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न्यायपालिका पर उठते सवाल

अजित कुमार -- देश की सर्वोच्च न्यायपालिका सवालों के घेरे में है। पिछले कुछ समय से चीफ जस्टिस और सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम के कामकाज पर सवाल उठ रहे हैं। पिछले चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के कामकाज को लेकर तो उनके बाद सबसे वरिष्ठ चार जजों ने प्रेस कांफ्रेंस की थी। बेंच बनाने और मुकदमों के आवंटन को लेकर जजों ने उन पर सवाल उठाए थे। प्रेस कांफ्रेंस करने वाले चार जजों में से एक जस्टिस रंजन गोगोई अब सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस हैं। फिर भी हालात जस के तस हैं। 

तभी सुप्रीम कोर्ट के दो जजों की नियुक्ति को लेकर हुए विवाद पर पूर्व जज जस्टिस आरएम लोढ़ा ने कहा कि चार जजों की प्रेस कांफ्रेंस भी काम नहीं आई। असल में चार जजों की प्रेस कांफ्रेंस इस मकसद से की गई थी सर्वोच्च अदालत के कामकाज में पारदर्शिता आनी चाहिए। पर दो जजों की नियुक्ति की कॉलेजियम की ताजा सिफारिश में पारदर्शिता की ही कमी है, जिसकी वजह से सवाल उठे हैं। 

जजों की नियुक्ति, बेंच का गठन, मुकदमों का आवंटन जैसे मुद्दे विवादों में थे इस बीच जस्टिस एके सीकरी को सीबीआई निदेशक का चयन करने वाली समिति में भेजने और उसके बाद उनकी लंदन में हुई पोस्टिंग का विवाद अलग आ गया। हालांकि जस्टिस सीकरी ने लंदन में सीसैट में मिला पद ठुकरा दिया है पर उस पूरे घटनाक्रम से न्यायपालिका सवालों के घेरे में आई। 

विवाद का ताजा मामला कर्नाटक हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस दिनेश माहेश्वरी और दिल्ली हाई कोर्ट के जज जस्टिस संजीव खन्ना को सुप्रीम कोर्ट में जज बनाने का है। सुप्रीम कोर्ट की कॉलेजियम ने इन दोनों के नाम की सिफारिश की थी, जिसे सरकार ने स्वीकार कर लिया। पर इनसे पहले कॉलेजियम ने ही दिल्ली हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस राजेंद्र मेनन और राजस्थान हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस प्रदीप नंदराजोग के नाम की सिफारिश की थी। पर उसके बाद अचानक कॉलेजियम की बैठक हुई और उसमें इन दोनों के नाम बदल कर जस्टिस माहेश्वरी और जस्टिस खन्ना का नाम भेज दिया गया। 

जस्टिस मेनन और जस्टिस नंदराजोग के नाम क्यों बदले गए? उनकी जगह दो नए जजों के नाम क्यों तय किए गए? इस बारे में आधिकारिक रूप से कुछ नहीं बताया गया। यह बुनियादी पारदर्शिता का मामला है कि अगर कॉलेजियम अपनी सिफारिश बदलती है तो उस बारे में जानकारी सार्वजनिक की जाए। पर इस मामले में ऐसा नहीं हुआ है। तभी सुप्रीम कोर्ट के कामकाज में पारदर्शिता लाने के लिए किए जा रहे प्रयासों पर सवालिया निशान लग गए हैं। 

नाम तय करने के आधार और फिर उसे बदल देने का कारण नहीं बताया जाना एक पहलू है। दूसरा पहलू यह है कि जस्टिस संजीव खन्ना हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस नहीं हैं और वे वरिष्ठता क्रम में 33वें स्थान पर हैं। जब सुप्रीम कोर्ट की कॉलेजियम ने अपने यहां जज नियुक्त करने के लिए वरिष्ठता को आधार बनाया है तो कम से कम उसका पालन होना चाहिए। आमतौर पर हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस ही सुप्रीम कोर्ट में जज नियुक्त होते हैं। 

ध्यान रहे पिछले साल उत्तराखंड हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस केएम जोसेफ को सुप्रीम कोर्ट में लाने की सिफारिश कॉलेजियम ने की थी तो सरकार ने यह कहते हुए सिफारिश लौटा दी थी कि जस्टिस जोसेफ वरिष्ठता क्रम में 12वें नंबर पर हैं। हालांकि वे एक हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस थे। बाद में उनके लिए कॉलेजियम को दूसरी बार सिफारिश भेजनी पड़ी। जबकि जस्टिस संजीव खन्ना चीफ जस्टिस भी नहीं हैं और वरिष्ठता क्रम में 33वें स्थान पर थे फिर भी सरकार ने उनके नाम की सिफारिश वापस नहीं की, बल्कि उसे तत्काल मंजूरी दे दी। उनका नाम भेजने और सरकार के तत्काल मंजूरी देने से कई सवाल खड़े हुए हैं। हालांकि पहले भी वरिष्ठता क्रम का उल्लंघन करके सुप्रीम कोर्ट में जज बनाए गए हैं पर चूंकि अभी न्यायपालिका लगातार विवादों में है और सरकार के साथ उसके संबंधों पर भी सवाल उठ रहे हैं इसलिए यह मुद्दा ज्यादा विवादों में आ गया है। 

पिछले साल जनवरी में प्रेस कांफ्रेंस करने वाले चार जजों में से एक जस्टिस कुरियन जोसेफ पिछले दिनों रिटायर हुए। उन्होंने रिटायर होने के बाद कुछ बेहद अहम खुलासे किए। उन्होंने बताया कि प्रेस कांफ्रेंस करने वाले चारों जजों को लग रहा था कि तब के चीफ जस्टिस किसी बाहरी दबाव में फैसले कर रहे हैं। यानी कोई बाहर ताकत न्यायपालिका को दिशानिर्देश दे रही है। यह बहुत चिंताजनक बात थी। न्यायपालिका की सर्वोच्चता और उसके प्रति लोगों का भरोसा तभी तक कायम है, जब तक वह बाहरी दखल से पूरी तरह मुक्त रहते हुए स्वतंत्र और निष्पक्ष तरीके से काम करे। 

लोगों को यह भरोसा होना चाहिए कि न्यायपालिका स्वतंत्र रूप से काम कर रही है। इसके लिए जरूरी है कि न्यायपालिका के कामकाज में ज्यादा से ज्यादा पारदर्शिता आए। सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के सीधे प्रसारण की मंजूरी दे दी है। पारदर्शिता की दिशा में वह एक अहम पहल है। इसके आगे कुछ और कदम उठाने की जरूरत है। कॉलेजियम की बैठकों और उसके फैसलों में भी पारदर्शिता आनी चाहिए। 

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