैसे भाजपा विपक्ष में हो और कांग्रेस सरकार चला रही हो। अब भी भाषण का 70 फीसदी से ज्यादा कंटेंट सोनिया, राहुल गांधी के परिवार और कांग्रेस पर हमले का होता है। राजदार, नामदार, कामदार का सारा जुमला कांग्रेस पर हमले के लिए गढ़ा गया है। बहरहाल, यह अलग विश्लेषण का विषय है कि ऐसा आदतन हो रहा है या किसी रणनीति के तहत!

फिलहाल तो ज्यादा आकलन का विषय यह है कि पांच साल में केंद्र की नरेंद्र मोदी की सरकार और ज्यादातर राज्यों की भाजपा सरकारों ने विकास के डबल इंजन के साथ जो काम किया है उससे देश के आम लोगों का जीना आसान हुआ है या नहीं! किसी भी सरकार के कामकाज का आकलन कायदे से इसी आधार पर होना चाहिए कि उसके काम से आम आदमी के जीवन पर क्या असर हुआ? करीब दो सदी पहले महान दार्शनिक ज्यां जॉक रूसो के सामने यहीं सवाल था कि आधुनिक विज्ञान व कलाओं के विकास ने इंसान के जीवन को बेहतर बनाया या खराब किया है? उन्होंने दो टूक जवाब दिया था कि इनमें आम आदमी का जीवन ज्यादा मुश्किल, ज्यादा अरक्षित हुआ है।  

प्रधानमंत्री मोदी आंकड़े दे रहे हैं। उन्होंने सवा करोड़ घर बनवा दिए हैं, पांच करोड़ लोगों को उज्ज्वला योजना से गैस कनेक्शन मिल गए हैं, किसानों की आय उन्होंने डेढ़ गुनी कर दी है, 30 करोड़ जन धन खाते खुल गए हैं, कई करोड़ शौचालय बन गए हैं, कितने सौ जिले खुले में शौच से मुक्त हो गए हैं और बकौल प्रधानमंत्री स्वच्छता अभियान की सफलता के कारण तीन लाख लोगों की जान बची है। इन सबकी वजह से आम आदमी के जीवन में क्रांतिकारी बदलाव आना चाहिए था। पर असल में ऐसा नहीं हुआ है। हालांकि इसमें संदेह नहीं है कि ये योजनाएं सैद्धांतिक रूप से बहुत अच्छी और जरूरी हैं। इनकी सफलता लोगों का जीवन बदल सकती है। सिर्फ इन योजनाओं का जिक्र करना अधूरा सच जाहिर करने की तरह है। इन योजनाओं का वस्तुनिष्ठ आकलन करने के साथ साथ उन दूसरी योजनाओं के असर को भी इनके साथ जोड़ना होगा, जो सैद्धांतिक रूप से ही गलत हैं और जिन्होंने करोड़ों लोगों के जीवन को नकारात्मक तरीके से प्रभावित किया।

प्रधानमंत्री अब नोटबंदी के असर पर बात नहीं करते हैं। वे एक लाइन में इसे जरूरी बता कर आगे बढ़ जाते हैं। वे जीएसटी के फायदे भी अब नहीं बताते हैं। अर्थव्यवस्था को डिजिटल और कथित तौर पर साफ सुथरा बनाने के लिए नकद के इस्तेमाल और बैंकिंग नियमों में किए गए बदलावों के बारे में भी प्रधानमंत्री बात नहीं करते हैं। पशुओं के कारोबार को नियंत्रित करने के लिए कानून बनाने की पहल और गौरक्षा, मॉब लिंचिंग आदि के बारे में तो कोई बात ही नहीं होती है। पेट्रोल, डीजल पर उत्पाद शुल्क बढ़ा कर लाखों करोड़ रुपए जुटाने के फायदे के बारे में भी बात नहीं होती है। आभूषण कारोबारियों पर लगाए गए कर के बारे में भी बात नहीं होती है। इस तरह के और भी कई छोटे, बड़े फैसले हुए, जिसने देश के आम आदमी, कारोबारी, मजदूर, किसान आदि के जीवन को सीधे प्रभावित किया। या ऐसा कह सकते हैं कि मुश्किल में डाला!

सरकार के सारे हल्ले के बीच दिसंबर 2018 में आए कुछ आंकड़े सरकार के प्रचार की पोल खोलते हैं। दिसंबर में आय कर रिटर्न घट कर 1.1 फीसदी पर आ गया है, जो पिछले साल इसी समय 15 फीसदी के करीब था। दिसंबर में जीएसटी की वसूली 93 हजार करोड़ रही, जिसके औसतन एक लाख करोड़ रुपए होने का दावा किया जा रहा था। और सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी, सीएमआईई ने अपनी सालाना रिपोर्ट में बताया है कि अकेले 2018 में भारत में एक करोड़ दस लाख नौकरियां खत्म हो गई हैं। कहां तो हर साल दो करोड़ लोगों को नौकरी देनी थी और कहां एक साल में एक करोड़ दस लाख नौकरी खत्म होने लगी। नए निवेश की रिपोर्ट ये है कि यह 14 साल के सबसे निचले स्तर पर है। यह नोटबंदी के दो साल बाद और जीएसटी के एक साल बाद का आंकड़ा है। जाहिर है कि पांच साल के हिसाब में तो यह नहीं बताया जा सकता है। 

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