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प्रवासी मजदूरों की पीड़ा!

सुशांत कुमार
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बिहार और उत्तर प्रदेश के प्रवासी मजदूर गुजरात से भगाए जा रहे हैं। इसके पीछे कोई राजनीति हो सकती है, इससे इनकार नहीं है पर असलियत यह है कि प्रवासी मजदूरों को खोज कर पीटा जा रहा है और उनके साथ बदसलूकी हो रही है, जिसकी वजह से सरकार की मनुहार के बावजूद बड़ी संख्या में प्रवासी बसों, ट्रकों और ट्रेनों में ठूंस कर वापस लौट रहे हैं। एक अनुमान के मुताबिक एक हफ्ते में 60 हजार प्रवासी लौट चुके हैं। 

अपना जमा जमाया रोजगार और लगी बंधी नौकरी छोड़ कर, अपमानित होकर लौटना कितना पीड़ादायक होता है, यह वहीं बता सकता है, जो लौट रहा है। पर ऐसे लौटने वालों की संख्या भारत में बहुत है। गुजरात कोई अपवाद नहीं है। गुजरात में तो प्रवासी सिर्फ पीटे जा रहे हैं, असम में तो उनकी हत्या कर दी जाती है। असम में अत्याचार और हत्याओं का सिलसिला शुरू होता है तो प्रवासी लौटने लगते हैं लेकिन फिर रोजी रोटी की मजबूरी उनको वहीं ले जाती है। 

मुंबई, गुजरात, असम में नस्ली हिंसा और अपमान का शिकार होकर मजदूरों को लौटना पड़ा है तो कई जगहों से कारोबार की संभावनाएं खराब होने के कारण उनको लौटना पड़ा है। दिल्ली में जब डीजल के ऑटो बंद हुए तो हजारों की संख्या में प्रवासी घर लौटे थे। तमिलनाडु में कुडनकूलम परमाणु संयंत्र में काम बंद हुआ था तब भी हजारों प्रवासी लौटे थे। मनरेगा जैसी योजनाओं के असर में भी कुछ प्रवासी घर लौटे पर उनकी संख्या सीमित है। 

भारत में घरेलू प्रवासियों की संख्या करोड़ों में है और अंतरराष्ट्रीय प्रवासियों की संख्या भी तीन करोड़ है। अभी खबर आई थी कि अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने वीजा के नियमों को सख्त बनाना शुरू किया है और भारत या दुनिया के दूसरे देशों से वहां आने वाले लोगों की शृंखला तोड़नी शुरू की है। यह भी खबर है कि अमेरिका में अवैध भारतीय प्रवासियों को पहचान कर वहां से निकालने के काम में तीन गुना बढ़ोतरी हुई है। यानी पहले एक भारतीय निकाला जाता था तो अब तीन निकाले जा रहे हैं। 

इसका एक कारण अमेरिका में बढ़ती बेरोजगारी है। गुजरात से बिहार और उत्तर प्रदेश के प्रवासी मजदूरों के निकाले जाने का एक कारण भी आर्थिक है। जिस तरह अमेरिका में ट्रंप प्रशासन अपने बेरोजगारों को नौकरी दिलाने के लिए भारत और दूसरे देशों के लोगों को निकाल रहा है उसी तरह गुजरात से भी प्रवासी निकाले जा रहे हैं। दोनों के निकालने का तरीका अलग है। वहां कानूनी रूप से निकाले जा रहे हैं और यहां पीट कर निकाले जा रहे हैं। 

गुजरात की सरकार और भाजपा के नेता यह बताने में लगे हैं कि कांग्रेस के विधायक और पिछड़ी जाति के नेता अल्पेश ठाकोर ने नफरत फैलाने वाले भाषण दिए और उनके समर्थकों ने प्रवासियों पर हमले किए, जिसके बाद वे डर कर भागने लगे। पर यह अधूरा सच है। असली बात का संकेत खुद राज्य सरकार के कदमों और उसके नेताओं के बयानों से मिलता है। पिछले दिनों राज्य सरकार ने फैसला किया कि वह अपने यहां उद्योग और कारोबार में 80 फीसदी नौकरी गुजरातियों के लिए आरक्षित करेगी। 

इस फैसले के बाद कितने प्रवासियों के पास गुजरात में रहने की वजह बचती है? अगर प्रवासी पीट कर नहीं भगाए जाते तो वैसे ही नौकरी छीन जाने के कारण उनको भागना पड़ता। दूसरे, नरेंद्र मोदी, अमित शाह और विजय रूपाणी के बाद गुजरात भाजपा के चौथे बड़े नेता नितिन पटेल हैं, जो पिछले कई सालों से कह रहे हैं कि बिहार के लोगों के गुजरात में भर जाने से राज्य में गरीबी बढ़ी है। यानी गरीबी कम करनी है कि बिहारियों को भगाना होगा। इस मानसिकता ने भी गुजरात में बरसों से काम कर रहे बिहारियों के लिए मुश्किल हालात पैदा किए। 

बिहार के नेता इस बात से खुश होते हैं कि पोस्टल इकोनॉमी फल फूल रही है। ध्यान रहे बाहर से पैसा रिसीव करने के मामले में बिहार देश भर के शीर्ष राज्यों में से एक है। पिछले 28 साल में लालू प्रसाद, राबड़ी देवी और नीतीश कुमार ने बिहार का जो भट्ठा बैठाया है, उसका नतीजा यह है कि लाखों की संख्या में लोग बाहर नौकरी और मजदूरी के लिए निकले हैं। 

28 साल में लालू और नीतीश ने बिहार को मजदूर सप्लाई करने वाली फैक्टरी में बदल दिया है। तभी बिहार में खेत मजदूर नहीं मिल रहे हैं पर पंजाब की पूरी खेती बिहारी मजदूरों पर निर्भर है। तमिलनाडु के कुडानकूलम से लेकर कश्मीर के काजीगंड तक परमाणु संयंत्र हो या रेल लाइन का निर्माण हो, मजदूरी बिहार के लोग कर रहे हैं। और हां, दिल्ली के मुखर्जी नगर से लेकर राजस्थान के कोटा तक तमाम शिक्षण संस्थान भी बिहार, उत्तर प्रदेश के छात्रों से चल रहे हैं। ये छात्र मजदूर नहीं हैं पर प्रवासी तो हैं! इनकी भी पीड़ा है, जिसका ख्याल न तो बिहार और उत्तर प्रदेश में सरकार चला रहे लोगों को है और न उन राज्यों को है, जहां की अर्थव्यवस्था में ये प्रवासी सबसे ज्यादा योगदान दे रहे हैं। 

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