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बोफोर्स बनता राफेल का विवाद!

शशांक राय
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जैसे जैसे चुनाव नजदीक आ रहे हैं वैसे वैसे राफेल सौदे को लेकर नए खुलासे हो रहे हैं और विपक्षी पार्टियों खास कर कांग्रेस की तल्खी बढ़ती जा रही है। राफेल मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद लग रहा था कि अब यह मामला थम जाएगा क्योंकि सर्वोच्च अदालत ने अपने सामने रखे दस्तावेजों को देखने और दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद फैसले में कहा कि प्रक्रिया के मामले में कोई गड़बड़ी नहीं हुई है। यानी राफेल सौदे में प्रक्रिया का पूरा पालन किया गया है। कीमत को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सीएजी ने इसकी समीक्षा कर ली है और संसद की लोक लेखा समिति यानी पीएसी ने भी इसे देख लिया है। 

इसे लेकर पेंच फंस गया क्योंकि अभी तक सीएजी ने समीक्षा नहीं की है और जब सीएजी ने रिपोर्ट फाइनल नहीं की है तो उसके पीएसी में जाने का सवाल ही नहीं उठता है। तभी फैसले के तुरंत बाद वकील प्रशांत भूषण और पीएसी के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने इस पर सवाल उठाए। तभी सरकार खुद अदालत में गई और कहा कि उसने जो दस्तावेज दिए हैं उसमें टाइपिंग की गलती हो गई।

असल में सरकार यह लिखना चाहती थी कि सीएजी समीक्षा कर रही है और पीएसी में जल्दी ही रिपोर्ट जाएगी। इस आधार पर सरकार ने फैसले में सुधार की अपील की है, जिस पर सुनवाई होनी बाकी है। पर उससे पहले ही सरकार और भाजपा ने राफेल पर क्लीन चिट मिलने का हल्ला मचा दिया। दूसरी ओर विपक्ष पर इस हल्ले का कोई असर नहीं है। कांग्रेस लगातार यह मुद्दा उठा रही है। 

पहले सुप्रीम कोर्ट के फैसले और उस पर हुए विवाद की चर्चा जरूरी है क्योंकि उसमें कुछ नए पहलू जुड़ गए हैं। सबसे पहली बात तो यह है कि टाइपिंग की गलती बता कर सरकार ने फैसला सुधरवाने की जो अपील की है उस पर अभी सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई नहीं की है। सुप्रीम कोर्ट सुनवाई करते हुए टाइपिंग की गलती वाली बात मानती है या नहीं यह देखना दिलचस्प होगा। क्योंकि विपक्ष का कहना है कि टाइपिंग की गलती नहीं है, बल्कि सरकार ने गलत दस्तावेज देकर अदालत को गुमराह किया है। 

सो, सुनवाई शुरू होने पर इसमें कुछ और मोड़ आ सकता है। दूसरा पहलू यह है कि कांग्रेस ने सीएजी राजीव महर्षि की जांच पर सवाल उठा दिए हैं। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल ने कहा है कि महर्षि वित्त सचिव रहते राफेल सौदे पर बातचीत करने वाली टीम के हिस्सा थे, इसलिए वे इस सौदे की जांच नहीं कर सकते। कांग्रेस ने उनसे कहा है कि वे जांच से अलग हों। यानी जिस सीएजी रिपोर्ट का हवाला सुप्रीम कोर्ट में दिया गया वह अभी पूरी नहीं हुई है और उससे पहले कांग्रेस ने उस पर एक उचित कानूनी व नैतिक सवाल खड़ा किया है।  

इस बीच राफेल सौदे को लेकर दो बड़े खुलासे हुए हैं। एक खुलासा यह हुआ कि प्रधानमंत्री कार्यालय राफेल सौदे पर सामानांतर बातचीत कर रहा था कि 2015 के आखिर में तब के रक्षा सचिव जी मोहन कुमार ने इसका विरोध किया था। ध्यान रहे कांग्रेस का हमला लगातार इसी बात पर है कि सौदा प्रधानमंत्री ने खुद किया। तभी मोहन कुमार की फाइल नोटिंग सामने आने के बाद कांग्रेस ने हमला तेज किया। यहां तक कि सरकार की सहयोगी शिव सेना ने भी कहा कि प्रधानमंत्री कार्यालय देश को मजबूत करने के लिए सौदे में शामिल था या एक संकट में घिरे में उद्योगपति को बचाने के लिए? 

इसके बाद दूसरा खुलासा यह हुआ है कि सौदे की बातचीत कर रही टीम के तीन सदस्यों ने चिट्ठी लिख कर शर्तों को बदलने का विरोध किया था। बताया जा रहा है कि कुल आठ शर्तों को बदला गया था। सॉवरेन गारंटी की शर्त हटाई गई थी और फ्रांस की सरकार की बजाय विमान बनाने वाली कंपनी से सीधे बात करने पर भी आपत्ति जताई गई थी। सरकार ने एस्क्रो एकाउंट बना कर उसमें पैसा डालने का सुझाव भी दरकिनार किया था। 

सो, अब सवाल है कि क्या राफेल का मामला बोफोर्स जैसा होता जा रहा है? क्या यह अगले दो-तीन महीने में होने वाले लोकसभा चुनाव को प्रभावित करने वाला बड़ा मुद्दा बन पाएगा? 

कांग्रेस और कुछ दूसरी पार्टियों को लग रहा है कि राफेल विवाद बोफोर्स जैसा बन सकता है। या अगर बोफोर्स जैसा नहीं बने तब भी इससे नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार के ईमानदार होने के दावे की पंक्चर किया जा सकता है। हालांकि द हिंदू जैसे प्रतिष्ठित अखबार में एन राम जैसे सम्मानित संपादक के लिखने के बावजूद मीडिया में राफेल का वैसा नैरेटिव नहीं बन पा रहा है, जैसा बोफोर्स में बना था। ध्यान रहे बोफोर्स का मुद्दा भी सबसे पहले द हिंदू अखबार ने ही उठाया था। 

यह समय का अंतर है कि उस समय टेलीविजन और सोशल मीडिया नहीं होने और अखबारों की संख्या भी सीमित होने के बावजूद बोफोर्स का इतना बड़ा मुद्दा बना और आज राफेल पर उलटा नैरेटिव बन रहा है। एन राम भी कठघरे में खड़े किए जा रहे हैं। यह मीडिया की सचाई है। बहरहाल, कांग्रेस को पता है कि भाजपा की एकमात्र पूंजी मोदी की छवि है, वह राफेल के जरिए उसी पर पर दाग लगाने का प्रयास कर रही है। 

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