Loading... Please wait...

‘नाथ’ दो कदम आगे तो ‘भाजपा’ चार कदम पीछे..!

राकेश अग्निहोत्री मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के साथ कमलनाथ और उनकी कांग्रेस दो कदम आगे निकल चुकी तो भाजपा चार कदम पीछे आने को मजबूर हुई.. जिस कांग्रेस पर नेतृत्व विहीन और चेहरा भी न होने का आरोप भाजपा चुनाव में लगाती रही.. वह खुद इन दिनों नेतृत्व विहीन नजर आ रही.. तो स्वीकार चेहरे का संकट भी पार्टी में बढ़ गया.. यानी दिग्विजय सिंह, ज्योतिरादित्य सिंधिया से समन्वय बनाकर कमलनाथ अपनी स्वीकार्यता पर पार्टी की मुहर लगवा चुके हैं, तो शिवराज को पीछे धकेलकर भाजपा कोई चेहरा ऐसा सामने नहीं ला पाई, जिसके पीछे एक साथ सभी खड़े नजर आए..

इससे उलट कमलनाथ मुख्यमंत्री के साथ प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी भी संभाल कर आगे बढ़ रहे... तो भाजपा में नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव और प्रदेश भाजपा अध्यक्ष राकेश सिंह के बावजूद पार्टी का पूरा फोकस जमीनी लड़ाई अभी भी लड़ रहे शिवराज पर बना हुआ है.. एक माह में मूल्यांकन का मौका  जब मध्यप्रदेश में सल्तनत बदल चुकी  और दिल्ली से लोकसभा चुनाव का शंखनाद हो चुका है.. कांग्रेस सरकार के खाते में कोई बड़ी उपलब्धि ना हो, लेकिन राहुल गांधी के कर्ज माफी के एजेंडे को मुख्यमंत्री कमलनाथ ने क्राइटेरिया के तहत ही आगे बढ़ाया है, तो उधर सत्ता से बेदखल होने के बाद भाजपा के अंदर समन्वय-असमंजस का अभाव साफ देखा जा सकता है..

ऐसे में सवाल खड़ा होना लाजमी है कि अपनी दूरदर्शिता चौतरफा प्रबंधन के कारण कमलनाथ यदि कांग्रेस की  नई आशा.. ताकत बनकर उभरे... तो  सवाल आखिर क्यों भाजपा यह तय नहीं कर पा रही कि उसे बदलती भूमिका के साथ शिवराज के साथ या फिर शिवराज के बिना आगे बढ़ना है..कमलनाथ जिन्हें कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव में अपना चेहरा घोषित नहीं किया, लेकिन जीत के साथ ही उस कमलनाथ ने न सिर्फ पार्टी के अंदर अपनी स्वीकार्यता साबित की, बल्कि इस बात का एहसास कराया कि वह पूरे दमखम के साथ अपनी सरकार चला रहे और पूरे 5 साल चलाएंगे..

सरकार गिरा देने की  भाजपा द्वारा दी जा रही चेतावनी पर  मुख्यमंत्री कमलनाथ  का पलटवार  कि भाजपा अपना घर संभाले उनके  इरादों को  जाहिर करता है ..मंत्रिमंडल का गठन  और विभागों के वितरण  के समय गरमाए माहौल को छोड़ दिया जाए कांग्रेस के अंदर हो हल्ला, रस्साकशी, अनबन, मतभेद जैसी बातें पीछे छूटती नजर आ रही हैं, तो प्रोटेम स्पीकर की नियुक्ति को कमलनाथ ने व्यक्तिगत पसंद से जोड़कर जो बिसात विधानसभा अध्यक्ष के चुनाव के लिए बिछाई उसके चलते भाजपा के खाते में उपाध्यक्ष की कुर्सी भी नहीं जाने दी..

दिग्विजय सिंह पूरी शिद्दत के साथ पीछे खड़े हैं तो ज्योतिरादित्य ने भी कोई संदेश ऐसा नहीं जाने दिया, जिससे कमलनाथ कमजोर हों.. सरकार ने प्रचार-प्रसार से बचते हुए गिने-चुने दूसरे फैसलों के साथ किसानों के कर्ज माफी के वादे को निभाने की ठोस जमीन तैयार की.. अफसरों की बदलती भूमिका और चुनावी जमावट दिखाई देने लगी है.. अलबत्ता कांग्रेस संगठन में जरूर कुछ सन्नाटा सा पसरा है, जिन्होंने जाने पहचाने चेहरों से दूर लोकसभा चुनाव के लिए प्रभारियों की नियुक्ति जरूर की, लेकिन भाजपा के कब्जे वाली 26 लोकसभा सीटों पर उसे अभी भी जिताऊ उम्मीदवार की तलाश है.. सारे सूत्र कांग्रेस के फिलहाल कमलनाथ के पास है..

एक माह में कमलनाथ सरकार की उपलब्धियों का मूल्यांकन जल्दबाजी होगा, लेकिन कांग्रेस जिस भाजपा के मजबूत संगठन को बड़ी चुनौती मानती थी वहां अजीबोगरीब ठहराव और उससे आगे बिखराव के संकेत देखने को मिल रहे हैं.. इसे संयोग ही कहा जाएगा कि जब भाजपा को सरकार खोए हुए एक माह होने जा रहा  तब विपक्ष की भूमिका में कई दिग्गज नेता होने के बावजूद भाजपा नेतृत्व भी नजर आ रही है..

ऐसा नहीं कि चुनाव हारने के बाद यह नेता चिंतन मंथन के लिए नहीं बैठे और समीक्षा नहीं की, लेकिन वह कमजोर कड़ियों के साथ हार के लिए जिम्मेदारी वह तय नहीं कर पाई.. वक्त है बदलाव का जुमला भगवाधारी ओं की पार्टी में भी महसूस किया जा रहा है..ऐसे में एक बार फिर 18 जनवरी को भाजपा के सभी तीरंदाज दीनदयाल परिसर में नजर आएंगे, जब अमित शाह के दूत सतीश उपाध्याय और स्वतंत्र देव सिंह की मौजूदगी में राष्ट्रीय संगठन महामंत्री रामलाल प्रदेश भाजपा संगठन के नेताओं से रूबरू होंगे..

इस एक माह में भाजपा की कलई कई बार खुली चाहे फिर वह कांग्रेस पर मुख्यमंत्री और मंत्री चुनने में देरी का आरोप लगाने वाली भाजपा का नेता प्रतिपक्ष चयन में कुछ ज्यादा ही देरी जिसका खामियाजा उसे विधानसभा के अंदर अध्यक्ष ही नहीं उपाध्यक्ष की कुर्सी गंवा कर भुगतना पड़ा, तो इस बीच शिवराज को मध्यप्रदेश से दूर रखने की कोशिश अभी तक चर्चा का विषय बनी.. जब उन्हें राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बना दिया गया.. जो अपनी जमीन मजबूत करने के लिए मैदान में जुट गए हैं.. शाहिद शिवराज अच्छी तरह जानते हैं कि यदि मतदाताओं से भाजपा ने दूरी बनाई तो फिर लोकसभा चुनाव में फायदा और नुकसान ज्यादा उठाना पड़ सकता है ..

लिटिल शिवराज  की नई लड़ाई भाजपा संगठन के गले नहीं उतर रही ..इस बीच कमलनाथ सरकार को गिरा देने का दावा करते हुए भाजपा नेताओं के बयान जरूर सुर्खियां बने ..लेकिन इसके साथ ही यह संदेश भी चला गया कि शिवराज की भूमिका को लेकर पार्टी द्वंद्व से बाहर नहीं निकल पा रही.. पूर्व मुख्यमंत्री और राष्ट्रीय उपाध्यक्ष की हैसियत से शिवराज अकेले दम पर किसानों की लड़ाई लड़ने के लिए ना सिर्फ मैदान में पहुंच गए, बल्कि देर रात तक वह किसानों को भरोसा दिला रहे कि उन्हें उनका हक दिलाने के लिए यह लड़ाई वह हर हाल में लड़ेंगे जबकि दूसरी ओर अमित शाह ने राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाकर उन्हें मध्य प्रदेश से बाहर नई जिम्मेदारी निभाने के स्पष्ट संकेत दिए.. तो सवाल यह भी खड़े किए गए कि शिवराज आखिर अपनी ताकत का एहसास किसे करा रहे ..

प्रदेश संगठन को जो विधानसभा चुनाव में पूरी तरह से एक्सपोज हो गया ..या फिर राष्ट्रीय नेतृत्व को जिसने उनकी भूमिका बदल दी ..या फिर कमलनाथ को जो किसानों के लिए नए फार्मूले के साथ आगे बढ़ रहे.. जो काम अभी तक प्रदेश भाजपा अध्यक्ष राकेश सिंह और नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव मिलजुलकर करना चाहिए था वो माहौल भी नहीं बना पाए.. भाजपा को अपने जिस मजबूत संगठन पर भरोसा था वह चुनाव में कमजोर तो अब तार-तार नजर आ रहा क्योंकि कार्यकर्ता दुविधा असमंजस और पशोपेश में नजर आता ..

ना कोई आंदोलन ना कोई असरदार बैठक और ना ही समन्वय की नए सिरे से नई कोशिश.. भोपाल से लेकर ब्लॉक स्तर पर लोकसभा चुनाव के लिए कोई बड़ा संदेश भाजपा नहीं दे पाई है.. शिवराज को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाए जाने के साथ ही प्रदेश भाजपा संगठन में नेतृत्व परिवर्तन की चर्चा भी थमने का नाम नहीं ले रही.. कार्यकर्ता इस बात को लेकर पसोपेश में हैं कि वह किसकी बात पर यकीन करें और किसके पीछे संघर्ष के लिए तैयार हों..

वे यह नहीं तय कर पा रहा.. कमलनाथ सरकार को पार्टी गिराने में ज्यादा रुचि रखती है या फिर मिशन 2019 लोकसभा चुनाव की तैयारियों को गलती सुधार के साथ.. मैदानी हकीकत में तब्दील करने में उसे विपक्ष की भूमिका निभाने का मानस बनाना है या फिर जोड़-तोड़ के साथ सरकार बनती.. वह देखना चाहेगा.. शिवराज किसानों के बीच स्पष्ट कर चुके हैं कि वह अपने दम पर फिर से सरकार बनाएंगे तो दूसरी ओर पार्टी के जिम्मेदार नेता इस बात का एहसास करा रहे हैं कि जब चाहेंगे इस सरकार को गिरा देंगे.. जिन लोकसभा क्षेत्रों में भाजपा विधानसभा चुनाव हारी वहां वर्तमान सांसद दुविधा में उलझ कर रह गए.. कई दिग्गज चाहे फिर वह केंद्र में मंत्री हों या फिर संगठन में पदाधिकारी.. जहां कमल नहीं खिल पाया वहां से खबरें सामने आ रही हैं..

बड़ा सवाल भाजपा के अंदर नेतृत्व संकट का है.. खासतौर से शिवराज को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाए जाने के बाद संगठन का एक धड़ा यह प्रचारित कर रहा है कि लोकसभा चुनाव तक उनकी सेवाएं ली जाएंगी.. फिर सांसद का चुनाव लड़ाकर राष्ट्रीय राजनीति में भेज दिया जाएगा, तो यहीं पर सवाल खड़ा हो रहा है कि भाजपा का धनी धोरी कौन.. आखिर वह कौन नेता जो सबको साथ लेकर चल सके जो आपस में समन्वय नहीं बना पा रहे और चुनाव हारने के बाद अमित शाह का सीधा हस्तक्षेप देखने को नहीं मिला है जो कार्यकर्ताओं में जोश भर पा रहा है..

189 Views

बताएं अपनी राय!

नीचे नजर आ रहे कॉमेंट अपने आप साइट पर लाइव हो रहे है। हमने फिल्टर लगा रखे है ताकि कोई आपत्तिजनक शब्द, कॉमेंट लाइव न हो पाए। यदि ऐसा कोई कॉमेंट- टिप्पणी लाइव हुई और लगी हुई है जिसमें अर्नगल और आपत्तिजनक बात लगती है, गाली या गंदी-अभर्द भाषा है या व्यक्तिगत आक्षेप है तो उस कॉमेंट के साथ लगे ‘ आपत्तिजनक’ लिंक पर क्लिक करें। उसके बाद आपत्ति का कारण चुने और सबमिट करें। हम उस पर कार्रवाई करते उसे जल्द से जल्द हटा देगें। अपनी टिप्पणी खोजने के लिए अपने कीबोर्ड पर एकसाथ crtl और F दबाएं व अपना नाम टाइप करें।

आपका कॉमेट लाइव होते ही इसकी सूचना ईमेल से आपको जाएगी।

© 2019 ANF Foundation
Maintained by Quantumsoftech