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भ्रष्टाचार से लड़ने की विफल राजनीति?

अजित द्विवेदी
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ऐसा लग रहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भ्रष्टाचार विरोधी राजनीति के मास्टर हैं। उन्होंने सारी विपक्षी पार्टियों की नकेल कस दी है। सब भागते फिर रहे हैं और जनता में ईमानदार मोदी सरकार की जय जयकार हो रही है। यह वो तस्वीर है, जो सबको दिख रही है। पर क्या यह किसी को दिख रहा है कि कांग्रेस भी जाने अनजाने में भ्रष्टाचार के मुद्दे पर ही राजनीति कर रही है और भले बड़ी तस्वीर में वह नहीं दिख रही है पर उसकी राजनीति ने भाजपा और नरेंद्र मोदी की भ्रष्टाचार विरोधी राजनीति की धार बहुत हद तक कुंद कर दी है! कांग्रेस ने यह काम अभी नहीं किया है, बल्कि केंद्र मोदी की सरकार आने के बाद पहले दिन से करना शुरू कर दिया था। अफसोस की बात यह है कि पहले दिन से मोदी ने वह काम शुरू नहीं किया, जिसका वादा था। वे चुनाव से ऐन पहले सक्रिय हुए, जिससे उनकी भ्रष्टाचार विरोधी राजनीति को वैधता नहीं मिल पा रही है। 

पांच साल पहले 26 मई 2014 को जिस दिन नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री की कुर्सी संभाली उस दिन देश के अधिकांश लोगों को पाकिस्तान या सार्क देशों के साथ भारत के संबंधों की चिंता नहीं थी। देश का विकास होगा यह जरूर लोगों के मन में था, लेकिन सबसे ज्यादा जो इच्छा हिलोरें मार रही थीं वह ये थी कि भ्रष्टाचार पर कार्रवाई होगी, विदेश में जमा काला धन वापस आएगा, संसद और विधानसभाओं में बैठे दागी नेता जेल में होंगे और कांग्रेस की कथित लूट में शामिल सारे लोग, जिसमें रॉबर्ट वाड्रा भी शामिल हैं, कानून के शिकंजे में होंगे। लोकपाल की नियुक्ति हो जाएगी और प्रधानमंत्री व राज्यों के मुख्यमंत्री इसके दायरे में आ जाएंगे। 

पहले दिन से प्रधानमंत्री को यह काम करना चाहिए था। पर उन्होंने सबसे कम ध्यान इस मोर्चे पर दिया। विदेश में जमा काला धन वापस लाने की मुहिम पहले दिन से पंक्चर हुई, जिसे लेकर भाजपा के दो बड़े नेताओं और सार्वजनिक बुद्धिजीवियों – राम जेठमलानी व सुब्रह्मण्यम स्वामी ने अपनी ही सरकार के खिलाफ और खास कर वित्त मंत्री अरुण जेटली के खिलाफ मोर्चा खोला। आज भाजपा और केंद्र सरकार कांग्रेस पर आरोप लगा रहे हैं कि उसके समय कोई भी रक्षा सौदा बिना बिचौलिए के नहीं हुआ पर एक समय ऐसा आया था, जब उस समय के रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने रक्षा सौदों में बिचौलियों को आधिकारिक रूप से शामिल करने की पहल की थी। वह देश के लोगों के लिए किसी सदमे से कम नहीं था। 

सरकार कोई न कोई बहाना बना कर लोकपाल की नियुक्ति टालती रही, जो अभी तक टली हुई है। जिस किस्म की चयन समिति को सीबीआई निदेशक की नियुक्ति करनी थी, उससे थोड़ी बड़ी कमेटी को लोकपाल की नियुक्ति करनी थी। सीबीआई निदेशक की नियुक्ति करने वाले कमेटी में मुख्य विपक्षी पार्टी की बजाय सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के नेता को शामिल करने का जरूरी संशोधन कर दिया गया पर लोकपाल की चयन समिति के लिए वहीं संशोधन नहीं किया गया। इससे सरकार की मंशा साफ हो गई कि वह लोकपाल नहीं बनाने जा रही है। इसी तरह सांसदों और विधायकों के मुकदमों की सुनवाई के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने का मामला भी आखिरी साल तक अटका रहा और अब जाकर सुप्रीम कोर्ट के आदेश से कुछ राज्यों में ऐसी अदालतें बनी हैं। सो, यह कहा जा सकता है कि सरकार भ्रष्टाचार से लड़ने, काला धन लाने, संसद व विधानसभाओं की सफाई करने और विपक्षी पार्टियों की दशकों की लूट का खुलासा करने के अपने वादे को पूरा करने में पूरी तरह से विफल रही हैं। तमाम मुहंजबानी दावों के यह हकीकत है कि इस मामले में सरकार की अपनी विश्वसनीयता शून्य हो गई है। 

अब रही बात संस्थाओं की, जिन्होंने मनमोहन सिंह की दूसरी सरकार को गिराने में सबसे अहम भूमिका निभाई थी। पिछले पांच साल में सबसे ज्यादा क्षरण उन संस्थाओं की विश्वसनीयता में हुआ है और यहीं काम कांग्रेस व दूसरी विपक्षी पार्टियों ने बहुत व्यवस्थित तरीके से किया है। संभव है कि कांग्रेस इन संस्थाओं के प्रति अपनी खुन्नस भी निकाल रही हो पर उसे ऐसा करने का मौका सरकार ने दिया। सरकार ने अपने अहंकार या अपनी नासमझी में सीबीआई, सीवीसी, सीएजी, सीईसी, ईडी और यहां तक की न्यायपालिका जैसी संस्थाओं का बिल्कुल नौसिखुआ अंदाज में इस्तेमाल किया, जिससे कांग्रेस को इन संस्थाओं के खिलाफ अभियान चलाने का मौका मिला। उसका नतीजा यह हुआ है कि ये संस्थाएं अपनी किसी कार्रवाई से आम जनता के मन में यह भरोसा नहीं पैदा कर सकीं कि उनकी कार्रवाई निष्पक्ष और स्वतंत्र है। 

जहां तक भ्रष्टाचार से लड़ने की राजनीति का सवाल है तो उसमें भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राजनीति बहुत असरदार नहीं हो रही है क्योंकि इस राजनीति में कुछ बुनियादी गलतियां हुई हैं। जब प्रधानमंत्री मोदी ने कांग्रेस मुक्त भारत की बात की थी और 60 साल की उसकी लूट का हवाला दिया था तो कार्रवाई सिर्फ उसके खिलाफ होनी चाहिए थी या शुरुआत उससे होनी चाहिए थी। उसमें सरकार और भाजपा को लगभग सभी विपक्षी पार्टियों का साथ मिलता। पर सरकार ने उलटा किया कांग्रेस की बजाय उसका फोकस ममता बनर्जी, मायावती, अखिलेश यादव, लालू प्रसाद जैसे प्रादेशिक क्षत्रपों पर हो गया। बहुत बाद में कांग्रेस नेताओं पर कार्रवाई शुरू हुई, जिसका नतीजा यह हुआ है कि विपक्ष को एकजुट होने का मौका मिल गया। पहले तो सांस्थायिक काम जो होने थे, नहीं हुए और उसके बाद निजी तौर पर नेताओं के खिलाफ कार्रवाई शुरू हुई, जिससे विपक्ष एकजुट हुआ और जनता में यह मैसेज गया कि कार्रवाई राजनीतिक मकसद से हो रही है।

रही सही कसर नोटबंदी और राफेल ने पूरी कर दी। भ्रष्टाचार से लड़ाई के नाम पर नोटबंदी हुई थी पर उसका भी मैसेज यह प्रचारित हुआ कि उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव से पहले हुई इस नोटबंदी का मकसद विपक्षी पार्टियों खास कर सपा और बसपा की नकदी को खत्म करना था। ऊपर से नोटबंदी के बाद सारे पैसे बैंक में वापस आ गए और रोजगार व कारोबार भट्ठा बैठ गया। फिर राफेल विमान सौदे की कथित गड़बड़ियों का हल्ला मचा, जिससे कम से कम चुनाव तक पार पाना सरकार और भाजपा के लिए संभव नहीं लग रहा है। इससे मोदी सरकार के ईमानदार सरकार होने का मिथक टूटा है।

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