भावनाओं में बहने वाले रहे हैं भारतीय मतदाता

रघु ठाकुर देश के 17वीं लोकसभा के चुनाव की घोषणा हो चुकी है। पिछला एक माह मीडिया और लोगों की जिज्ञासाओं में बीता था और चुनाव की तिथियों और आचार संहिता लागू होने के कई मनगढ़ंत समाचार मीडिया व सोशल मीडिया पर घूमते रहे। समाचार देने वालों का अति उत्साह इस सीमा तक पहुंच चुका था कि चुनाव आयोग को न केवल समाचारों का खण्डन करना पड़ा, बल्कि शायद पहली बाद एफ.आई.आर. भी दर्ज कराना पड़ी। फिर इस बार के लोकसभा के चुनाव एक भावनात्मक वातावरण में होने जा रहे हैं।

पिछले दिनों पुलवामा में आत्मघाती जत्थे द्वारा आतंकवादी घटना जिसमें लगभग 40 सी.आर.पी.एफ. के जवान मारे गये और उसके कुछ समय बाद भारत सरकार द्वारा उठाये गये कदम तथा पाक अधिकृत कश्मीर में जैश (आतंकी संगठन) के मुख्यालय पर वायुसेना के हमले के बाद से समूचे देश में यह चिंता का विषय है और देश फिर एक बार पक्ष-विपक्ष मानसिक विभाजन की स्थिति में है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि भारतीय मतदाता अपनी देश की सुरक्षा के प्रति चिंतित तो रहते ही है साथ ही जज्बातों में भी बहते हंै।

यही कारण है कि अभी तक हुई छोटी-बड़ी लड़ा़इयों का प्रभाव भारतीय राजनीति और चुनाव परिणामों पर पड़ता रहा है। 1962 के चीनी हमले और भारतीय पक्ष की कमजोरी ने न केवल तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व. जवाहर लाल नेहरू की छवि को आघात पहुंचाया था बल्कि सरकारी पक्ष का बहुमत तत्कालीन चुनाव में काफी कम कर दिया था। 1967 के चुनाव में भी इस घटना ने प्रभाव डाला था। सत्ता पक्ष कमजोर हुआ था और प्रतिपक्ष मजबूत हुआ था।

1971 के बांग्लादेश के पृथक देश बनने व पाक फौज के आत्मसमर्पण के बाद इंदिरा गांधी की छवि और कद देश व दुनिया में बहुत ऊंचा हो गया था। उन्हें 1971 के चुनाव में दो तिहाई बहुमत मिला। अटलबिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में कारगिल में घुसे घुसपैठिये और उन्हें निकालने के लिये जो सैन्य संघर्ष हुआ उसे कारगिल युद्ध का नाम दिया गया। इस कारगिल युद्ध में केवल अपनी ही सीमा को घुसपैठियों से मुक्त कराया गया था।

इसके बावजूद कारगिल युद्ध का समर्थन देश की जनता ने किया और अटल बिहारी वाजपेयी को पांच वर्ष के लिये पुनः प्रधानमंत्री बना दिया। कारगिल युद्ध के समय जो घुसपैठिये भारतीय सेना से घिर गये थे तथा जिनके पास युद्ध के गोले-बारूद खत्म हो चुके थे जिनके संदेश पकड़े गये थे कि हमारे गोले-बारूद खत्म हो चुके हैं उन्हें भारत सरकार ने अन्तरराष्ट्रीय दबाव मंे सैफ पैसेज देकर जाने दिया परन्तु देश के मतदाताओं ने इतनी बड़ी घटना को भी भुला दिया।

भारतीय मतदाताओं और ब्रिटिश मतदाताओं में यह बड़ा फर्क है कि ब्रिटिश मतदाता भावनात्मक मतदान नहीं करते। यहां तक द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद आम चुनाव में जिसमें तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री चर्चिल की युद्ध जिताने में महत्वपूर्ण भूमिका थी तथा हिटलर को मित्र राष्ट्रों ने पराजित किया था। इस ब्रिटिश जीत के बाद भी ब्रिटिश मतदाताओं ने चर्चिल की पार्टी को नकार दिया और कहा कि अब अगर चर्चिल को जितायेंगेे तो चर्चिल तानाशाह बन सकते हैं। इस अर्थ में ब्रिटिश मतदाता ज्यादा परिपक्व हैं और अपने लोकतंत्र के प्रति ज्यादा सावधान हंै।

परन्तु भारतीय मतदाता सदैव भावनाओं में बहने वाला मतदाता रहा है। एक और महत्वपूर्ण फर्क यह भी है कि द्वितीय विश्वयुद्ध में हिटलर और जर्मनी को निर्णायक रूप से हरा दिया गया था। जबकि 2000 में कारगिल के समय भारत ने पाकिस्तान को पराजित नहीं किया था। भारत केवल अपनी जमीन को ही खाली करा पाया था। अभी भी पुलवामा और मुस्तफाबाद की घटनाओं के बाद देश की जनता के मन में एक तीखा आक्रोश और भावनाओं का उबाल है।

यह किस सीमा तक जायेगा कहना कठिन है परन्तु मतदाताओं के मन में कुछ-कुछ भारत सरकार की तरफ झुकाव ज्यादा दिख रहा है। वह इतने मानसिक उन्माद में है कि सरकार की अलोचना को भी राष्ट्रद्रोह का दर्जा देता है। यह बात भी सही है कि पुलवामा घटना और मुस्तफाबाद पर वायुसेना के हमले के बाद देश की एक बड़ी पार्टी कांग्रेस ने आरंभ में संतुलित प्रतिक्रिया दी थी। जिनसे जनभावनायें मेल खाती थी।

परन्तु उनका संयम का बांध जल्दी टूट गया और उन्होंने ऐसे सवाल असामयिक तौर पर पूछना शुरू किये जिसमें आमजन भी सेना की भूमिका पर सवाल करते हुये नजर आये और वे जनभावनाओं के प्रतिकूल नजर आने लगे। मेरी राय में कांग्रेस ने भारतीय मतदाताओं के स्वभाव को परखने की चूक कर दी। अब स्थिति यह है कि लोकसभा चुनाव देश की आंतरिक समस्याओं को न होकर पाकिस्तान के खिलाफ भावना के आधार पर होते लग रहे हंै। हो सकता है कि चुनाव की घोषणा के बाद व अभियान की कुछ गति पकड़ने के बाद इन हालातो में कुछ सुधार हो परन्तु वह फर्क कितना आयेगा इसका आंकलन कठिन है।

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