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कर्जमाफी से ही किसानों का भला नहीं

बलबीर पुंज
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पिछले दिनों दिल्ली में दो दिवसीय किसान रैली में भाग लेने पहुंचे 52 वर्षीय एक किसान की मौत हो गई। इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना के बाद जो जानकारी मीडिया के माध्यम से सामने आई, उसने देश में किसानों की वास्तविक स्थिति और उनसे संबंधित संकट से निपटने के सीमित दृष्टिकोण को पुन: रेखांकित कर दिया है। क्या केवल कर्ज माफी ही इस समस्या का हल है?  पिछले महीने की 29 तारीख को कर्जमाफी सहित अन्य मांगों को लेकर विभिन्न राज्यों के हजारों किसान दिल्ली पहुंचे थे, जिसमें महाराष्ट्र के कोल्हापुर निवासी किरण शांतप्पा घोरवडे भी शामिल थे। एक दिसंबर की सुबह दिल्ली स्थित अंबेडकर भवन की तीसरी मंजिल से गिरने से घोरवडे मौत हो गई। वह "स्वाभिमानी शेतकरी संगठन" नामक किसान संगठन से 15 वर्षों से जुड़े थे। 

जांच में जानकारी मिली कि मृतक पर कोल्हापुर जिला कोऑपरेटिव बैंक और एक क्रेडिट सोसायटी का लगभग 6 लाख रुपये का ऋण था। इस वर्ष खेत में कीड़े लगने और बेमौसम बारिश के कारण उड़द की पूरी फसल बर्बाद हो गई। मृतक के पड़ोसी के अनुसार, "घोरवडे बीते एक दशक से कर्ज का भुगतान नहीं होने से चिंतित था, क्योंकि उसे 2008-09 की कर्ज माफी का लाभ नहीं मिला था। घोरवडे पर कोल्हापुर जिला कोऑपरेटिव बैंक का तीन लाख बकाया था, जहां से उसने 1.2 लाख का कर्ज लिया था। इसके अतिरिक्त, अपनी जमीन गिरवी रखकर तीन लाख रुपये साहू कोऑपरेटिव क्रेडिट सोसायटी से लिए थे।" क्या यह सत्य नहीं कि देश के अधिकतर किसान आज इस प्रकार के संकट से जूझते रहते है? 

सितंबर 2016 में जारी सरकारी आंकड़े के अनुसार, देशभर में किसानों पर 12.6 लाख करोड़ कुल कर्ज बकाया है। वर्ष 1990 में पहली बार राष्ट्रव्यापी किसान कर्जमाफी की घोषणा की गई थी, जिसके बाद 2008 में भी ऐसा किया गया। राज्य स्तर पर 2014 में तेलंगाना और आंध्रप्रदेश ने अपनी ऋण छूट संबंधी योजनाएं प्रारंभ की। बीते दो वर्षों में उत्तरप्रदेश सरकार 36 हजार करोड़, तो महाराष्ट्र सरकार और कर्नाटक सरकार 34-34 हजार करोड़ की कर्जमाफी योजना की घोषणा कर चुकी है। पंजाब सरकार भी चरणबद्ध तरीके से किसानों का कर्ज माफ कर रही है, जिसमें अबतक 900 करोड़ रुपये का कर्ज माफ किया जा चुका है। राजस्थान सरकार किसानों को नौ हजार करोड़ की ऋण छूट देने का दावा कर रही है। देश के अन्य राज्यों में भी किसानों ने कर्जमाफी की मांग तेज कर दी है। 

देश के विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच किसानों की कर्जमाफी "लोकलुभावन प्रतिस्पर्धा" के रूप में स्थापित हो चुका है। कौन-सी पार्टी किसानों का कितना ऋण माफ करने की घोषणा करती है, वह दल वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में उतनी ही किसान हितैषी कहलाई जाती है। स्थिति आज यह हो गई है कि कई राज्यों में किसान द्वारा कर्ज चुकाने में गिरावट आ रही है। उदाहरण स्वरूप, मध्यप्रदेश में इस वर्ष जून में सरकार को तीन हजार करोड़ से अधिक का ऋण प्राप्त हुआ था, जो जुलाई और नवंबर में घटकर क्रमश: 1804 और 261 करोड़ रह गया। 

किसानों की सरकार द्वारा कर्जमाफी वास्तव में, किसी गंभीर बीमारी के ऊपरी लक्षणों का उपचार जैसा है। किसानों के संकट की जड़ें उस 'असंतुलित' व्यवस्था में है, जो गांव-देहात में रहने वाले लोगों की बढ़ती अपेक्षाओं, सीमित संसाधनों और विकास के आभाव में सिकुड़ते अवसरों के कारण उपजी है। इस 'असंतुलन' को राजनीतिक दलों के कर्जमाफी जैसे लोकलुभावन वादों ने और अधिक गहरा करने का काम किया है। 

देश में कृषि क्षेत्र और किसानों की स्थिति क्या है? वर्ष 1950-51 में भारत के सकल घरेलू उत्पाद में कृषि संबंधित क्षेत्र का योगदान 51.8 प्रतिशत था और देश की दो तिहाई जनसंख्या कृषि पर आश्रित थी। कालांतर में सेवा और विनिर्माण में सुधार, औद्योगिक विकास के साथ अन्य क्षेत्र में प्रगति के कारण राष्ट्रीय आय में कृषि की हिस्सेदारी में कमी आई है। वर्तमान समय में, देश के सकल घरेलू उत्पाद में कृषि का हिस्सा सात दशकों में घटकर 17-18 प्रतिशत रह गया है। किंतु आजीविका के लिए कृषि पर आश्रित लोगों की संख्या में कोई बड़ी कमी नहीं आई है। देश की कुल श्रमिक आबादी का 54.6 प्रतिशत हिस्सा आज भी कृषि संबंधी गतिविधियों में शामिल है। 

कृषि मंत्रालय की ओर से जारी आंकड़ों के अनुसार, भारत में खेती योग्य जमीन वर्ष 2010-11 में 15.95 करोड़ हेक्टेयर थी, जो वर्ष 2015-16 में डेढ़ प्रतिशत घटकर 15.71 करोड़ हेक्टेयर रह गई। लघु और सीमांत किसान 84.97 प्रतिशत से बढ़कर 86.21 प्रतिशत हो गए हैं, जिनके पास कुल खेती की 47.3 प्रतिशत जमीन है। जबकि मझोले किसान 13.22 प्रतिशत है, जिनके पास कुल 43.1 प्रतिशत भूमि है। वहीं देश के बड़े किसान मात्र 0.57 प्रतिशत हैं, जिनके पास 9.04 प्रतिशत जमीनें है। इस स्थिति का सबसे प्रमुख कारण पीढ़ी-दर-पीढ़ी जमीन का बंटवारा होना है। अर्थात् खेती की जमीन सीमित ही है, लेकिन उस पर किसानों और उनपर आश्रितों, जो स्वयं को भी किसान कहते है- उनकी संख्या निरंतर बढ़ती जा रही है। यह स्थिति कृषि क्षेत्र में छिपी 'बेरोजगारी' को उजागर करती है। 

इस स्थिति का मूल कारण क्या है? पहला- देश आज उपभोक्तावाद के मकड़जाल में फंसा हुआ है, जिसे मजबूत करने में टेलीविजन की भूमिका सबसे अग्रणी है। किसान और उसपर आश्रित लोग भी स्वाभाविक रुप से टीवी के प्रचार से प्रभावित होते है और उनमें वह सभी चीजें प्राप्त करने की इच्छा जन्म लेनी लगती है, परंतु आमदनी सीमित है। दूसरा- खेती जोखिमभरा काम है, जो बहुत कुछ मौसम पर निर्भर करता है। यदि फसल बहुत अच्छी हुई तो दाम गिर जाते है, जिससे किसानों को लागत तक वसूल नहीं होती। यदि फसल खराब हो जाए, तो किसान वैसे ही बर्बाद हो जाता है। इस कारण वह कर्ज लेने लिए बाध्य हो जाता है। उपभोक्तावाद के दौर में कई किसान खेती के उद्देश्य से तो कर्ज उठाते है, किंतु कई बार पारिवारिक और सामाजिक कारणों से उसका अधिकतर हिस्सा अपनी व्यक्तिगत आवश्यकताओं को पूरा करने में खर्च कर देते है। इसी चक्रव्यूह में फंसने के कारण अधिकतर किसानों की हालत खराब रहती है, जिससे मुक्ति के लिए वह या तो आंदोलन के लिए विवश होता है या फिर आत्महत्या का मार्ग चुनता है। 

किसानों की आय दोगुनी करने की दिशा में केंद्र सरकार इस वर्ष कई फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य, उत्पादन लागत से कम से कम डेढ़ गुना निर्धारित कर चुकी है। किंतु एक सत्य यह भी है कि इसका लाभ प्रत्येक किसान को नहीं मिल रहा है। इससे लाभान्वित केवल वही किसानों हो रहे है, जिनके पास अपने परिवार की आवश्यकता पूरी करने के बाद अतिरिक्त अनाज मंडी में भेजने लायक बच रहा है और देश में ऐसे किसानों की संख्या बहुत कम है। 

यदि किसानों और उनपर आश्रितों को इस संकट से बाहर निकालना है, तो उन्हे अन्य क्षेत्रों के रोजगारों से जोड़ना होगा। इसके लिए उन्हे कौशल विकास का प्रशिक्षण के अवसर प्रदान करने होंगे। उचित शिक्षा और अन्य सुविधाएं न होने के कारण अधिकांश ग्रामीण न केवल बेरोजगार हो जाते है, बल्कि आज की गला-काट प्रतिस्पर्धा के दौड़ में किसी आधुनिक उद्योग-धंधे के लिए समर्थ भी नहीं रहते।  कटु सत्य है कि स्वतंत्रता के सात दशक बाद भी अधिकतर ग्रामीणों क्षेत्रों में आधारभूत संरचना का विकास नहीं हो पाया है। अधिकांश गांव-देहातों में सड़क, बिजली, पानी, प्राथमिक चिकित्सा, संचार आदि का आभाव है। विडंबना देखिए, 70 वर्षों में देश के सैकड़ों गांवों में पहली बार बिजली पहुंची है। आवश्यकता इस बात की भी है कि ग्रामीण क्षेत्रों में आयुष्मान भारत और सौभाग्य जैसी जनकल्याण योजनाओं का क्रियान्वान भी प्रशासन ईमानदारी से करें।

जबतक ग्रामीण क्षेत्रों सहित देश का समेकित विकास नहीं होगा, किसानों को सस्ती, सुलभ और गुणवत्ता वाली शिक्षा नहीं मिलेगी और कृषि के अतिरिक्त ग्रामीणों के लिए अन्य क्षेत्रों में अवसर पैदा नहीं होंगे- तबतक किसान असंतुष्ट रहेंगे। 

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