कमलनाथ: उपाध्यक्ष नहीं, चुनौती मंत्रिमंडल का विस्तार...

राकेश अग्निहोत्री कमलनाथ सरकार ने विधानसभा अध्यक्ष के निर्वाचन के साथ ही बहुमत साबित कर संदेश दे दिया.. इसलिए विधानसभा उपाध्यक्ष के निर्वाचन की कोई चुनौती कांग्रेस के सामने नहीं है.. परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए ऐन टाइम पर बड़ा दिल दिखाकर उपाध्यक्ष पद पर भाजपा की पसंद स्वीकार करने का विकल्प खुला हुआ है.. फिर भी बड़ी चुनौती कमलनाथ के सामने मंत्रिमंडल का विस्तार होगी, जिसमें गैर कांग्रेस और भाजपा विधायकों यानि सपा-बसपा निर्दलीय को मंत्री बनने की दावेदारी को  नजरअंदाज चाहकर भी नहीं कर सकते, तो अपनी पार्टी के रूठे नेताओं को मना लेना भी उनके लिए जरूरी होगा..

तो चुनौती सिर्फ ज्योतिरादित्य सिंधिया ही नहीं, दिग्विजय सिंह समर्थकों को भी भरोसे में लेने की होगी.. कुल मिलाकर कमलनाथ को कांग्रेस हाईकमान खासतौर से राहुल गांधी को यह सोचने को मजबूर करना होगी कम से कम मध्यप्रदेश  कांग्रेस में अब गुटबाजी देखने को नहीं मिलेगी.. जिस तरह प्रदेश अध्यक्ष रहते वो सबको साथ लेकर चले उसी तरह सरकार बनने के बाद कांग्रेस मध्यप्रदेश में आगे बढ़ेगी.. तभी लोकसभा चुनाव में भाजपा से सीधे मुकाबले में कांग्रेस का दबदबा साबित कर राहुल गांधी के लिए रिकॉर्ड तोड़ सीट लाने की संभावनाएं बलवती हो सकती.. बड़ा सवाल सदन में विपक्ष के जरूरी सहयोग के लिए कमलनाथ और उनके रणनीतिकारों के पास वह कौन सा फार्मूला होगा, जिससे प्रदेश के हित में समन्वय की सियासत देखने को मिले...

क्या कांग्रेस हो हल्ला हंगामा खत्म कर एक नई शुरुआत परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए करेगी और उपाध्यक्ष की कुर्सी भाजपा को देकर एहसान करेगी... तो सवाल यह भी क्या भाजपा कांग्रेस के रहमों करम पर आगे बढ़ेगी या फिर यह प्रचारित करेगी कि दबाव डालकर उसने अपना हक ले लिया..दिग्विजय सिंह जो लगातार मध्यप्रदेश में सक्रिय और खासतौर से विधानसभा सत्र के दौरान प्रमुख रणनीतिकार के तौर पर कांग्रेस की कमान संभाले हुए हैं..

यदि सवर्ण गरीब के लिए आरक्षण के मुद्दे पर राज्यसभा सांसद रहते संसद से दूरी बनाकर भोपाल में डेरा डाले हुए हैं तो समझा जा सकता है कि कांग्रेस को इस संकटमोचक की अभी भी जरूरत बनी हुई है, तो क्या अध्यक्ष के निर्वाचन के बाद उपाध्यक्ष को लेकर कांग्रेस के सामने कोई संकट है.. कम से कम 120 विधायकों के 1 दिन पहले एनपी प्रजापति का समर्थन करने के बाद इस सवाल में दम कम नजर आती  है, तो फिर वजह क्या है, जो दिग्गी राजा कांग्रेस की सियासत की धुरी तो भाजपा की आंख की किरकिरी बने हुए हैं, जो पहले ही विधायकों की खरीद-फरोख्त का गंभीर आरोप लगाकर भाजपा नेताओं की नींद उड़ा चुके हैं..

अपना मानना है कि गैर भाजपा जिन अतिरिक्त विधायकों ने समर्थन खुलकर सदन के अंदर किया.. क्या उनकी अपेक्षाओं को पूरा करने का समय आ गया है.. यानी मंत्रिमंडल का विस्तार, जिसमें देरी हो सकती और मकर संक्रांति के बाद इस स्िक्रप्ट को आगे बढ़ाया जाना लगभग तय है, तो विधानसभा सत्र के दौरान अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के निर्वाचन के बाद मंत्री पद के दावेदारों को नए सिरे से संतुष्ट करना कमलनाथ की चुनौती होगी, तो फिर रणनीतिकार दिग्विजय सिंह की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता..

सवाल राहुल गांधी के हस्तक्षेप के बाद कमलनाथ ने जिस फार्मूले को आगे रखकर अपने विशेषाधिकार का प्रयोग कर 28 मंत्री बनाए और सभी को कैबिनेट का दर्जा दिया था.. यदि उनकी संख्या बढ़ती है तो इसमें वरीयता किन्हें दी जाएगी.. क्या इस बार कमलनाथ, दिग्विजय, ज्योतिरादित्य की पसंद को फिर से तवज्जो दी जाएगी या इससे पहले सपा, बसपा और निर्दलीय को संतुष्ट किया जाएगा.. यहीं पर ‘एक अनार सौ बीमार’ वाली कहावत कुछ नए सवाल खड़े करती है..

मंत्रिमंडल में 6 स्थान खाली हैं और इस विस्तार में भी कमलनाथ 2 से 3 कुर्सी खाली रखना चाहेंगे तो फिर सवाल आखिर किसकी किस्मत खुलेगी, जिसने कमलनाथ और कांग्रेस पर दबाव बनाया या फिर जो आसानी से इन विपरीत परिस्थितियों में पार्टी और कमलनाथ के साथ खड़े नजर आए.. अध्यक्ष के निर्वाचन के पहले तक असंतुष्टों के बयानों पर गौर करें तो इस समस्या का समाधान आसान नहीं होगा फिर भी चर्चा विधायक सुरेंद्र सिंह शेरा, संजय सिंह संजू, बैजनाथ कुशवाहा के साथ हिना कावरे का दावा ज्यादा मजबूत नजर आता है..

यदि दरियादिली दिखाते हुए कमलनाथ उपाध्यक्ष की कुर्सी भाजपा के हवाले करते हैं, जो उनके लिए अब आसान नहीं होगा, तो फिर राजेश शुक्ला, विक्रम राणा, केपी सिंह, राज्यवर्धन सिंह दत्ती गांव की महत्वाकांक्षाएं कब साकार होंगी.. तो फिर के पी सिंह और दूसरे कांग्रेस के दावेदारों का क्या होगा.. क्योंकि सदन में बहुमत सिद्ध करने के बाद कमलनाथ पर दबाव बढ़ना तय है..

शायद यही वजह है कि डैमेज कंट्रोल के लिए दिग्विजय सिंह को दिल्ली से दूरी बनाए रखते हुए भोपाल में ही रुकने की रणनीति कांग्रेस ने बनाई है, तो बड़ी चुनौती आने वाले समय में कमलनाथ के सामने मंत्रिमंडल का विस्तार ही होगी.. जिस तरह राहुल गांधी राजस्थान पहुंच चुके हैं तो कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष का जल्द छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश के दौरे पर आना तय माना जा रहा, जो कांग्रेस सरकार बनने के बाद सियासी मंच से अपना संदेश देश को देना चाहेंगे तो इस दौरान यदि कांग्रेस के अंदर से कलह सामने आई तो फिर कमलनाथ की नेतृत्व क्षमता और दिग्विजय सिंह की कंसलटेंसी और डैमेज कंट्रोल पर सवाल खड़े किए जा सकते हैं..

विधानसभा अध्यक्ष के बाद अब सबकी नजर उपाध्यक्ष के निर्वाचन पर आकर टिक गई है.. परंपरा तोड़ कर भाजपा ने सत्ता पक्ष कांग्रेस के अध्यक्ष को चुनौती देना चाही तो इसी लाइन को आगे बढ़ाते हुए कांग्रेस ने सुंदरलाल पटवा के समय शुरू हुई व्यवस्था से आगे अध्यक्ष के साथ उपाध्यक्ष के लिए भी अपना दावा ठोक दिया.. संख्या बल के हिसाब से कमलनाथ के लिए यह कोई बड़ी चुनौती नहीं है तो भाजपा कितनी भी संजीदगी दिखाए..

यदि उसके पास बहुमत होता तो वह पहले ही राजभवन के दरवाजे खटखटा चुकी होती.. ऐसे में सदन से लेकर सड़क तक सियासी संग्राम में जब दोनों दल अपने-अपने हित तलाश रहे तब सवाल यह खड़ा होता है कि क्या मध्यप्रदेश की राजनीति टकराहट से आगे नहीं पीछे आकर समन्वय की कोई मिसाल खड़ी हो सकती है.. उपाध्यक्ष के लिए हिना कावरे तो जगदीश देवड़ा द्वारा नामांकन दाखिल करने के साथ जब इस लड़ाई को अंजाम तक पहुंचाने की रणनीति दोनों दलों द्वारा बनाई जा रही तब सवाल यह भी खड़ा होता है कि क्या कोई बड़ा संदेश देने के लिए कांग्रेस और भाजपा एक बार फिर क्या बीच का रास्ता निकाल सकते हैं या फिर तीर कमान से निकल चुका है.. दिग्विजय सिंह ने कहा था कि बात भाजपा में किससे की जाए..

क्योंकि नेता प्रतिपक्ष का चयन उन्होंने विलंब से किया, लेकिन अब एक बार फिर सारे विकल्प खुले हुए.. देखना दिलचस्प होगा कि प्रोटेम स्पीकर की लाइन को अध्यक्ष एनपी प्रजापति आगे बढ़ाते हैं तो इसमें संसदीय मंत्री गोविंद सिंह की लाइन और रणनीति क्या होगी.. इसके साथ ही भाजपा क्या गलती सुधार के साथ आगे बढ़ेगी या फिर उसी तरह सदन का पत्ता काटकर सड़क पर संग्राम का संकेत देगी..

मतलब इरादा पलटवार आक्रामक राजनीति का होगा या फिर धैर्य-संयम के साथ गोविंद सिंह द्वारा सुझाए गए उस विकल्प का इंतजार करेंगे, जो उन्होंने भाजपा के बायकाट के बाद कहा था.. सवाल क्या विधानसभा अध्यक्ष के हस्तक्षेप के बाद फैसला सदन के अंदर ही होगा और सबको स्वीकार्य होगा.. क्या भाजपा अपना दावा छोड़ सकती है या कांग्रेस टकराहट के लिए हिना कावरे का नाम वापस ले सकती.. यहीं पर यह संदेश जाएगा कि समन्वय-सामंजस्य की सियासत की कोई गुंजाइश इस विधानसभा के गठन के साथ बचती है या फिर ऐसा सोचना भी बेमानी है.. यदि कोई जोखिम मोल ना लेते हुए मुख्यमंत्री कमलनाथ ने वरिष्ठ सदस्य के क्राइटेरिया से बाहर अपनी व्यक्तिगत पसंद दीपक सक्सेना को प्रोटेम स्पीकर बनाया और बेहतर प्रबंधन के दम पर कांग्रेस के स्पीकर पर सदन की मुहर लगवाई तो क्या अब जब उन्हें संख्या बल पर भरोसा हो गया तब वो उपाध्यक्ष के लिए क्या भाजपा को भरोसे में लेंगे..

जहां तक बात भाजपा की है तो क्या विपक्ष में बैठने के बाद संगठन से लेकर विधायकों के बीच सब कुछ ठीक-ठाक नहीं है और भूमिका जिम्मेदारी के बदलाव के इस दौर में रणनीति यदि उसकी फेल हो रही तो क्या इसकी वजह सही फैसले लेना नहीं है.. देखना दिलचस्प होगा उपाध्यक्ष के निर्वाचन से पहले क्या परंपरा टूटने की बजाए नए सिरे से आगे बढ़ने में दोनों दल बढ़-चढ़कर रुचि लेंगे..

147 Views

बताएं अपनी राय!

नीचे नजर आ रहे कॉमेंट अपने आप साइट पर लाइव हो रहे है। हमने फिल्टर लगा रखे है ताकि कोई आपत्तिजनक शब्द, कॉमेंट लाइव न हो पाए। यदि ऐसा कोई कॉमेंट- टिप्पणी लाइव हुई और लगी हुई है जिसमें अर्नगल और आपत्तिजनक बात लगती है, गाली या गंदी-अभर्द भाषा है या व्यक्तिगत आक्षेप है तो उस कॉमेंट के साथ लगे ‘ आपत्तिजनक’ लिंक पर क्लिक करें। उसके बाद आपत्ति का कारण चुने और सबमिट करें। हम उस पर कार्रवाई करते उसे जल्द से जल्द हटा देगें। अपनी टिप्पणी खोजने के लिए अपने कीबोर्ड पर एकसाथ crtl और F दबाएं व अपना नाम टाइप करें।

आपका कॉमेट लाइव होते ही इसकी सूचना ईमेल से आपको जाएगी।