रमजान में चुनाव की तारीख का व्यर्थ बवाल

लोकसभा चुनाव की घोषणा में लगभग एक हफ्ते की देर की गई। जिसके चलते प्रधानमंत्री मोदी को विज्ञापन देने, उद्घाटनों के और ज्यादा मौके मिले। सवाल इन पर खड़े होना थे। मगर आश्चर्यजनक रूप से विवाद चुनाव की तारीखों पर होने लगा। शुरूआत लखनऊ में शियाओं के धर्मगुरू मौलाना रशीद फिरंगीमहल ने और दिल्ली में आप के विधायक अमानतउल्लाह खान ने की और फिर केन्द्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद से लेकर और बहुत सारे लोग इसमें कूद गए। आप के विधायक अमानत उल्लाह खान ने ट्वीट किया कि दिल्ली में रमजान में 12 मई को मतदान है। ऐसे में मुसलमान कम वोट डालेंगे और इसका फायदा भाजपा को होगा। यह एक हास्यास्पद मगर भारी विवाद पैदा करने की क्षमता रखने वाली टिप्पणी थी। लोकसभा चुनाव के समय़ धर्म को लेकर उठने वाला कोई भी मुद्दा आग की तरह होता है, जिसे राजनीतिक नेता और भड़काने का काम करते हैं।

यह मुद्दा भी इसी तरह और गरमाया जा रहा है। मध्य प्रदेश भाजपा के उपाध्यक्ष रामेश्वर शर्मा ने कहा कि चुनाव आयोग को हिन्दु तिथियों का भी ध्यान रखना चाहिए। लेकिन धन्यवाद देना चाहिए चुनाव आयोग को उसने तत्काल स्पष्टीकरण देते हुए कहा कि चुनाव कार्यक्रम में अन्य त्योहारों के साथ ईद और शुक्रवार का ध्यान रखा गया है। रमजान के दौरान पूरे महीने के लिए चुनाव प्रक्रिया नहीं टाली जा सकती।

चुनाव आयोग की बात सही है। पिछले कई आम चुनाव इन्हीं दिनों में हो रहे हैं। जबकि रमजान के लिए कोई निश्चित अंग्रेजी महीना नहीं है। मुस्लिम नेता औऱ धर्मगुरू इस बात को अच्छी तरह जानते हैं कि साल के बारह महीनों में रमजान आता है। रमजान चांद की तारीखों के हिसाब से होता है और वह हर साल कुछ दिन पहले आता है। इस तरह उसका चक्र घूमते हुए हर अंग्रेजी महीने में आता रहता है। इन दिनों वह गर्मियों में चल रहा है जो आहिस्ता- आहिस्ता सर्दियों की तरफ खिसकता जाएगा। इस तरह रमजान गर्मियों, सर्दियों, बरसात हर मौसम में आता है।

इसलिए रमजान के दिनों में चुनाव न हो यह व्यवहारिक नहीं है। लेकिन आश्चर्यजनक रूप से कई राज्यों के मुसलमान नेताओं ने यह मुद्दा बना लिया। उन्होंने आरोप लगाया कि यह जानबुझकर किया है ताकि मुसलमानों को वोट डालने से रोका जा सके। अच्छा हुआ कि कुछ मुसलमान नेताओं ने ही इन बिना मुद्दे के विवाद बनाने वालों को फटकारते हुए कहा कि रमजान कोई आराम करने का महीना नहीं होता है। रमजान में मुसलमान अपनी नौकरी, व्यापार, खेती, मेहनत मजदूरी सब करता है। इस्लाम के इतिहास की कई मशहूर जंग भी रमजान में हुई हैं। वोट डालना भी एक संवैधानिक दायित्व है जिसे वह रोजा रखते हुए भी पूरा करेगा।

दरअसल मुसलमानों के कथित धर्मगुरुओं के साथ मुस्लिम नेताओं का एक वर्ग भी हमेशा मुसलमानों को धार्मिक मुद्दों में उलझाए रखने की कोशिश में लगा रहता है। इससे धार्मिक ध्रुविकरण की राजनीति करने वालों को सीधा लाभ मिलता है। शमशान और कब्रिस्तान, दिवाली और रमजान की तुलना करने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राजनीति की धुरी यही है कि हिन्दु-मुसलमान सवाल बना रहे। और मुसलमान नेताओं का एक वर्ग यह माहौल बनाने में भाजपा की पूरी तरह मदद करता दिख रहा है। रमजान और दिवाली की बात मोदी जी ने यूपी विधानसभा चुनाव के दौरान की थी। और उससे पैदा ध्रुवीकरण ने वहां भाजपा को भारी बहुमत दिलवाया।

 मुसलमानों की बड़ी समस्या यह है कि उनके यहां समझदार और तरक्की पसंद राजनैतिक नेतृत्व का विकास नहीं हो रहा है। मुल्लाओँ और मौलानाओं के हाथ में मुसलमानों की बागडोर रहती है। जो शिक्षा, नौकरी, रोजगार, राजनीतिक चेतना के मुद्दों को मुसलमानों के बीच सवाल बनने ही नहीं देते हैं। बल्कि उन्हें रमजान में मतदान जैसे नान इशु में उलझाए रहते हैं।

शिक्षा के क्षेत्र में मुसलमानों का हालत पर यह कभी चर्चा नहीं करते। इन्हें शायद पता भी नहीं होगा कि मुसलमानों की साक्षरता दर देश में सबसे कम है। केवल 67 प्रतिशत। इनमें भी मुस्लिम महिलाएं उससे भी कम साक्षर हैं। यहां यह जानना जरूरी है कि भारत में साक्षरता का मतलब केवल नाम लिखना और दस्तखत करना ही होता है। जबकि विकसित देशों में साक्षरता का पैमाना बहुत ऊंचा होता है। वैसे देश की औसत साक्षरता दर 74 प्रतिशत से उपर है।

इसी तरह नौकरियों में मुसलमानों का प्रतिशत केवल 33 है। जिनमें भी महिलाओं का प्रतिशत केवल 15 ही है। यहां यह उल्लेख करना भी जरूरी है कि संसद और विधनसभाओं में भी मुसलमान प्रतिनिधत्व लगतार कम होता जा रहा है। देश के सबसे बड़े राज्य यूपी का ही उदाहरण ही अगर लिया जाए तो 2014 के लोकसभा चुनाव में वहां से एक भी मुसलमान प्रतिनिधि जीत कर नहीं आया था। बाद में कैराना उप चुनाव में भाजपा के खिलाफ गठबंधन होने की स्थिति में एक मुस्लिम महिला तब्बुसम हसन वहां से चुनाव जीतीं।

गठबंधन से यहां मुसलमान के चुनाव जीतने का प्रसंग एक विशेष घटनाक्रम ( मुसलमानों के पीछे रहने के कारण) के प्रसंग में आया है मगर इसका व्यापक और दूरगामी राजनीतिक निहितार्थ यह है कि गठबंधन या महागठबंधन से ही विपक्ष मोदी का मुकाबला कर सकता है। एक तरफ विपक्ष जहां महागठबंधन का राजनीतिक महत्व समझने को तैयार नहीं दिख रहा वहीं महागठबंधन नहीं होने की स्थिति में अल्पसंख्यक वोट किस तरह बंटेगा इस पर भी उसकी कोई चिंता नजर नहीं आ रही।

यहां यह बताने की शायद जरूरत नहीं है कि विपक्ष के वोटों के बंटवारे का फायदा किस को मिलने जा रहा है। ऐसे में चुनाव में रमजान का मुद्दा उठाने वाले किस के हाथों में खेल रहे हैं यह भी जनता के सामने और खासतौर से मुसलमानों के सामने स्पष्ट होने लगा है।(लेखक नवभारत टाइम्स के पूर्व राजनीतिक संपादक एवं चीफ आफ ब्यूरो रहे है)

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