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नाम में क्या रखा है?

अजित द्विवेदी
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शेक्सपीयर के महान नाटक ‘रोमियो एंड जूलियट’ में जूलियट ने यह अमर संवाद बोला था – नाम में क्या रखा है, गुलाब को किसी नाम से पुकारो, उसकी खुशबू वैसी ही प्यारी रहेगी। जूलियट ने इसी संवाद के क्रम में यह भी कहा था कि ‘नाम एक कृत्रिम और अर्थहीन मान्यता है’। पर भारत के नेताओं ने शेक्सपीयर को गलत साबित कर दिया! यह भी एक संयोग है कि हम भारतीय लोग शेक्सपीयर के मुकाबले में तुलसीदास के साहित्य को रखते हैं और इस मामले में तुलसीदास सही साबित हो गए। तुलसीदास ने रामचरितमानस में लिखा है – कलियुग केवल नाम अधारा, सुमिर सुमिर नर उतरहीं पारा। 

तुलसीदास को लग गया था कि कलियुग में राम नाम ही आधार होगा, जिसके सुमिरन से जीवन की वैतरणी के पार उतरा जा सकता है। भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने तुलसीदास की इस लाइन की गांठ बांधी है। उन्होंने चुनावी वैतरणी पार करने के लिए हर बार राम नाम का सुमिरन किया है। अब वे नाम जाप की राजनीति का विस्तार कर रहे हैं। इलाहाबाद का नाम प्रयागराज कर दिया है और फैजाबाद का नाम अयोध्या कर दिया है। यह सिलसिला तब तक चलेगा, जब तक नाम जाप की महिमा का प्रसाद मिल नहीं जाता है।

आगे बढ़ने से पहले यह जान लेना जरूरी है कि सिर्फ भाजपा के नेता ही नाम की महिमा को चुनावी पतवार नहीं बना रहे हैं। दूसरी पार्टियों के नेताओं ने भी शेक्सपीयर को गलत साबित करने का भरपूर प्रयास किया है। हाल ही में दिल्ली की आम आदमी पार्टी की नेता आतिशी मारलेना ने अपना नाम बदल लिया क्योंकि उनको लग रहा था कि मारलेना उपनाम से उनके ईसाई होने का आभास हो रहा है, जिसका भाजपा दुरुपयोग कर सकती है। उन्होंने अपना नाम आतिशी कर लिया और कई जगह आतिशी सिंह लिखा जाने लगा है। इसी तरह पिछले लोकसभा चुनाव में चांदनी चौक के आप प्रत्याशी आशुतोष का नाम अचानक आशुतोष गुप्ता हो गया था। 

बहरहाल, सरकार में आने के बाद भाजपा योजनाओं और संस्थाओं के नाम बदल रही थी अब वह शहरों के नाम बदलने लगी है। शहरों के नाम पहले भी बदले गए हैं। पर उनका मकसद परंपरा और स्थानीयता की भावना को संतुष्ट करना था। जैसे बंगलोर का नाम बेंगलुरू कर दिया गया है, मद्रास चेन्नई हो गया, कलकत्ता कोलकाता हो गया या बांबे का नाम मुंबई कर दिया गया। मशहूर कन्नड़ लेखक यूआर अनंतमूर्ति ने बंगलोर का नाम बदले जाने पर कहा था कि स्थानीय लोगों के लिए यह हमेशा बेंगलुरू ही था वैसे ही जैसे बंगाली लोगों के लिए कलकत्ता हमेशा कोलकाता ही था। यह उच्चारण, भाषा या ज्यादा से ज्यादा स्थानीय अस्मिता का मुद्दा था। अगर कोई राजनीतिक मकसद था भी तो वह बहुत मामूली सा था। 

पर इलाहाबाद का नाम प्रयागराज करना या फैजाबाद का नाम अयोध्या करना या अहमदाबाद का नाम बदल कर कर्णावती करने का प्रस्ताव विशुद्ध रूप से राजनीतिक पहल है। इन शहरों को धार्मिक प्रतीक बना दिया गया और इस बात को दरकिनार कर दिया गया कि अयोध्या का अस्तित्व मिटा कर फैजाबाद नहीं था। फैजाबाद के साथ साथ अयोध्या भी थी। जैसे इलाहाबाद के साथ ही प्रयाग भी था। वहां गंगा, यमुना और मिथकीय सरस्वती का संगम है और इसलिए प्रयाग भी है। इलाहाबाद के कारण प्रयाग के अस्तित्व पर सवाल नहीं था। इन दोनों नामों का सह अस्तित्व था। शहरों का यह सह अस्तित्व भारत की परंपरा का हिस्सा है। भारत अपने आप में इसकी मिसाल है। इंडिया और हिंदुस्तान के साथ साथ भारत का भी अस्तित्व है। भारत का संविधान कहता है – इंडिया दैट इज भारत! यह प्रयास तो नहीं हो रहा है कि अब इंडिया और हिंदुस्तान नहीं होगा, सिर्फ भारत होगा? या अब सिर्फ नई दिल्ली होगी न्यू देल्ही नहीं लिखा-बोला जाएगा? राष्ट्रीय राजधानी के ये दोनों नाम साथ साथ चलते हैं।

अब सवाल है कि नाम बदलने के प्रतीकात्मक काम क्यों हो रहा है और इससे क्या हासिल होना है? हासिल का पता बाद में चलेगा पर क्यों हो रहा है इसका कुछ कुछ अंदाजा लग रहा है। असल में किसी भी सरकार के लिए यह सबसे आसान काम होता है। जब सरकारें अपने बुनियादी लक्ष्य को हासिल करने में विफल हो जाती हैं तो वह ऐसे प्रतीकात्मक काम करती हैं। सरकार रोजगार देने में नाकाम रही है, शिक्षा की हालत दिन ब दिन खराब होती जा रही है, स्वास्थ्य सेवाओं में कोई गुणात्मक सुधार नहीं हुआ है, बुनियादी सुविधाएं और रोजमर्रा की जरूरत की चीजें महंगी होती जा रही हैं, भ्रष्टाचार की स्थिति में रत्ती भर भी सुधार नहीं हुआ है तो इन सबसे ध्यान हटाने के लिए नाम बदलने का प्रतीकात्मक काम हो रहा है।  

पर असल में देश के मतदाताओं की सामूहिक समझ का इससे बड़ा अपमान नहीं हो सकता है कि चुनाव से पहले कोई पार्टी शहरों या जिलों के नाम बदल कर यह सोचे कि इससे ऐसी लहर उठेगी, जिसमें आम मतदाता बह जाएगा और चुनावी वैतरणी पार हो जाएगी। यह एक खतरनाक प्रवृत्ति भी है, जो लंबे समय में देश की साझा विरासत को नुकसान पहुंचाएगी और अंततः देश की एकता और अखंडता के लिए खतरा पैदा करेगी। क्योंकि धार्मिक आधार पर शहरों के नाम बदल कर एक बड़ी आबादी को यह संदेश दिया जा रहा है कि यहां कि विरासत में या यहां के इतिहास में तुम्हारा कुछ नहीं है। इस तरह के काम से अलगाव की भावना और बढ़ेगी, जो अंततः देश को अंदर से कमजोर करेगी।

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