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भाजपा और संघः इकलौते, बिगड़ैल बेटे की समस्या

शंकर शरण
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यदि बाप धनी हो तो इकलौते, बिगड़ैल बेटे में अंहकार के साथ-साथ धूर्तता भी आ जाती है कि सामान्य डाँट-फटकार के सिवा बाप कुछ कर नहीं सकता। वह उसे संपत्ति से बेदखल नहीं कर सकता, या घर से निकाल नहीं सकता, आदि। क्योंकि तब वह किसे अपना कहेगा, अपना उत्तराधिकार देगा? आदि। ऐसा बेटा समय के साथ बाप को ब्लैकमेल भी करता है, कि यह वह करे। 

कुछ यही स्थिति राजनीतिक क्षेत्र में आर.एस.एस. (संघ) और भाजपा की भी रही है। विशेषतः जब भाजपा नेता केंद्रीय सत्ता चलाते हैं, तब यह अधिक स्पष्ट दिखता है। राज्य की सरकारों में तो एक बहाना रहता है कि राज्य सरकार बहुत कुछ नहीं कर सकती, क्योंकि केंद्र का दबाव है। किन्तु जब भाजपाई स्वयं केंद्र में रहते हैं तो वे संघ की इच्छाओं को बेधड़क उपेक्षित करते दिखते हैं। यह वाजपेई शासन में भी दिखा था, जब तात्कालीन संघ प्रमुख कुप्प. सुदर्शन ने सार्वजनिक रूप से नाराजगी दिखाई थी। बाद में भी, अप्रैल 2005 में, सुदर्शन जी ने दुहराया था कि वाजपेई ने अच्छा काम नहीं किया। 

हाल में भी, संघ प्रमुख ने सरकारी सेवाओं आदि में जातिगत आरक्षण की समीक्षा करने का सार्वजनिक सुझाव दिया था। पर नेताओं ने समीक्षा तो दूर, उलटे सुप्रीम कोर्ट के आए उस निर्णय को भी फौरन पलट दिया, जिस में अनुसूचित जाति-जनजाति संबंधित (अत्याचार निरोधक) कानून को मामूली तौर पर सुधारा गया था। यही प्रवृत्ति और भी मामलों में देखी गई। न केवल संघ की चिन्ताओं की उपेक्षा की गई, बल्कि मनमाने तौर पर ऐसे नारे व कार्यक्रम बनाए गए जो संघ की कल्पनाओं से दूर-दूर तक मेल नहीं खाते। बल्कि, अंततः संघ प्रमुख को कहना पड़ा कि ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ के लक्ष्य से वे सहमत नहीं है।

प्रश्न हैः- तब भाजपा नेताओं ने वैसा अनर्गल नारा क्यों गढ़ा? उस नारे से देश या समाज का क्या भला हुआ? संघ के बल-बूते सत्ता में आने के बाद भी भाजपा नेता ऐसा क्यों करते हैं? इस प्रश्न का एक नाजुक पहलू भी हैः आखिर वर्षों तक संघ का ही शिक्षण-प्रशिक्षण पाकर तैयार हुए संघ कार्यकर्ता भाजपा में जाकर ऐसे मनमाने, अहंकारी, सत्ता-लिप्सु और बिगडैल क्यों हो जाते हैं? क्या संघ के शिक्षण-प्रशिक्षण में भी कोई कमी है, क्या उस के विचार अव्यवहारिक हैं, क्या केवल पार्टी-साहित्य का पोषण उन्हें मानसिक दुर्बल बनाता है? या कि यह सब मात्र उन व्यक्तियो की निजी दुर्बलता है जो वे सत्ता में जाकर करणीय के बदले कुछ और करने लगते हैं? लेकिन, तब नेतृत्व के लिए उन का चयन करते समय यह क्यों नहीं देखा जाता? भूल कहाँ होती है?

इन सभी प्रश्नों पर संघ नेतृत्व को गंभीरतापूर्वक विचार करना चाहिए। क्योंकि दो बार के अनुभव के बाद अब जनता में कांग्रेस, जनता, सपा, आदि की सेक्यूलरवादी नीतियों की निंदा करके केवल भाजपा के लिए समर्थन माँगना आसान नहीं होगा। क्योंकि भाजपा सत्ताधीशों ने साफ दिखाया है कि उन की नीतियाँ या इरादे अन्य पार्टियों से कतई भिन्न नहीं रहे हैं। वे निष्ठापूर्वक उन्हीं सेक्यूलर, भौतकवादी, भोगवादी, वामपंथी और लोक-लुभावन नीतियों, कार्यक्रमों, अनुष्ठानों पर चलते हैं, जो कांग्रेस ने बनाई हैं। वे नीतियाँ सामाजिक, शैक्षिक और राजनीतिक दृष्टि से सचेत रूप से हिन्दू-विरोधी रही हैं। 

इसलिए यह स्वयं देखने-परखने की बात है कि दस वर्ष की भाजपा सत्ता ने ऐसा कौन सा काम किया, जो कांग्रेस या जनता दल नहीं कर सकता?  वस्तुतः स्वयं भाजपा नेताओं के बयान केवल अपनी तुलनात्मक रूप से भ्रष्टाचार-मुक्त स्थिति का ही दावा करते हैं। यानी, प्रकारांतर मानते हैं कि वे बनी-बनाई कांग्रेसी-वामपंथी नीतियों का ही पालन, केवल अधिक ‘ईमानदारी’ से कर रहे हैं। बल्कि, अपना प्रचार करने, पोस्टरों, विज्ञापनों, नामकरणों, आदि पर अरबों रूपये और समय व्यर्थ नष्ट करने में भी वे कांग्रेस का ही अनुकरण करते रहे हैं। 

क्या इसी के लिए संघ ने अपनी अलग राजनीतिक पार्टी बनाई थी? सच तो यह है कि यदि उस ने अपनी अलग पार्टी न बनाकर सभी पार्टियों को अपना समझा होता (जो हिन्दू दृष्टि से निश्चय ही अधिक सही होता), तो समय के साथ संघ का अपना स्वतंत्र वोट-बैंक होता। जिस के दबाव या आकर्षण में कई पार्टियाँ न्यायोचित हिन्दू चिन्ताओं को उठाकर उन का समाधान करने, कराने की ओर प्रेरित होतीं। ताकि संघ उन्हें चुनावों में समर्थन दे। ऐसी रणनीति रखते हुए संघ ने बहुत कम लागत में काफी अधिक परिणाम पाया होता। हिन्दू समाज के लिए भी, और अपने लिए भी।

उस के विपरीत ‘अपनी’ इकलौती पार्टी बनाकर संघ उसी मोह का बंदी हो गया लगता है, जो इकलौते बेटे के धनी बाप की होती है। झक मार कर वे उन्हीं भाजपा नेताओं को जिताने में सारी शक्ति लगाते हैं जो सत्ता में जाकर तरह-तरह के नाटक, जिद और मूढ़ता दिखाने लगते हैं। सत्ताधारियों को बखूबी मालूम रहता है कि संघ के पास विकल्प नहीं। फिर, सत्ता में आकर वे संघ नेतृत्व को भी कठिनाई, नियम-कानून, नौकरशाही, आदि के सौ बहाने देकर संतुष्ट करते रहते हैं। 

लेकिन हिन्दू हितों की बलि या उपेक्षा का दोष केवल भाजपा नेताओं की वैयक्तिक अक्षमता को कब तक दिया जा सकता है? आज के व्यापक मीडिया युग में यह सभव नहीं। भाजपा के अनेक बड़े नेताओं की शुद्ध संघ-पृष्ठभूमि रही है। उन के क्रिया-कलापों को सदैव संघ से अलग करके देखना-दिखाना अब संभव नहीं होगा। अतः सत्ताधारी नेताओं का मान-अहंकार, अकर्मण्यता, निरर्थक बयानबाजियाँ, आदि की कैफियत लोग आज नहीं तो कल संघ से भी लेंगे।  

अतः संघ के लिए प्रत्यक्ष चुनौती है कि अनगढ़ के बदले सुयोग्य नेता, प्रशासक कैसे  ढूँढें?  राष्ट्र-हित में क्षुद्र महत्वाकांक्षाओं को नीचे रखने वालों की नियुक्ति व उन्नति की विधि कैसे बनाएं? सब से बढ़कर, क्या दूसरी पार्टियों में हिन्दू-हितैषी, योग्य नेता नहीं हैं? यदि हैं, तो इकलौते बेटे वाले विवश सिंड्रोम से मुक्त होकर, क्या संघ को पूरे देश और खुले बाजार में हिन्दू व राष्ट्रीय हितों की पूर्ति करने वालों की खोज नहीं करनी चाहिए? 

आखिर, लक्ष्य ही प्रमुख है। साधन नहीं। बशर्ते साधन नैतिक हो। तब यदि संघ या भाजपा से बाहर का व्यक्ति भी स्वामी विवेकानन्द के सपनों का भारत बनाने की रणनीति और कार्यनीति बना सके, उस के लिए अपनी योग्यता व निष्ठा दिखा सके, तो उसे क्यों नहीं समर्थन, संसाधन या सहयोग देना चाहिए?

पिछले अनेक वर्षों में भाजपा नेताओं के बयान गंभीर चर्चा से शू्न्य हैं। न केवल हिन्दू हित, बल्कि अपराध-नियंत्रण जैसे बुनियादी कर्तव्य पर भी उन का शायद ही कोई कार्य सामने आया। इस में अयोग्यता के सिवा इकलौते बेटे वाली निश्चिंतता भी है कि बाप का कहा न भी माना, तो बाप बेचारा करेगा क्या! 

यह हिन्दू राजनीति के दुर्बल होने का संकेत है। जो किसी वांछित पार्टी के चुनाव जीत लेने से भी नहीं छिप सकती। हिन्दुओं के शत्रु अत्यधिक अनुभवी, संयमित और व्यवस्थित हैं। वे समय का इंतजार करते शक्ति बचाते हैं, और मौका मिलते ही डट कर वार करते एवं अपने उद्देश्य बढ़ाते हैं। जबकि भाजपाई छैले आत्ममुग्ध, इतराते, रुटीन राज चलाते बहुमूल्य समय नष्ट करते रहते हैं। अब सचेत हिन्दुओं को शत्रुओं का डर दिखा ब्लैकमेल करना दोहरी अयोग्यता का संकेत है। यह अपने राज की कैसे उपलब्धि हुई जिस में अपने ही लोगों को धमकाने की जरूरत पड़े? समर्थकों को विवेकहीन कहना सुनीति नहीं है। स्वयं को सुधारें, दूसरों को सुधरने का निर्देश न दें। यह नेता और वोटर, दोनों पक्ष के लिए सही है। 

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