चीन, पाक की कूटनीतिः क्या हो जवाब?

श्रुति व्यास
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(image) पाकिस्तान के साथ कूटनीति के मोर्चे पर पिछले कुछ समय से गतिरोध बना है। अब चीन के साथ भी भारत की कूटनीति इसी दिशा में बढ़ रही है। चीन की महत्वाकांक्षी परियोजना वन बेल्ट, वन रोड, ओबीओआर के लिए बीजिंग में बुलाई गई बेल्ट एंड रोड फोरम की बैठक में भारत की गैरहाजिरी ने इस गतिरोध को और बढ़ा दिया है। भारत ने शनिवार को एक बयान जारी करके इस सम्मेलन में नहीं शामिल होने की जो दलील दी, लगभग उसी शब्दावली और उन्हीं तर्कों के साथ चीन ने रविवार को जवाब दिया। भारत ने अपनी संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का मुद्दा उठाया। ये दोनों मुद्दे चीन के साथ भारत 1961 से उठाता रहा है। जब जब पाक अधिकृत कश्मीर में चीन ने कोई पहल की या अपनी मौजूदगी बढ़ाई तो भारत ने उसका जोरदार विरोध किया। यह विरोध 1961 से लेकर 2010 तक होता रहा है। चीन ने धीरे धीरे पाकिस्तान से दोस्ती बढ़ाई और पाक अधिकृत कश्मीर के कई इलाकों में अपनी पैठ बना ली। पाकिस्तान ने भी पाक अधिकृत कश्मीर के कई इलाकों में और गिलगिलत बाल्टिस्तान में चीन की मौजूदगी बढ़ने दी। एक रणनीति के तहत चीन ने पाक अधिकृत कश्मीर में अपने सैनिक तैनात किए और निर्माण की कई परियोजनाएं शुरू कीं। पाकिस्तान ने भी चीन के लिए रास्ते खोल दिए। पाक अधिकृत कश्मीर और चीन के शिनझियांग प्रांत के बीच कारोबारी समझौते भी हुए। हर बार भारत ने इसका विरोध किया। यह हकीकत है कि चीन और पाकिस्तान की सीमा कहीं नहीं मिलती है। भारत के कब्जा किए गए हिस्सों में चीन को लाकर पाकिस्तान ने भारत की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता दोनों का अपमान किया। लेकिन ऐसा करते हुए चीन ने कभी भी कूटनीति की परवाह नहीं की। अब वह पाकिस्तान के साथ मिल कर चीन पाकिस्तान आर्थिक गलियारे, सीपीईसी पर काम कर रहा है। करीब 50 अरब डॉलर की यह परियोजना पाक अधिकृत कश्मीर से होकर गुजरेगी। तभी भारत ने अपनी संप्रभुता और अखंडता का मुद्दा उठाया। इसके जवाब में चीन के राष्ट्रपति शी जिनफिंग ने रविवार को बेल्ट एंड रोड फोरम की बैठक के उद्घाटन भाषण में अपनी संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता की बात कही। जाहिर तौर पर उसका इशारा अरुणाचल प्रदेश और तिब्बत की ओर था। पिछले दिनों जब तिब्बती धर्मगुरू दलाई लामा अरुणाचल प्रदेश की यात्रा पर गए थे, तब चीन ने इसका बहुत विरोध किया था और यह भी कहा था कि भारत को इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा। ऐसा लग रहा है कि चीन ने भारत को घेरने और उसे अलग थलग करने की कूटनीति पर काम शुरू कर दिया है। चीन का मानना है कि भारत तिब्बत का कार्ड खेल कर चीन पर दबाव बना रहा है। इससे पहले भारत ने अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और जापान के साथ मिल कर एशिया प्रशांत में चीन को अलग थलग करने का प्रयास किया था। वियतनाम के साथ तेल खोजने की संधि करके और दक्षिण चीन सागर में अधिकार के मुद्दे पर वियतनाम का साथ देकर भी भारत ने चीन को नाराज किया था। यह दोनों कूटनीति भारत के लिहाज से ठीक है। लेकिन सवाल है कि इसके आगे क्या होगा क्या इस बारे में भारत के नेतृत्व ने सोचा है? यह सही है कि चीन को लेकर अमेरिका और जापान की अपनी चिंताएं हैं। जिस तरह से बेल्ट एंड रोड फोरम की बैठक में चीन ने उत्तर कोरिया को आमंत्रित किया, उससे दोनों देश परेशान हैं। लेकिन इसके बावजूद जापान, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया तीनों ने अपने प्रतिनिधि इस सम्मेलन के लिए भेजे। भारत और भूटान को छोड़ कर दक्षिण एशिया के सारे देश इस सम्मेलन में हिस्सा लेने गए। सो, भारत को यह समझ लेना चाहिए कि सार्क देशों के सम्मेलन को लेकर भारत ने जिस तरह से पाकिस्तान को अलग थलग किया और पिछले साल नवंबर में इस्लामाबाद में होने वाला सार्क सम्मेलन स्थगित कराया, उस तरह के काम वह चीन के साथ नहीं कर सकता है। भारत के कहने पर दक्षिण एशिया का कोई देश इस्लामाबाद नहीं गया, लेकिन भारत के बहिष्कार के बावजूद सारे देश चीन गए। भारत को इस फर्क और इस हकीकत को समझना चाहिए। भारत को इस बात का भी ध्यान रखना होगा की कूटनीति में वह उस मुकाम तक न जाए, जहां चीन और पाकिस्तान को वह एक चश्मे से देखने लगे। भारत को दोनों को अलग करना होगा और चीन के साथ पिछले कुछ समय से सद्भाव बनाने का जो प्रयास चल रहा है, उसे छोड़ना नहीं होगा। भारत उससे जितना दूर होगा पाकिस्तान उतना ही नजदीक होता जाएगा। यह स्थिति आदर्श नहीं होगी। ऊपर से चीन सड़क और समुद्र के रास्ते लगभग आधी दुनिया के जुड़ने के उपाय कर रहा है। इसके आर्थक और सामरिक नतीजे दूरगामी होंगे। भारत अगर इससे दूर रहता है तो उसे वैकल्पिक उपाय भी करने होंगे। असल में भारत को अपनी ताकत समझने की जरूरत है। इस ताकत के आधार पर ही वह अंतरराष्ट्रीय कूटनीति करे तो उसकी जगह बनेगी। नहीं तो एक तरफ चीन उसे धकेल कर किनारे करता जाएगा और दूसरी ओर अमेरिका अपना पिछलग्गू बनाए रखेगा। भारत ने तो अमेरिका को उसकी मनमानी करने से रोक पा रहा है और न चीन को आगे बढ़ने से रोक पा रहा है। अगर इस दिशा में काम नहीं किया गया तो भारत दुनिया की महाशक्ति बनना तो दूर एक बड़ी क्षेत्रीय ताकत भी नहीं रह पाएगा।
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