थेरेसा मे का चुनावी दांव!

श्रुति व्यास
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(image) ब्रिटेन की प्रधानमंत्री थेरेसा मे ने बड़ा दांव खेला है। उन्होंने कोई ढाई साल पहले ही ब्रिटेन में आम चुनाव कराने का फैसला कर लिया है। यह बहुत साहसी लेकिन जोखिम वाला फैसला है। उनकी कोशिश है कि ब्रिटिश संसद के निचले सदन हाउस ऑफ कामंस में कंजरवेटिव पार्टी के सदस्यों की संख्या बढ़ाई जाए ताकि यूरोपीय संघ से ब्रिटेन के बाहर होने के लिए चल रही वार्ताओं में मुश्किल नहीं आए और उन्हें ज्यादा दबाव में नहीं आना पड़े। वैसे कायदे से मे को चुनाव कराने की जरूरत नहीं थी क्योंकि हाउस ऑफ कामंस में उनकी पार्टी को साधारण बहुमत हासिल है। साढ़े छह सौ सदस्यों के सदन में उनकी पार्टी के 330 सदस्य हैं, जबकि बहुमत का आंकड़ा 325 सदस्यों का है। तभी वे बार बार कह रही थीं कि मध्यावधि चुनाव कराने का उनका कोई इरादा नहीं है। यह कहते कहते हुए उन्होंने चुनाव का ऐलान किया, जिसके लिए विपक्षी पार्टियां तैयार नहीं थीं। वैसे भी ब्रिटेन में मध्यावधि चुनाव कराने का फैसला किसी भी सरकार के लिए आसान नहीं है। इसका कारण यह है कि 2011 में कंजरवेटिव और लिबरल डेमोक्रेट दोनों पार्टियां हाउस ऑफ कामंस के तय पांच साल के कार्यकाल के कानून पर सहमत हुई थीं। इसके मुताबिक चुनाव पांच साल पर होंगे। इस कैलेंडर के मुताबिक अगला चुनाव 2020 की मई के पहले गुरुवार को होने वाले थे। अगर उससे पहले चुनाव कराना है तो उसके लिए हाउस ऑफ कामंस के दो तिहाई सदस्यों की सहमति से ऐसा हो सकता है। तभी मे ने चुनाव की घोषणा के साथ ही सदन को भंग करने के लिए वोटिंग का ऐलान किया। चूंकि सदन की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी लेबर पार्टी के नेता जरमी कोर्बिन भी चुनाव के लिए तैयार थे, इसलिए सदन को भंग करने में मुश्किल नहीं आई। पर अब असली सवाल यह है कि क्या मे अपना लक्ष्य हासिल कर पाएंगी? थेरेसा मे को पिछले साल जुलाई में संयोग से सत्ता मिली थी। उस समय के प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने बड़े भरोसे के साथ ब्रिटेन के यूरोपीय संघ, ईयू में रहने या बाहर होने के सवाल पर जनमत संग्रह कराया था। वे चाहते थे कि ब्रिटेन ईयू में बना रहे। लेकिन ब्रिटेन के लोगों ने इसके खिलाफ मतदान किया। इसकी वजह से उनको इस्तीफा देना पड़ा और मे को सत्ता मिली। ध्यान रहे 2015 का चुनाव कंजरवेटिव पार्टी ने कैमरन के करिश्मे पर जीता था। लेकिन जनमत संग्रह की हार ने उनका कैरियर असमय ही खत्म कर दिया। बहरहाल, अब मे का लक्ष्य कंजरवेटिव सांसदों की संख्या एक सौ बढ़ाने की है। दूसरी ओर लेबर पार्टी के नेता जरमी कोर्बिन भी जीत के भरोसे में हैं। उन्होंने पार्टी के अंदर बड़ी उठापटक के बाद नेतृत्व हासिल किया है और उन पर इस बात का दबाव है कि वे पार्टी के सदस्यों की संख्या 229 से बढ़ाएं। उन्हें बहुमत हासिल करने के लिए करीब एक सौ अतिरिक्त सीटें जीतनी होंगी। लेबर पार्टी के आक्रामक अभियान के बाद मे के सामने दूसरी चुनौती स्कॉटिश नेशनल पार्टी की है। इसके नेताओं ने इसी चुनाव के बहाने एक बार फिर ब्रिटेन से आजादी की मांग शुरू कर दी है। इससे ऐसा लग रहा है कि मे ने मध्यावधि चुनाव की घोषणा करके विवादों का पंडोरा बॉक्स खोल दिया है। स्कॉटिश नेशनल पार्टी की प्रमुख निकोला स्टर्जन ने वैसे तो मे के फैसले का विरोध किया है, लेकिन उनका कहना है कि वे स्कॉटलैंड के हितों के लिए चुनाव लड़ेंगी। सो, ऐसा लग रहा है कि थेरेसा मे ने हाल के दिनों में हुए सर्वेक्षणों को गंभीरता से लिया है और अपनी व पार्टी की लोकप्रियता को देखते हुए समय से पहले चुनाव का फैसला किया। इन सर्वेक्षणों के मुताबिक वे लेबर लीडर कोर्बिन से करीब 20 फीसदी अंतर से आगे हैं और उनकी पार्टी भी इतने ही मतों के अंतर से आगे है। लेकिन ये सारे सर्वेक्षण ब्रेग्जिट की पृष्ठभूमि में हुए हैं। इसलिए इन्हें बहुत भरोसेमंद नहीं माना जा रहा है। तभी कई जानकार अंदाजा लगा रहे हैं कि समय से पहले हो रहे चुनाव में ऐसा भी हो सकता है कि लिबरल डेमोक्रेट्स का वोट बढ़े और उनकी सीटें भी बढ़ जाएं। उनके पास फिलहाल सिर्फ नौ सीटें हैं। लेकिन 2010 के चुनाव में उन्हें अच्छी सफलता मिली थी और कैमरन की सरकार उनकी मदद से बनी थी। लिबरल डेमोक्रेट्स के नेता टीम फैरॉन कुछ समय से इस बात का अभियान चलाते रहे थे कि ब्रेग्जिट की शर्तें तय करने के लिए जनमत संग्रह होने चाहिए। उन्होंने इस चुनाव का स्वागत किया है और कहा कि यह ब्रिटेन की दिशा बदलने वाला चुनाव साबित होगा। कंजरवेटिव पार्टी के नेता भी मान रहे हैं लिबरल डेमोक्रेट ही कंजरवेटिव पार्टी को बहुमत या उससे ज्यादा सीटें हासिल करने से रोक सकते हैं। इस लिहाज से अगले डेढ़ महीने का प्रचार बहुत महत्व वाला होगा। अगर यह चुनाव मे की सोची हुई लाइन पर नहीं हुआ तो ब्रिटेन की पूरी राजनीति बदल जाएगी। ब्रेग्जिट के समय हुए जनमत संग्रह पर ब्रिटेन के लाखों लोगों को अफसोस है। वे उसे बदलना चाहते हैं। उनको इससे मौका मिल जाएगा। वे ब्रेग्जिट की शर्तों को नरम बनाने की हामी रही पार्टियों लिबरल डेमोक्रेट और लेबर पार्टी का समर्थन कर सकते हैं। इस चुनाव से स्कॉटिश नेशनल पार्टी को भी एक मौका मिल सकता है कि वे अलग होने के अपने एजेंडे को आगे बढ़ाएं। तभी माना जा रहा है कि यह एक बड़ा जोखिम है। दूसरी ओर मतदाताओं में एक किस्म की थकान भी है क्योंकि वे लगातार वोट कर रहे हैं। 2014 में स्कॉटलैंड की आजादी को लेकर जनमत संग्रह हुआ था फिर 2015 में आम चुनाव हुए और 2016 में ब्रेग्जिट पर जनमत संग्रह हुआ था और मई में स्थानीय निकायों के चुनाव हैं। ऐसे में आठ जून को होने वाले चुनाव पर इसका भी असर हो सकता है।
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