सिर्फ ठप्पे लगाने वाला न हो राष्ट्रपति

श्रुति व्यास
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वक्त बदला हुआ है। इन दिनों चारो ओर तमाम ऐसी चर्चाओं के दौर चले हुए हैं जो राजनीतिक हैं। चाहे चुनाव प्रचार हो, या नए मुख्यमंत्री के राजतिलक का मसला हो, या प्रधानमंत्री के विदेश दौरे हों, या फिर एनडीटीवी पर छापे की कार्रवाई को लेकर उठी चर्चाएं हों। सबके कहीं न कहीं राजनीतिक मायने हैं। इनमें हर किसी कदम के पीछे ऐसे कारण और हित हैं जिनके बारे में हमारे राजनेता सोचते और करते हैं। इसकी एक बड़ी वजह ये है कि ऐसा करने की प्रवृत्ति इसलिए बढ़ी है क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राजनीतिक परिदृश्य में ऐसी हवा घोल कर रख दी है। इस वक्त राजनीतिक गलियारों और आमजन के बीच यह चर्चा भी अपनी जगह है कि कौन होगा अगला राष्ट्रपति? सबके मन में उत्सुकता है इस बात को लेकर कि कौन होगा देश का अगला राष्ट्रपति। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के बाद तो ये जानने की इच्छा और भी बढ़ गई है। नए राष्ट्रपति उम्मीदवार को लेकर राजनीति के दिग्गजों में जम कर मशक्कत चल रही है। कई नामों को लेकर चर्चाएं हैं। कुछ के नामों के बारे में पता है, तो कुछ का खुलासा अभी तक नहीं हुआ हैर यही वजह है जो लोगों के भीतर इस बात की उत्सुकता बनाए हुए है कि अब कौन रायसीना हिल्स की इस शानदार इमारत में पहुंच कर देश का प्रथम नागरिक बनेगा। लेकिन कौन होगा ‘शाइनिंग इंडिया’ का अगला राष्ट्रपति ? ये एक ऐसा सवाल है जिसमें काफी कुछ छुपा हुआ है। दुर्भाग्य से आज “राष्ट्रपति” शब्द की गरिमा खत्म प्रायः है। राष्ट्रपति पद के साथ ऐसी व्यक्तिगत चीजें जोड़ दी गई हैं जो कि इस पद की गरिमा के प्रतिकूल हैं। पहले जो राष्ट्रपति हुए हैं, उनके व्यक्तित्व में एक गजब का करिश्मा था। मैं डा. कलाम के बारे में बात नहीं कर रही हूं। मैं बहुत ही विनम्र, पर दब्बू और भीरू प्रतिभा पाटील और ऊबाऊ प्रकृति के प्रणब मुखर्जी की बात कर रही हूं। पिछले दस साल में इन दोनों ने जिस ढीलेपन से, शिथिलता, अनुत्साह से काम किया, उससे पद की गरिमा और माहौल दोनों को काफी नुकसान हुआ। अगर प्रतिभा पाटील ने अपने अकथनीय व्यक्तित्व से इस पद का ह्रास किया, तो प्रणब मुखर्जी ने अपने इर्द-गिर्द की टोली, यथास्थितिवादी रूख में इस पद की गरिमा को बेजान बनाया। जब ऐसा है तो फिर ऐसे में किसी को भी आलिया भट्ट पर सिर्फ इसलिए हंसने का हक नहीं कि वह राष्ट्रपति का नाम तक नहीं जानती। लेकिन गुजरे वक्त की ये दोनों नियुक्तियां एक राजनीतिक वर्ग की देन थीं। वह ऐसा राजनीतिक वर्ग रहा जिसने अपने हितों के लिए इस पद की गरिमा की चिंता नहीं की। इस राजनीतिक वर्ग के लिए राष्ट्रपति पद पर ऐसा व्यक्ति ज्यादा अनुकूल होता है जो हर तरह से पुराना पड़ चुका हो और उनके इशारे पर चलते हुए उनके संकीर्ण राजनीतिक हितों को पूरा करते रहे। इस तरह खास राजनीतिक वर्ग ने राष्ट्रपति भवन को रिटायर लोगों का अड्डा बनाने में कसर नहीं छोड़ी। और राष्ट्रपति एक सजावटी शो पीस की तरह वहां बैठने लगे, जिनके पास अधिकार या शक्ति नाम की चीज नहीं होती। इसलिए क्या यह सब ब्रिटिश राजतंत्र की तरह ही नहीं हो गया है ? एक अप्रासंगिक सजावटी शोपीस। लेकिन न तो राष्ट्रपति का पद ही और न ही राष्ट्रपति भवन वो जगह है जो कोई सजावटी वस्तु हो। भारत में राष्ट्रपति का पद एक विधि सम्मत औपचारिक पद है। इतिहास में देखे तो यह पद प्रकृति से बहुत ही शांत और गंभीर शख्सियतों से परिपूर्ण रहा है। एक राष्ट्र प्रमुख होने के नाते राष्ट्रपति भारत गणराज्य के संरक्षक हैं। इसलिए आम जनता उनसे यह अपेक्षा रखती है कि वे देश में क्या कुछ घट रहा है, इस पर बारीकी से नजर रखें। देश के नागरिक इस बात का भरोसा चाहेंगे कि देश की राजनीति संवैधानिक हितों की सीमाएं न लांघे। इसीलिए यह महत्त्वपूर्ण है कि अब जो भी नया राष्ट्रपति हो- महिला या पुरुष, उसे एक व्यक्तित्व से परिपूर्ण होना चाहिए। क्योंकि राष्ट्रपति पद का जो औपचारिक हिस्सा है, वह संपूर्ण व्यक्तित्व की मांग करता है। उसके व्यक्तित्व में गरिमा होनी चाहिए। एक कद होना चाहिए। राष्ट्रपति पद के लिए ऐसा व्यक्तित्व चाहिए जो भावप्रवण वक्ता हो, और जरूरत पड़ने पर तार्किक जिरह भी कर सके। राष्ट्रपति का काम सिर्फ फोटो सेशन तक ही सीमित नहीं है। देश के लिए जरूरी है कि वे जरूरत पड़ने पर तर्क और विवेक सम्मत तरीके से गंभीर राष्ट्रीय-घरेलू मसलों को सुलझाने की पहल करें। उन्हें वैश्विक नेताओं से भी संवाद और तालमेल बनाए रखने की जरूरत है। अगर भारत को ब्रांड के रूप में स्थापित करना प्रधानमंत्री का काम है तो उस ब्रांड इंडिआ में रंग और सीमेंट भरने का काम राष्ट्रपति का होना चाहिए। साथ ही ये भी बहुत जरूरी है कि राष्ट्रपति विवेकवान और हर तरह से कुशल हों। इससे भी ज्यादा, हमें ऐसे राष्ट्रपति की जरूरत है जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जैसा साहस दिखा सके जो दुनिया में भारत को आगे ले जाने में लगे हैं और एक प्रेरणास्रोत बने हुए हैं। भारत के इस सपने को साकार करने के लिए ऐसे राष्ट्रपति की जरूरत है जिसमें मोदी जैसी दक्षता हो, और जो अपने व्यक्तित्व के बल पर दुनिया में भारत की नुमाइंदगी कर सके। इसलिए उम्मीद रखिए कि अगले महीने देश को ऐसा राष्ट्रपति मिलेगा जो रबर का ठप्पा साबित नहीं होगा, बल्कि एक विवेकवान और लोकप्रिय राष्ट्रपति के रूप में देश जिसे देखेगा। एक ऐसा राष्ट्रपति जो न केवल इस पद की प्रतिष्ठा और गरिमा को फिर से स्थापित करेगा जो कि विगत में राष्टपति भवन की कहानियां कहती रही है, बल्कि उन मानदंडों को भी फिर से स्थापित करेगा जो हाल के सालों में राष्ट्रपति भवन में देखने को नहीं मिले है।

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