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भाजपा का ‘खैवनहार कौन’ कैलाश, प्रहलाद... या कोई और!

राकेश अग्निहोत्री शिवराज सिंह चौहान के बतौर मुख्यमंत्री 13 साल के मुरीद मोदी-शाह ही नहीं पूरी भाजपा रही है लेकिन सत्ता में नहीं लौटने के बाद पार्टी में जो समीकरण बन रहे वह गौर करने लायक हैं.. सरकार जाने के बाद पहली बार दिल्ली से लौटे शिवराज ने नेता प्रतिपक्ष की दौड़ से खुद को जब बाहर कर लिया.. तभी से उनकी नई भूमिका के कयास लगाए जाने लगे थे.. आखिर वह समय आया जब मध्यप्रदेश में विधानसभा का सत्र समाप्त हुआ और दिल्ली में राष्ट्रीय परिषद की बैठक होने जा रही तब शिवराज को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया गया है..

मध्यप्रदेश विधानसभा में अध्यक्ष से लेकर उपाध्यक्ष के चुनाव के दौरान जो कुछ हुआ वह किसी से छुपा नहीं है, चाहे फिर इसे समन्वय का अभाव माना जाए या भाजपा में एक अजीबोगरीब ठहराव, जो उसे बिखराव की कगार पर भी पहुंच सकता है.. विधायकों की खरीद-फरोख्त का दांव उसे उल्टा पड़ सकता है.. कमलनाथ ने चेतावनी दी है कि अभी और खुलासे किए जाएंगे.. खैर बात भाजपा की तो शिवराज मुख्यमंत्री से पहले भाजपा के सांसद और राष्ट्रीय महासचिव रह चुके हैं..

अब उनकी वरिष्ठता का सम्मान करते हुए राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया गया जबकि भाजपा संगठन में महासचिव का अपना महत्व है.. सवाल यह भी वसुंधरा और रमन सिंह के मुकाबले विधानसभा चुनाव में शिवराज के परफॉरमेंस को बेहतर आंका गया था लेकिन एक साथ तीनो को अमित शाह ने खड़ा कर दिया... नरेंद्र मोदी अपने इंटरव्यू में पहले ही  3 राज्यों की हार का एक कारण एंटी इनकंबेंसी बता चुके..

लोकसभा चुनाव को देखते हुए अमित शाह को ताकत देने में इन तीन राष्ट्रीय उपाध्यक्षों से नई उम्मीद  बढ़ना लाजमी  लेकिन यहीं पर सवाल खड़े होते हैं कि क्या शिवराज को मध्य प्रदेश की रोजमर्रा की राजनीति दूर रखा जाएगा या फिर प्रभात झा की तरह मध्य प्रदेश आना जाना लगा रहेगा.. जो सिर्फ पूर्व मुख्यमंत्री नहीं पूर्व प्रदेश अध्यक्ष भी हैं तो सवाल क्या शिवराज सिंह चौहान विधायक रहते लोकसभा का चुनाव लड़ेंगे.. क्या और भी दूसरे विधायक लोकसभा चुनाव लड़ाई जाएंगे ..

शिवराज  की पहले ही नेता प्रतिपक्ष की अहम जिम्मेदारी से उनकी दूरी बनी.. रमन सिंह और वसुंधरा राजे के साथ उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी गई तो निश्चित तौर पर एक क्राइटेरिया बनाया गया है.. ऐसे में फिर सवाल क्या शिवराज सिंह चौहान को  अमित शाह के उत्तराधिकारी के तौर पर राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाने की ओर भाजपा और संघ ने कदम आगे बढ़ा दिए, ..

भाजपा संविधान के तहत  अमित शाह अपनी पारी खेल चुके हैं  और राज्यसभा में भी पहुंच चुके हैं लोकसभा चुनाव के बाद  उनके उत्तराधिकारी की भी तलाश शुरू होगी .. या फिर  यह भाजपा का अंदरूनी मामला है  और शिवराज के बढ़ते सियासी कद को जो डेंट मध्य प्रदेश में चुनाव हारने के साथ लगा  यह मौका मिल गया है  उनके प्रतिस्पर्धीओं को निपटाने में.. क्या इस फेरबदल को नेता प्रतिपक्ष के बड़े दावेदार नरोत्तम मिश्रा के मैदान से बाहर होने और अध्यक्ष के चक्कर में उपाध्यक्ष विधानसभा की कुर्सी गंवाने से जोड़ कर देखा जाएगा..

शायद यह सोची-समझी स्क्रिप्ट है और अमित शाह को सही समय का इंतजार था जो सामने आ गई.. यह भी सच है कि प्रदेश भाजपा में बदलाव की शुरुआत एक ब्राह्मण गोपाल भार्गव को नेता प्रतिपक्ष बनाकर पहले ही हो चुकी है.. सवाल राष्ट्रीय महासचिव और विधायक रहते कैलाश विजयवर्गीय पिछले कार्यकाल में जिस तरह विधानसभा से दूरी बनाकर आगे बढ़े क्या शिवराज भी उसी लाइन को आगे बढ़ाने को मजबूर होंगे..

तो फिर शिवराज और गोपाल भार्गव की भूमिका नए सिरे से होने के बाद सवाल यह भी खड़ा होता है कि सदन में उपनेता तो प्रदेश भाजपा का नया अध्यक्ष कौन होगा.. तो क्या संगठन महामंत्री सुहास भगत भी बदले जाएंगे.. भाजपा ने अनुसूचितजन जाति के विजय शाह और अनुसूचितजाति के जगदीश देवड़ा की जिस तरह सियासी बलि चढ़ाई वह किसी से छुपी नहीं और अब पिछड़े वर्ग के शिवराज को मध्य प्रदेश से दूर रख कर इस बड़े वर्ग पर भाजपा अपनी पकड़ कैसे बना पाएगी..

क्या अमित शाह की पसंद नरोत्तम मिश्रा जब नेता प्रतिपक्ष नहीं बन पाए तो क्या अब दूसरे भरोसेमंद राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय मध्य प्रदेश भाजपा की कमान संभाल सकते हैं, जो पश्चिम बंगाल के चुनाव प्रभारी हैं, जहां चुनाव लोकसभा के बाद होना है.. वो खुद लोकसभा चुनाव लड़ने की संभावनाओं पर अपनी ओर से  विराम लगाते रहे हैं तो 5 दिन में कांग्रेस सरकार गिराने का भी दावा कर रहे..

कैलाश की गिनती भाजपा में एक आक्रमक और संघ के एजेडे को आगे बढ़ाने वाले तेजतर्रार नेता के तौर पर होती रही है.. अमित शाह को पश्चिम बंगाल में कैलाश की ज्यादा जरूरत रहेगी तब मध्यप्रदेश में सक्रिय वापसी का फैसला भी शाह को ही लेना होगा.. जिनके विधायक पुत्र आकाश विजयवर्गीय पहले ही सदन में पहुंच चुके.. तो सवाल क्या राकेश सिंह को हर हाल में जाना होगा या फिर वह अमित शाह की पसंद के तौर पर लोकसभा चुनाव तक बने रहेंगे..

जब भी राकेश जाएंगे तो क्या महाकौशल से ही जुड़े पिछड़े वर्ग के प्रहलाद पटेल भाजपा संगठन के प्रमुख बन सकते हैं, जो दमोह से सांसद रहते मणिपुर में भाजपा की सरकार बनाने में बड़ी भूमिका निभा चुके हैं.. सवाल जब मध्य प्रदेश का फैसला हो तो केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, जो पहले ही प्रदेश अध्यक्ष बनने से इनकार कर चुके हैं तो नेता प्रतिपक्ष चुने जाने के समय खुद को दिल्ली तक सीमित रखे रहे लेकिन ग्वालियर-चंबल की राजनीति से उनके तार जुड़े रहे तो देखना दिलचस्प होगा कि शिवराज के ना चाहते हुए मध्य प्रदेश से दूर जाने के साथ आखिर वह कौन सा नेता होगा जो कंफ्यूज बीजेपी को मध्यप्रदेश में एक नई दिशा दे सके और उससे भी बड़ी चुनौती जो सबको साथ लेकर चल सके..

क्योंकि शिवराज से लेकर मोदी सरकार के रहते मध्य प्रदेश के कई नेताओं का सियासी कद बढ़ चुका है ..अब 8 बार के विधायक गोपाल भार्गव नेता प्रतिपक्ष  तो सत्ता और संगठन में कई जिम्मेदारी निभा चुके नरेंद्र सिंह मोदी और शाह के दुलारे हैं.. यही नहीं कैलाश विजयवर्गीय का दिल्ली में दखल किसी से छुपा नहीं है..

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