Loading... Please wait...

कांग्रेस करेगी ऐतिहासिक भूल!

अजित द्विवेदी
ALSO READ

कांग्रेस पार्टी के लिए इस समय ऐतिहासिक भूमिका निभाने का समय है। उसने खुद कहा है कि अगला लोकसभा चुनाव तानाशाही और लोकतंत्र के बीच होगा। कांग्रेस खुद को लोकतंत्र बचाने की ऐतिहासिक भूमिका में देख रही है। पर क्या वह इस भूमिका को निभाने के लिए तैयार है और इसके लिए जरूरी कदम उठा रही है? इसका जवाब ना में होगा। कांग्रेस खतरे को जरूर भांप रही है और उसकी गंभीरता का अंदाजा उसको है पर उससे निपटने के लिए जरूरी कदम उठाने से या तो वह जान बूझकर बच रही है या किसी बड़ी गलतफहमी का शिकार हो गई है। 

पहले कांग्रेस की गलतफहमी की चर्चा जरूरी है। तीन राज्यों – मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में कांग्रेस की जीत ने उसके नेताओं के मन में गलतफहमी पैदा की है। कांग्रेस को लग रहा है कि लोगों ने उसे भाजपा का विकल्प मान लिया है और इसलिए वहीं है, जो पूरे देश में भाजपा को टक्कर दे सकती है। इन राज्यों को लेकर कांग्रेस के मन में थोड़ी बहुत गलतफहमी चुनाव से पहले भी थी। तभी चुनाव से पहले उसने ढेरों गलतियां कीं। उम्मीदवार चुनने से लेकर गठबंधन बनाने तक कई भूलें हुईं। वह तो उसके संयोग अच्छे थे, जो वह मध्य प्रदेश और राजस्थान में चुनाव जीत गई। अगर कांग्रेस गलतफहमी में नहीं रहती तो उसकी जीत ज्यादा बड़ी होती है। 

इन राज्यों के चुनाव नतीजों के बाद कहां तो कांग्रेस को बैठ कर आत्मचिंतन करना चाहिए था और अपनी गलतियों को सुधारने का प्रयास करना चाहिए था पर उलटे उसकी गलतफहमी और बढ़ गई। उसे लगने लगा कि देश भर में भाजपा के खिलाफ माहौल है और भाजपा के विकल्प के तौर पर लोग कांग्रेस को देख रहे हैं। ये दोनों बातें मिथक हैं। कम से कम तीन राज्यों के चुनाव नतीजों के आधार पर तो कहा ही जा सकता है कि भाजपा से मोहभंग मिथक है। मध्य प्रदेश और राजस्थान में उसका वोट आधार कायम रहा है और छत्तीसगढ़ में भाजपा की हार मोटे तौर पर रमन सिंह सरकार पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों और स्थानीय कारणों से हुई है। कांग्रेस इन नतीजों की गलत व्याख्या कर रही है। वह अपना समय आया हुआ मान रही है। यह सही है कि कांग्रेस के साथ इस समय लोगों का प्रवाह है। पर वह प्रवाह या मोमेंटम ऐसा नहीं है कि कांग्रेस अकेले जीत जाए। उसके सबसे बुजुर्ग और राजनीतिक वास्तविकता समझने वाले नेता एके एंटनी ने माना है कि कांग्रेस अकेले भाजपा को नहीं हरा पाएगी। इसके लिए कांग्रेस को गठबंधन बनाना होगा और उसके लिए आगे बढ़ कर कांग्रेस को कुछ कुर्बानी देनी होगी। यह नहीं हो सकता है कि कांग्रेस प्रादेशिक क्षत्रपों से तो कुर्बानी मांगे पर अपना हित नहीं छोड़े। 

कांग्रेस को यह बात समझनी होगी कि प्रादेशिक पार्टियों के पास सिर्फ उनका एक या ज्यादा से ज्यादा दो राज्य हैं, जहां उनको अपना अस्तित्व बचाने के लिए लड़ना है। जबकि कांग्रेस खराब से खराब स्थिति में भी देश के आधे राज्यों में पूरी ताकत से लड़ेगी। इसलिए कुर्बानी देने का ज्यादा स्कोप कांग्रेस के पास है। वह अगर मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, गुजरात, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, असम, तेलंगाना, कर्नाटक और पूर्वोत्तर के राज्यों में ज्यादातर या लगभग सभी सीटों पर चुनाव लड़ेगी तो देश के बाकी हिस्सों में उसे प्रादेशिक क्षत्रपों को एडजस्ट करना चाहिए। उनके लिए ज्यादा जगह छोड़नी चाहिए ताकि एकजुट विपक्ष का मैसेज मतदाता को दिया जा सके। मतदाता को यह भरोसा दिलाया जा सके कि चुनाव के बाद एक अच्छी और मजबूत सरकार बन सकती है। अगर ऐसा संदेश नहीं दिया गया और भाजपा मजबूत बनाम मजबूर सरकार का नैरेटिव बनाने में कामयाब रही तो सबसे बड़ा नुकसान कांग्रेस को ही होगा।

कांग्रेस को इस बात को समझना होगा कि उसका अस्तित्व ज्यादा दांव पर लगा है। प्रादेशिक पार्टियों के लिए ज्यादा मुश्किल वाला चुनाव नहीं है यह। वैसे भी भाजपा एकाध अपवादों को छोड़ कर ज्यादातर प्रादेशिक पार्टियों से हारती ही रही है। भाजपा के लिए सपा, बसपा, राजद, तृणमूल, एनसीपी, टीआरएस, डीएमके, जेडीएस, टीडीपी आदि के हराने से ज्यादा आसान कांग्रेस को हराना है। इसलिए कांग्रेस को ज्यादा चिंता करने की जरूरत है। पर हैरानी की बात है कि राहुल गांधी हुंकार भर रहे हैं कि कांग्रेस को हलके नहीं लिया जाए या कांग्रेस पूरी ताकत से उत्तर प्रदेश में लड़ेगी और सबको चौंकाएगी। 

राहुल गांधी का यह आत्मविश्वास तीन राज्यों के चुनाव नतीजों की गलत व्याख्या से आया है। वे समझ रहे हैं कि भाजपा के विकल्प के तौर पर लोग कांग्रेस को देख रहे हैं। यह बात सिर्फ उन्हीं राज्यों के लिए है, जहां भाजपा से कांग्रेस का सीधा मुकाबला है। जहां भाजपा से दूसरी पार्टियां सीधी लड़ाई लड़ती हैं वहां कांग्रेस के लिए ज्यादा संभावना नहीं है। बिहार में भाजपा की सीधी लड़ाई हमेशा राजद से है। ऐसे ही बंगाल में तृणमूल कांग्रेस और उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा का गठबंधन भाजपा से लड़ेगा। जहां भी भाजपा से मुकाबले का दूसरा विकल्प लोगों के पास है वहां कांग्रेस मुकाबले से बाहर होगी। और जहां भाजपा से उसका सीधा मुकाबला होगा वहां पलड़ा किसी भी तरफ झुक सकता है। सो, कांग्रेस को अपनी गलतफहमी छोड़नी होगी और ऐतिहासिक भूमिका निभाने के लिए कुछ कुर्बानी देनी होगी। उसे समझना होगा कि केंद्र में सरकार बनाने और अपना प्रधानमंत्री बनाने से ज्यादा उसके लिए जरूरी भाजपा को रोकना है। उसे भाजपा के हाथों गंवाई अपनी राजनीतिक जमीन हासिल करने की चिंता करनी चाहिए। और यह तभी होगा, जब वह प्रादेशिक क्षत्रपों को भी उनके असर वाले इलाके में अपनी लड़ाई लड़ने की छूट दे और उनकी लड़ाई में मददगार बने।

400 Views

बताएं अपनी राय!

नीचे नजर आ रहे कॉमेंट अपने आप साइट पर लाइव हो रहे है। हमने फिल्टर लगा रखे है ताकि कोई आपत्तिजनक शब्द, कॉमेंट लाइव न हो पाए। यदि ऐसा कोई कॉमेंट- टिप्पणी लाइव हुई और लगी हुई है जिसमें अर्नगल और आपत्तिजनक बात लगती है, गाली या गंदी-अभर्द भाषा है या व्यक्तिगत आक्षेप है तो उस कॉमेंट के साथ लगे ‘ आपत्तिजनक’ लिंक पर क्लिक करें। उसके बाद आपत्ति का कारण चुने और सबमिट करें। हम उस पर कार्रवाई करते उसे जल्द से जल्द हटा देगें। अपनी टिप्पणी खोजने के लिए अपने कीबोर्ड पर एकसाथ crtl और F दबाएं व अपना नाम टाइप करें।

आपका कॉमेट लाइव होते ही इसकी सूचना ईमेल से आपको जाएगी।

© 2019 ANF Foundation
Maintained by Quantumsoftech