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भाजपा के लिए चुनौतियों का साल

अजित द्विवेदी
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जिस तरह जीवन में परिवर्तन अवश्यंभावी होता है वैसे ही राजनीति में भी परिवर्तन का चक्र नहीं रूकता है। इसके एकाध अपवाद होते हैं पर वे अपवाद ही होते हैं, नियम नहीं होते। नया साल भी परिवर्तन के इस नियम का अपवाद नहीं होने वाला है। नए साल में लोकसभा का चुनाव होने वाला है और उसके साथ ही कम से कम पांच राज्यों का विधानसभा चुनाव होगा। नया साल खत्म होते होते तीन और राज्यों में विधानसभा के चुनाव होने हैं। यानी लोकसभा और आठ राज्यों के विधानसभा चुनाव नए साल में होंगे। 

नया साल भारतीय राजनीति में हुए एक बड़े परिवर्तन के पांच साल पूरे होने का साल भी है। पांच साल पहले नरेंद्र मोदी भारतीय राजनीति, समाज व्यवस्था, आर्थिकी और प्रशासन की दशकों से चली आ रही कांग्रेसी व्यवस्था को बदलने के वादे का साथ सत्ता में आए थे। तब ऐसा लगा था कि कुछ भी हो मोदी यथास्थिति तोड़ेंगे। वे अपने साथ एक नई व्यवस्था का प्रारूप लेकर ताजा हवा के झोंके के साथ दिल्ली आए थे। देश के लोगों ने उनसे बड़ी उम्मीदें बांधी थीं। उम्मीद पर ही देश के लोगों ने केंद्र की सत्ता उनके हाथ में सौंपी थी और एक एक करके ज्यादातर राज्यों की सत्ता भी उनको सौंप दी थी। 

ध्यान रहे राज्यों के प्रचार में भी भाजपा का चेहरा नरेंद्र मोदी ही थे। उनके प्रधानमंत्री बनने से पहले जरूर कुछ राज्यों में भाजपा के दूसरे नेताओं का चेहरा था पर उनके प्रधानमंत्री बनने के बाद जितने राज्यों में चुनाव हुए वहां भाजपा उनके चेहरे पर लड़ी। चुनाव जीतने के बाद उन्होंने खुद अपनी पसंद के नेता को चुन कर मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठाया। पिछले चार साल आठ महीने में पूरी पार्टी एक व्यक्ति में एकाकार हो गई। देश के लोगों ने भी मोदी ही भाजपा हैं और भाजपा ही मोदी है के नैरेटिव को स्वीकार कर लिया। यह सब इस उम्मीद में हुआ था कि मोदी व्यवस्था बदलेंगे, यथास्थिति तोड़ेंगे, आम लोगों का जीवन आसान और बेहतर होगा, देश में एक वैकल्पिक और दशकों से पोषित विचारधारा लागू होगी। लोगों ने चार दशक पुरानी भाजपा से ज्यादा उम्मीद नरेंद्र मोदी से पाली थी। 

पांच साल पहले लोग परिवर्तन चाहते थे और उन्होंने केंद्र से लेकर लगभग सभी राज्यों में बदलाव कर दिया। मोदी के कमान संभालने के बाद की राजनीति में ओड़िशा, गुजरात, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और तेलंगाना अपवाद रहे, जहां सत्तारूढ़ पार्टी की फिर से सत्ता में वापसी हुई। गोवा और कर्नाटक भी इसमें शामिल हैं पर इन दोनों राज्यों में सत्तारूढ़ पार्टियों ने चुनाव हारने के बाद तिकड़म से सत्ता हासिल की है। बाकी सभी राज्यों में लोगों ने सत्ता बदल दी। सबसे ताजा मिसाल मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मिजोरम का है। इन चारों राज्यों में लोगों ने सत्ता बदल दी। इनमें से तीन में भाजपा की सरकार थी और एक मिजोरम में कांग्रेस की। 

तभी पांच साल के बाद नरेंद्र मोदी की कमान में भारतीय जनता पार्टी अपनी सबसे बड़ी चुनौती का सामना कर रही है। उनको केंद्र की अपनी सरकार के पांच साल के कामकाज का हिसाब देना है और साथ ही राज्यों की अपनी सरकारों के कामकाज का भी हिसाब देना है। आखिर राज्यों में भी लोगों ने वोट उनको ही दिया है। उन्होंने पहले तो प्रचार के दौरान कहा कि लोग डबल इंजन की सरकार बनवाएं यानी केंद्र और राज्य दोनों जगह भाजपा की सरकार बनवाएं तो दोहरी रफ्तार से विकास होगा। फिर चुनाव जीतने के बाद हर राज्य में जाकर उन्होंने कहा कि वे लोगों का कर्ज चुकाएंगे। सो, अब उसका हिसाब करने का समय आ गया है। 

नए साल में मोदी को उन सारे वादों का हिसाब देना है, जो उन्होंने भाजपा के प्रधानमंत्री पद के दावेदार के तौर पर किए थे और प्रधानमंत्री बनने के बाद भाजपा के प्रचारक के तौर पर किए थे। कहने को भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह बताते हैं कि नरेंद्र मोदी की सरकार ने 143 योजनाएं शुरू की हैं। प्रधानमंत्री खुद भी जन धन योजना से लेकर स्वच्छ भारत अभियान तक का ढिंढोरा पीट रहे हैं। शौचालयों की संख्या, जन धन खातों की संख्या, सड़कों की लंबाई, गरीबों के लिए बनने वाले आवास की संख्या, रसोई गैर कनेक्शन की संख्या, बिजली उत्पादन की मात्रा आदि बताए जा रहे हैं। पर यह संख्या, ये आंकड़े लोगों की उम्मीदों पर खरा नहीं उतरने वाले हैं। 

इसका कारण यह है कि मोदी ने लोगों से अच्छे दिन का वादा किया था। उनकी मेक इन इंडिया, स्टैंड अप इंडिया, स्टार्ट अप इंडिया, डिजिटल इंडिया आदि से लोगों से अच्छे दिन नहीं आए हैं। तमाम दावों के बावजूद आर्थिकी का भट्ठा बैठा हुआ है। रोजगार के मोर्चे पर सरकार बुरी तरह से विफल रही है। कारोबार ठप्प हैं और देश भर में किसानों की आत्महत्याओं का सिलसिला रूका नहीं है। कारोबार सुगमता की रैंकिंग सुधरने के बावजूद विदेश निवेश नाममात्र को आया। ऊपर से सामाजिक बिखराव ऐसा हुआ, जैसा इससे पहले कभी नहीं हुआ। पूरा समाज जाति और धर्म में बंट गया। न राजनीतिक व्यवस्था बदली और न प्रशासन के कामकाज का तरीका बदला। 

तभी आज देश एक सामूहिक अवसाद, कुंठा और निराशा का शिकार हुआ है। पांच साल पहले लोगों में गुस्सा था, नाराजगी थी और आक्रोश का सार्वजनिक प्रदर्शन था। इस बार आक्रोश का प्रदर्शन सार्वजनिक नहीं है पर उसकी एक व्यापक अंतर्धारा है, जिसने मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में सत्ता बदल दी। क्रोध के सार्वजनिक प्रदर्शन से निपटने के उपाय होते हैं पर लोगों के मन में बैठी निराशा, कुंठा और अवसाद को मिटाना बहुत मुश्किल होता है। मोदी के लिए भी मुश्किल होगा।

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