Loading... Please wait...

पीएम दावेदार बनने की होड़ क्यों?

तन्मय कुमार -- कहा जा सकता है कि यह बहस मीडिया ने शुरू कराई है। पर उससे पहले इसका आधार भारतीय जनता पार्टी ने तैयार किया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह हर जगह गठबंधन पर हमला करते हुए यह बात कह रहे हैं कि इनके पास नेता कहां है। ध्यान रहे पिछले साल हुए राज्यों के चुनाव में भी भाजपा ने मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में विपक्ष पर यह कहते हुए हमला किया था कि उनके पास मुख्यमंत्री का चेहरा नहीं है। 

भाजपा के वरिष्ठ नेता राजनाथ सिंह ने हर जगह पूछा कि बारात तो तैयार है पर दूल्हा कहां है। कांग्रेस की बिना दूल्हे की बारात को तीनों राज्यों में सत्ता की दुल्हन मिल गई। भाजपा के दूल्हे बेचार दिल्ली में उपाध्यक्ष बना दिए गए हैं। उसी तरह भाजपा अब लोकसभा चुनाव के लिए पूछ रही है कि विपक्ष का नेता कौन है। भाजपा के इस नैरेटिव को मीडिया ने पकड़ा है और हर जगह यह सवाल पूछा जा रहा है। सपा, बसपा के गठबंधन की घोषणा के लिए हुई प्रेस कांफ्रेंस में भी यह सवाल पूछा गया। 

कांग्रेस और उसकी सहयोगी पार्टियों से हर जगह यह सवाल पूछा जा रहा है। यह बड़ा उलझाने वाला सवाल है, जिसका सीधा जवाब कोई नहीं दे सकता है। अखिलेश यादव ने यह कह कर पीछा छुड़ाया का उत्तर प्रदेश का ही कोई नेता प्रधानमंत्री बनेगा। ध्यान रहे पीएम पद के तीन सबसे प्रमुख दावेदार – नरेंद्र मोदी, राहुल गांधी और मायावती उत्तर प्रदेश से ही आते हैं। बहरहाल, सवाल है कि भारत में जब राष्ट्रपति प्रणाली नहीं है तो उम्मीदवार घोषित करके लड़ने की बात क्यों होनी चाहिए? दूसरा सवाल है कि इसका फायदा किसको होगा?

भारत में संसदीय प्रणाली है, जिसमें मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री का चुनाव सीधे नहीं होता है। चुनाव जीतने वाली पार्टी के विधायक मुख्यमंत्री चुनते हैं और सांसद प्रधानमंत्री का चुनाव करते हैं। पार्टी प्रणाली मजबूत होने से इतना होता है कि पार्टी हाईकमान जिसका नाम तय करता है विधायक या सांसद उसका चुनाव कर देते हैं। प्रधानमंत्री पद का या मुख्यमंत्री पद का दावेदार घोषित करके चुनाव लड़ने की परंपरा भाजपा ने ही शुरू की। भाजपा ने अटल बिहारी वाजपेयी को दावेदार बना कर चुनाव लड़ा था। 

2003 में मध्य प्रदेश में उमा भारती को और राजस्थान में वसुंधरा राजे को दावेदार बना कर पार्टी चुनाव लड़ी थी। लोगों ने मध्य प्रदेश में उमा भारती को तीन-चौथाई बहुमत दिया पर पार्टी ने उनको एक साल में हटा दिया। सवाल है कि जब सीधे जनता मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री चुनेगी तो उसको पार्टी कैसे पद से हटा सकती है? इस सवाल पर अब विचार नहीं होता है। अब नेता की लोकप्रियता, छवि और जातीय समीकरण को ध्यान में रख घोषणा कर दी जाती है। 

बहरहाल, भाजपा को भरोसा है कि नरेंद्र मोदी की अखिल भारतीय लोकप्रियता है और उनकी लोकप्रियता का मुकाबला करने वाला कोई नेता विपक्ष के पास नहीं है। टीना फैक्टर यानी देयर इज नो ऑल्टरनेटिव का जो फैक्टर वाजपेयी के समय बताया जाता था वहीं मोदी के समय भी बताया जा रहा है। तभी भाजपा मोदी के नाम पर भरोसे में है और विपक्ष पर दबाव बना रही है कि वह अपना उम्मीदवार घोषित करे। अगर विपक्ष इस ट्रैप में फंसता है और किसी को भी उम्मीदवार घोषित करता है तो पूरी लड़ाई बदल जाएगी। पांच साल के मोदी राज की बातें भूला दी जाएंगी। फिर दूसरी ओर से घोषित उम्मीदवार के शासन की तुलना होगी और जातीय समीकरण बनाया जाएगा। तभी कांग्रेस भी राहुल गांधी को उम्मीदवार घोषित नहीं करना चाहती है। पर ममता बनर्जी और मायावती दोनों की पार्टियों में बेचैनी है। भाजपा ने खुद ही टीडीपी नेता चंद्रबाबू नायडू को भी दावेदार बना दिया है। इन सबके अपने फायदे या नुकसान हैं पर यह एक गलत परंपरा की शुरुआत है, जिसका विरोध पार्टियों को करना चाहिए और इस लाइन पर डटे रहना चाहिए कि प्रधानमंत्री का चुनाव 17वीं लोकसभा में बहुमत हासिल करने वाली पार्टी या गठबंधन के सांसद ही करेंगे। 

विपक्षी रणनीतिकारों में कई ऐसे हैं और कई बुद्धिजीवी भी ऐसे हैं, जो मानते हैं कि मायावती प्रधानमंत्री पद की बेहतर दावेदार होंगी। उनका मानना है कि देश के मुस्लिम और ईसाई पहले से भाजपा को वोट नहीं देंगे और मायावती को दावेदार बनाने से दलित का एकमुश्त वोट भी भाजपा विरोध में चला जाएगा। आदिवासी भी खुद को दलित दावेदार के करीब पाएंगे और महिला होने के नाते मायावती को महिलाओं का भी वोट  मिलेगा। पर इसके विरोध में ओबीसी और सवर्ण का बड़ा वोट एकजुट हो सकता है। 

यानी इसके कुछ फायदे हैं तो कुछ नुकसान भी हैं। एक बड़ा नुकसान यह भी है कि पूरा चुनाव नकारात्मक जातीय गोलबंदी पर सिमट जाएगा, जो लोकतंत्र के लिए अच्छा नहीं होगा। यह बात राहुल गांधी और ममता बनर्जी की दावेदारी पर भी लागू होती है और नायडू की दावेदारी पर भी। तभी भाजपा और मीडिया के इस ट्रैप की अनदेखी करके विपक्ष को इस लाइन पर टिके रहना चाहिए कि प्रधानमंत्री का फैसला चुनाव के बाद होगा। 

254 Views

बताएं अपनी राय!

नीचे नजर आ रहे कॉमेंट अपने आप साइट पर लाइव हो रहे है। हमने फिल्टर लगा रखे है ताकि कोई आपत्तिजनक शब्द, कॉमेंट लाइव न हो पाए। यदि ऐसा कोई कॉमेंट- टिप्पणी लाइव हुई और लगी हुई है जिसमें अर्नगल और आपत्तिजनक बात लगती है, गाली या गंदी-अभर्द भाषा है या व्यक्तिगत आक्षेप है तो उस कॉमेंट के साथ लगे ‘ आपत्तिजनक’ लिंक पर क्लिक करें। उसके बाद आपत्ति का कारण चुने और सबमिट करें। हम उस पर कार्रवाई करते उसे जल्द से जल्द हटा देगें। अपनी टिप्पणी खोजने के लिए अपने कीबोर्ड पर एकसाथ crtl और F दबाएं व अपना नाम टाइप करें।

आपका कॉमेट लाइव होते ही इसकी सूचना ईमेल से आपको जाएगी।

© 2019 ANF Foundation
Maintained by Quantumsoftech