चीन से सुलझना चाहिए विवाद!

श्रुति व्यास
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(image) तिब्बती धर्मगुुरु दलाई लामा की अरुणाचल प्रदेश यात्रा को लेकर फिर से भारत और चीन आमने सामने हैं। चीन के विदेश मंत्रालय ने बहुत सख्त अंदाज में कहा कि दलाई लामा की यात्रा से भारत और चीन के संबंधों को गहरा नुकसान होगा। इसके बाद भारत ने इसी अंदाज में जवाब दिया कि चीन को भारत के अंदरूनी मामले में दखल नहीं देना चाहिए। दलाई लामा जब तक अरुणाचल में रहेंगे, तब तक दोनों तरफ से यह जुबानी जंग चलती रहेगी। दलाई लामा पहले भी अरुणाचल जाते रहे हैं और हर बार दोनों के बीच पहले भी ऐसी बयानबाजी हुई है। चीनी सैनिकों के भारत की सीमा में घुसने और अपना झंडा गाड़ने की घटनाएं भी हुई हैं, लेकिन कभी इन पर सैन्य विवाद नहीं हुआ है। यह दोनों देशों की समझदारी को दिखाता है कि सीमा विवाद को दोनों बातचीत के जरिए सुलझाने की कोशिश कर रहे हैं। आखिरी बार दोनों 1962 में लड़े थे और तब चीन ने अरुणाचल प्रदेश का इलाका कब्जा कर लिया था, लेकिन वे एकतरफा युद्धविराम के बाद वहां से वापस लौट गए थे। उस समय चीन ने भारत के बिल्कुल उत्तरी सिरे पर स्थित अक्साई चिन में और पूर्वी हिस्से में अरुणाचल प्रदेश में लड़ाई लड़ी थी। भारत उस लड़ाई में बुरी तरह हारा था और उसकी ग्रंथि आजतक हर भारतीय के मन में है। चीन विजेता रहा था और इसे लेकर उसमें सर्वोच्चता का भाव अब भी है। इसके बावजूद दोनों देशों के बीच सीमा विवाद को निपटाने के लिए 20 दौर से ज्यादा की बातचीत हो चुकी है। भारत की ओर राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोवाल और चीन के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार यंग जिची के बीच लगातार बातचीत हो रही है। दोनों देशों में नेतृत्व बदलते रहने के बावजूद यह समझ बनी है कि सीमा विवाद का सैन्य समाधान संभव नहीं है। भारत इस बात को चीन के संदर्भ में भी समझ रहा है और पाकिस्तान के संदर्भ में भी। पाकिस्तान के साथ अब तक हुई सारी लड़ाइयों में भारत जीता है, लेकिन भारत की ओर से इस बात की कोशिश नहीं हुई है कि सैन्य ताकत के दम पर उसके कब्जे वाले पाकिस्तान को छुड़ा कर भारत में मिला लिया जाए। हालांकि पाक अधिकृत कश्मीर और अरुणाचल प्रदेश व अक्साई चिन का मामला अलग अलग है। अरुणाचल प्रदेश भारत का अभिन्न हिस्सा है। हैरानी की बात है कि 1962 में इस इलाके को कब्जे में लेकर चीन ने छोड़ दिया था और उसके बाद से लगातार वह इसे हासिल करने की कोशिश कर रहा है। उसने भारत के दूसरे राज्य सिक्किम पर अपना दावा छोड़ दिया। 1975 में जब इस बौद्ध मठ वाले इलाके को जनमत संग्रह के जरिए भारत में मिलाया गया था, तब चीन ने इस जनमत संग्रह को खारिज कर दिया था। लेकिन 2003 में भारत और चीन के बीच जो संधि हुई, उसमें उसने एक तरह से सिक्कम पर से अपना दावा छोड़ दिया और उसे भारत का राज्य मान लिया। चीन के विदेश मंत्रालय ने भी इसे अपने देश के नक्शे से हटा दिया। लेकिन अरुणाचल प्रदेश को लेकर उसने ऐसा नहीं किया। उलटे अरुणाचल प्रदेश और खास कर इसके तवांग मठ के हिस्से को हासिल करने के लिए चीन लगातार कोशिश कर रहा है। कई बरसों तक चीन की ओर से सीमा विवाद पर बात करने वाले वरिष्ठ कम्युनिस्ट नेता दाई बिंगो ने तो यह प्रस्ताव भी दिया है कि अगर भारत तवांग पर अपना दावा छोड़ दे तो मैकमोहन रेखा के आसपास चल रहा सीमा का विवाद हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा। माना जा रहा है कि उन्होंने चीन की कम्युनिस्ट पार्टी और मौजूदा सरकार की परोक्ष सहमति से यह प्रस्ताव दिया है। असल में चीन तवांग को दक्षिण तिब्बत मानता है और उसे अपने देश का हिस्सा मानता है। वह चाहता है कि जिस तरह पंचशील समझौते के साथ पंडित जवाहरलाल नेहरू ने तिब्बत को चीन का हिस्सा माना था, वैसे ही उसे तवांग भी मिल जाए। लेकिन भारत के लिहाज से भी तवांग का खासा महत्व है। तिब्बती बौध धर्मावलंबियों के लिए यह बहुत भावनात्मक मुद्दा है। भारत हमेशा दलाई लामा का समर्थन करता रहा है, ऐसे में वह तवांग पर चीन का कब्जा नहीं होने दे सकता है। इसके अलावा रणनीतिक और सामरिक रूप से भी यह भारत के लिए बेहद अहम है। इसलिए तवांग को बचाए रखते हुए चीन के साथ सीमा विवाद को सुलझाने की जरूरत है। भारत की मौजूदा सरकार ने बांग्लादेश के साथ जमीनों की अदला बदली करके बरसों से लंबित मामले को सुलझाया है। इसलिए उम्मीद की जा रही है कि चीन के साथ भी कोई साहसिक पहल करके सीमा विवाद को सुलझाने का प्रयास होगा। अक्साई चिन से लेकर सियाचिन और अरुणाचल प्रदेश तक उत्तर और पूर्वी सीमा पर कई तरह के विवाद चल रहे हैं। इन विवादों की वजह से भारत की सैन्य ताकत का सबसे बड़ा हिस्सा यहां तैनात है और हमेशा टकराव की स्थिति बनी रहती है। तभी चीन के साथ तो कभी पाकिस्तान के साथ। पाकिस्तान के साथ बढ़ते तनाव की वजह से तो अमेरिकी प्रशासन ने आगे बढ़ कर सक्रिय भूमिका निभाने का भी प्रस्ताव दे दिया है। हालांकि भारत ने इसे दो टूक अंदाज में खारिज कर दिया है और कहा कि वह दोपक्षीय बातचीत के जरिए ही इसे सुलझाएगा। चीन और पाकिस्तान दोनों के साथ सीमा विवाद को जितनी जल्दी सुलझा लिया जाएगा, भारत की सामरिक और आर्थिक दोनों हितों के लिहाज से उतना अच्छा रहेगा।
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