यह चुनाव जनमत संग्रह नहीं है

अजित कुमार -- लोकसभा चुनाव से पहले भारत में कमाल का राजनीतिक विमर्श बनाया जा रहा है। भारतीय जनता पार्टी अपने चुनावी फायदे के लिए इस बार के आम चुनाव को मोदी बनाम अन्य बनाने का प्रयास कर रही है और जाने अनजाने मीडिया इस विमर्श को प्रचारित कर रहा है। सारे टेलीविजन चैनलों और मीडिया समूहों में ऐसा दिखाया जा रहा है कि मोदी के नाम पर जनमत संग्रह होने वाला है। लोगों से पूछा जाना है कि मोदी हां या ना! पर ऐसा नहीं है।

भारत में आम चुनाव न तो जनमत संग्रह है और न राष्ट्रपति प्रणाली का चुनाव है, जिसमें एक, दो या तीन व्यक्तियों के चेहरे पर चुनाव होता है। यह भी ध्यान रखने की बात है कि भारत में लंबे अरसे से कोई ऐसा नेता नहीं हुआ है, जिसकी लोकप्रियता पूरे देश में हो या जिसे पूरे देश में लोग जानते हों। यहां तक कि कांग्रेस के बाद कोई पार्टी भी ऐसी नहीं हुई, जिसका अखिल भारतीय आधार हो। भारत की जो विविधता हर क्षेत्र में है वह राजनीतिक क्षेत्र में भी है। हर क्षेत्र की अपनी पार्टियां हैं।

यहां तक कि हर क्षेत्र के जातीय समूहों या भौगोलिक इलाकों की पार्टियां बन गई हैं। नब्बे के दशक में शुरू हुई अस्मिता की राजनीति ने इस ट्रेंड को बहुत मजबूती से स्थापित किया है। सबसे ज्यादा शिक्षित और सबसे विकसित इलाकों में जाति के नाम पर सबसे ज्यादा पार्टियां बनी हैं। तमिलनाडु से चल कर यह ट्रेंड बिहार जैसे सबसे अधिक जातिवादी नरेंद्र मोदी, जिस पार्टी के नेता हैं उस पार्टी का वास्तविक आधार देश के आधे राज्यों में हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा ने 282 सीटें जीती थीं, जिसमें से 232 सीटें उसे सिर्फ नौ राज्यों से मिली थीं। इन नौ राज्यों की 299 सीटों में से 232 सीटें भाजपा ने जीती थीं। बाकी बची हुई 244 सीटों में से भाजपा को सिर्फ 50 सीटें मिली थीं। दक्षिण भारत की 130 सीटों में से भाजपा महज 20 सीट जीत पाई थी। ओड़िशा और पश्चिम बंगाल की 63 में से भाजपा को सिर्फ दो सीटें मिली थीं।

सो, जब किसी पार्टी या किसी नेता का आधार ही अखिल भारतीय स्तर पर नहीं है तो कैसे देश भर में हो रहे चुनाव को उस एक पार्टी या एक नेता का चुनाव कहा जा सकता है? सो, आम चुनाव को जनमत संग्रह बनाने वाले लोग बुनियादी गलती कर रहे हैं, जो कि भारत की विविधता को देखते हुए ठीक नहीं है।

एक दूसरा तथ्य यह है कि नरेंद्र मोदी की सुनामी के बावजूद पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा को 31 फीसदी वोट मिले थे। भारत में लागू फर्स्ट पास्ट द पोस्ट का सिस्टम लागू है, जिसके तहत सबसे ज्यादा वोट हासिल करने वाला नेता जीतता है, उसी आधार पर 31 फीसदी वोट लेकर किसी पार्टी को बहुमत हासिल हो गया। पहले भी भारत में किसी भी लोकसभा चुनाव में जीतने वाली पार्टी को 50 फीसदी वोट नहीं मिले हैं। अगर चुनाव को जनमत संग्रह बनाया जाएगा तो फिर 50 फीसदी प्लस एक सीट जीतने का आधार तय करना होगा।

दूसरे, नरेंद्र मोदी की पार्टी भी तीन दर्जन पार्टियों के साथ तालमेल करके चुनाव लड़ रही है। सवाल है कि ऐसे बड़े गठबंधन में कैसे किसी एक पार्टी या एक नेता के नाम पर चुनाव लड़ने का प्रचार हो सकता है। यह तो बेशर्मी होगी, जो दूसरे के गठबंधन को महामिलावट कहा जाए और खुद उससे बड़े और अपने से विपरीत विचारधारा वाली पार्टियों से तालमेल करके खुद लड़ा जाए। भाजपा वहीं काम कर रही है पर मीडिया और मतदाताओं को इस विमर्श में नहीं उलझना चाहिए।

असल में भारतीय जनता पार्टी और नरेंद्र मोदी को यह विमर्श अनुकूल लगता है कि चुनाव उनके चेहरे पर हो। चूंकि विपक्षी पार्टियों की ओर से कोई एक चेहरा प्रोजेक्ट नहीं किया गया है और होने की संभावना भी नहीं है इसलिए भाजपा इसका फायदा उठाना चाहती है। पर उसे यह समझना होगा कि भले राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष का कोई चेहरा प्रोजेक्ट नहीं है पर राज्यों के स्तर पर विपक्ष के पास भाजपा के अपने चेहरे या उसकी सहयोगी पार्टियों के चेहरों से ज्यादा लोकप्रिय चेहरे हैं। भाजपा के चुनाव को जनमत संग्रह बनाने के प्रयास के बीच कांग्रेस और दूसरी विपक्षी पार्टियों ने राज्यवार चुनाव की जो बिसात बिछाई है वह भी प्रभावी हो सकती है। राज्यों में स्थानीय नेताओं का चेहरे और अस्मिता की राजनीति विपक्ष का सबसे मजबूत दांव हो सकता है। भाजपा देशभक्ति, सैनिकों की शहादत और पाकिस्तान के नाम पर ध्रुवीकरण करा कर अस्मिता की राजनीति का जवाब देना चाहती है। 

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