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‘खुदा के लिए’ चुप रहें नसीर साहेब!

अजित द्विवेदी
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नसीरूद्दीन शाह ने 11 साल पहले अपनी पहली पाकिस्तानी फिल्म की थी। उनकी पहली फिल्म थी ‘खुदा के लिए’। शोएब मंसूर की बनाई यह फिल्म ‘इन द नेम ऑफ गॉड’ के नाम से अंतरराष्ट्रीय बाजार में रिलीज हुई। 2013 में उनकी दूसरी फिल्म ‘जिंदा भाग’ के नाम से बनी, जिसे पाकिस्तान की ओर से ऑस्कर में विदेशी भाषा की फिल्म श्रेणी में नामांकित किया गया। पचास साल में पहली बार कोई पाकिस्तानी फिल्म ऑस्कर में गई थी। अभी पाकिस्तान में नसीरूद्दीन शाह की कोई फिल्म रिलीज नहीं हुई है पर हर जुबान पर उनके चर्चे हैं। उन्होंने पाकिस्तान को वह मसाला दिया है, जिसकी भारत विरोध के लिए उसको हमेशा जरूरत होती है। साथ ही इस देश की विभाजनकारी ताकतों को भी ऐसा हथियार दे दिया है, जिसकी उन्हें अल्पसंख्यकों के खिलाफ नफरत फैलाने के लिए जरूरत होती है। 

तीन बार राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीत चुके, पद्म श्री और पद्म भूषण से सम्मानित नसीरूद्दीन शाह ने कहा है कि उनको आज के भारत में अपने बच्चों की फिक्र होती है। डर लगता है कि कहीं कोई भीड़ उन्हें घेर कर उनका मजहब न पूछने लगे कि वे हिंदू हैं या मुसलमान। यह बात उन्होंने बुलंदशहर में पिछले दिनों हुई हिंसा के संदर्भ में कही थी। इस हिंसा में एक पुलिस इंस्पेक्टर सुबोध कुमार सिंह की हत्या कर दी गई थी। 

अगर इसका संदर्भ देते समय नसीरूद्दीन शाह मजहब को बीच में नहीं लाते तो शायद उनकी बता की प्रासंगिकता कुछ समझ में आती और उनकी मंशा पर भी सवाल नहीं उठते। पर उन्होंने मजहब बीच में ला दिया। उनको पता होना चाहिए कि सुबोध कुमार सिंह को उनका मजहब जानते हुए मारा गया। हिंदू दंगाइयों की भीड़ ने उनको मारा। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में दादरी के छोटे से गांव बिसहरा में जिस भीड़ ने अखलाक को मारा था। उसी भीड़ ने अखलाक की हत्या की जांच करने वाले इंस्पेक्टर सुबोध कुमार सिंह को बुलंदशहर में मार डाला। नसीर साहेब इसमें मजहब कहां से आ गया? पुलिस की जिस गोली ने गुजरात में सोहराबुद्दीन शेख और कौसर बी को मारा उसी ने तो तुलसीराम प्रजापति को भी मारा था! फिर आप कैसे इन हत्याओं में मजहब खोज लेते हैं? आप उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और पुलिस की मंशा पर सवाल उठा रहे हैं। उसी पुलिस ने तो एपल कंपनी के एक्जीक्यूटिव विवेक तिवारी की गोली मार कर हत्या कर दी। विवेक तिवारी का न मजहब काम आया और न जाति! 

सो, चिंता बहुत बड़ी है। जाति और मजहब से नहीं राजनीति से जुड़ी है। देश की सत्ता रक्तपिपासु हो गई है और उसके लिए मजहब या जाति का कोई मतलब नहीं रह गया है। सत्ता सर्वोच्च है और उसे हासिल करने के लिए कुछ भी किया जा सकता है। नसीरूद्दीन शाह ने अपने एक बयान से इस विशाल चिंता को बहुत छोटा बना दिया। उन्होंने ऐसी बात कही, जिसका कोई आधार नहीं है और न कोई सिर पैर। जैसे कुछ समय पहले आमिर खान ने अपनी पत्नी के हवाले कहा था कि उनको भारत में डर लगता है। कुछ उसी तरह की बेसिर पैर की बात नसीरूद्दीन शाह ने कही, जिसका मकसद तात्कालिक लाभ लेना, चर्चा में आना और कुछ फिल्में और शो हासिल कर लेने से ज्यादा कुछ और नहीं है। 

उनको पता है कि उनके बेटे को कोई खतरा नहीं है। वैसे ही जैसे आमिर खान की पत्नी किरण राव को नहीं था। नसीरूद्दीन शाह ने रत्ना पाठक से शादी की और अपने बच्चों को मुस्लिम बनाया। वे बहुत सुरक्षित माहौल में मुंबई में रहते हैं और फिल्मों में काम करते हैं। उन्हें कोई खतरा नहीं है और न कोई उनसे उनका मजहब पूछ रहा है। असल में भारत की राजनीति और समाज में इस समय जो नैरेटिव चल रहा है, मजहब उसमें एक प्रतीकात्मक चीज है। देश का आम नागरिक इस बात को समझ रहा है और खुल कर कह रहा है कि मजहब का नैरेटिव वोट लेने और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण कराने के लिए किया जा रहा है। क्या नसीरूद्दीन शाह इस बात को नहीं समझ रहे हैं? इस देश में 20 करोड़ मुसलमान हैं सबको मजहब पूछ कर नहीं मारा जा सकता है और न बिना देश के टुकड़े किए सबको बाहर निकाला जा सकता है। क्या नसीरूद्दीन शाह इस बात को नहीं समझते हैं? अगर समझते हैं तो फिर मजहब को बीच में डाल कर अपने बच्चों की फिक्र जताने की क्या जरूरत थी? उन्होंने असल में मुल्क के एक बड़े मसले को अपने किसी बेहद छोटे निजी स्वार्थ की वजह से बहुत छोटा बना दिया। 

इससे उन्होंने देश में विभाजन की राजनीति कर रही ताकतों को और दुश्मन मुल्क को एक नया हथियार दे दिया। पांच राज्यों में चुनाव हार कर पस्त पड़ी विभाजनकारी ताकतों को उनके बयान से नई ऊर्जा मिल गई है। पांच राज्यों के चुनाव नतीजों के बाद जो राजनीतिक विमर्श विकास, किसान, नौजवान, रोजगार की ओर मुड़ रहा था वह फिर हिंदू-मुसलमान पर लौट आया है। 

टेलीविजन चैनलों में हिंदू और मुसलमान की बहस फिर से शुरू हो गई है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने इस बहाने बयान दिया कि वे प्रधानंमत्री नरेंद्र मोदी को सिखाएंगे कि अपने देश के अल्पसंख्यकों का कैसे ख्याल रखा जाता है। इस पर नसीरूद्दीन शाह ने सफाई दी है पर वे चाहे जितनी सफाई दें, हकीकत यह है कि उन्होंने एक बड़ी लड़ाई को कमजोर कर दिया। 

अब तर्क के लिए पूछा जा सकता है कि क्या सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की चिंता में किसी समझदारी व्यक्ति को अपना मुंह बंद रखना चाहिए? नहीं! कतई चुप नहीं रहना चाहिए। पर नसीरूद्दीन शाह पर यह बात लागू नहीं होती क्योंकि वे चार साल आठ महीने से चुप ही थे! उन्होंने बोलने के लिए बहुत गलत समय चुना और उससे भी गलत मिसाल चुनी। 

जैसे आमिर खान ने अपनी पत्नी को चुना वैसे नसीरूद्दीन शाह ने अपने बच्चों को चुना। दोनों गलत हैं। यह देश बहुत पहले ऐसी छोटी छोटी चिंताओं से ऊपर उठ गया है। अगर वे बड़े विमर्श, बड़ी चिंता, बड़ी लड़ाई का हिस्सा बन सकते हैं तो बोलें, वरना चुपचाप फिल्में करें, पैसे कमाएं, पुरस्कार बटोरें और अपनी खोल में दुबके रहें! लड़ाई को आगे नहीं बढ़ा सकते हैं तो कम से कम उसे कमजोर न करें!  

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