गोविन्दाचार्यः ‘कुछ और करने की ललक मन में जिन्दा है’

शंकर शरण
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मीडिया में गोविन्दाचार्य का एक अलग आकर्षण है। वे भाजपा के काम से पिछले सोलह साल से ‘छुट्टी’ पर चल रहे हैं। फिर भी उन की बातें, और मुहावरे नियमित रूप से खबर बनते रहे हैं। चाहे अपनी सिफत के कारण मीडिया कभी-कभी उन की बातें ऐसे प्रस्तुत करता है, जो संभवतः उन का आशय न था। पर समाचार की सुर्खी बनाने, या चुटकी लेने के लिए हेडलाइन में प्रायः एक खास रंग डाला या डल जाता है। 

अब उन के ताजे वक्तव्य को ही लें। गत 3 मार्च को वाराणसी गर्ल्स डिग्री कॉलेज में उन के सुंदर व्याख्यान की सुर्खी यह बनीः ‘देशभक्ति और ईमानदारी पर किसी का एकाधिकार नहीं’। राजनीतिक लोगों ने इस का यही अर्थ किया कि यह भाजपा के ही उन नेताओं पर कटाक्ष है जो आज स्वयं को देशभक्ति का एकाधिकारी झंडाबरदार मानते हैं। तदनुरूप उन के भक्त सारे मतभेदी स्वरों को थोक भाव देशद्रोही या मूर्ख बताते हैं। यद्यपि उक्त बात गोविन्दाचार्य ने 1974 ई. के जे.पी. आंदोलन और तत्काल बाद के कई अनुभवों को स्मरण करते हुए कही थी। तब वे बिहार में आर.एस.एस. प्रचारक के रूप में विविध दलों, विचारों के आंदोलनकारियों के साथ सक्रिय थे। लेकिन उन की बात का तार, और उस की धार, आज के हालात पर दूसरे तरह से लगती है।

और, वह भी विचारणीय है। इस हद तक कि स्वयं गोविन्दाचार्य जैसे विचारक-नेता को उस पर सोचना चाहिए। आज वे आयु, अनुभव और समझ की दृष्टि से संघ-परिवार के वरिष्ठतम इने-गिने लोगों में हैं। अतः, यदि देशभक्ति, साहस, बुद्धि जैसे गुणों पर किसी का एकाधिकार नहीं, तो इस का फलितार्थ क्या है? तब मतांध पार्टीबंदी, पार्टी-प्रचार और दुष्प्रचार पर देश के संसाधन एवं बुद्धि बेतहाशा बर्बाद करने की तुक क्या है? फिर, दशकों तक जिन नीतियों, व्यवहारों की निंदा कर दूसरे दल अपनी जमीन बनाते हैं, सत्ता पाकर उन्हीं नीतियों, व्यवहारों को मनमानी दलीलें देकर या बिना किसी कैफियत ठसक से चलाते हैं – इस सूरतेहाल ‘विचारधारा’ के नाम पर अलग पार्टी की जरूरत ही क्या है? तीसरे, अहमन्यता और व्यक्तिपूजा का विरोध, तथा चाल-चरित्र-चेहरे का दावा करते हुए सत्ता में बिलकुल दूसरा ही रंग दिखने का कारण क्या है? या तो संगठन के सिद्धांत ही गलत थे, अथवा जल्द ही वह सब केवल दिखावे की वस्तु बन कर रहे गए। अन्यथा व्यवहार में इतना विराट् विचलन, और उस पर बाकियों की ऐसी मर्मभेदी चुप्पी असंभव होती।

अंततः सब से महत्वपूर्ण प्रश्न, कि तमाम दलीय गतिविधियों के औचित्य की कसौटी क्या है? अपनी श्रेष्ठता का ढोल खुद बजाना तो कोई प्रमाण नहीं हो सकता। बल्कि, हिन्दू दृष्टि से तो उलटे यह हीनता का संकेत है। फिर, यदि चुनाव जीत लेना ही स्वयंसिद्ध प्रमाण हो जिस से सारे प्रश्न स्वयं समाधित मान लिए जाएं, तब यही कसौटी दूसरे दलों के लिए भी होगी। तब किसी भी जीतने वाले दल की निंदा नहीं करनी चाहिए। पचासों साल जीतते रहने वाले दल की तो किसी हाल में नहीं! वरना यह परले दर्जे की विचारहीनता साबित होगी। 

जीवन के हर क्षेत्र में काम करने और उस का मूल्याकंन करने वाले अलग-अलग होते हैं। तभी वह सार्थक है। परन्तु यहाँ सत्ताधारियों द्वारा राजकोश का बेतहाशा दुरुपयोग कर आत्म-प्रचार और पार्टी-प्रचार करना एक भयावह छुतहे रोग में बदल चुका है। यह सारे सामाजिक विमर्श पर जबरन कब्जा कर, शिक्षा समेत सभी क्षेत्रों का राजनीतिकरण कर डालता है। ऐसा दुनिया के किसी लोकतंत्र में नहीं है। ऐसी रुग्णता का उपचार दलबंदी से हो नहीं सकता।  

पहले यह देखना होगा कि ऐसा व्यापक राजनीतिकरण हमारी सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक रचनात्मकता का गला घोंटने में लगा हुआ है। दलबंदी इसे नहीं रोक सकती, क्योंकि इस ने स्वयं इस रोग को पैदा किया और बढ़ाया है। विशेषतः उन पार्टियों ने जो अपने को ‘विचारधारा’ आधारित कहते रहे हैं। उन की विचारधारा अपने कार्यकर्ताओं, समर्थकों को मुख्यतः नशा पिलाने, लफ्फाजी सिखाने, अंधविश्वासी बनाने, और किसी भी तरह पार्टी का वफादार बनाए रखने के सिवा कुछ नहीं करती रही है। अपनी पार्टी, अपने नेता को बेहतर बताने के लिए दूसरों पर कोलतार पोतते रहना उन का प्रधान कर्तव्य बन जाता है। 

इस प्रक्रिया में आरंभ के आदर्शवान युवा भी अनंतर बर्बाद, व्यर्थ, बकवादी होकर रह जाते हैं। यह कम्युनिस्ट पार्टियों ने ही नहीं, जनसंघ-भाजपा ने भी भरपूर किया है। यह दुःखद तथ्य पूरे इतिहास में सरलता से देख सकते हैं। हर चीज का राजनीतिकरण अपने कार्यकर्ताओं समेत समाज की रचनात्मकता को अनिवार्यतः कुंठित करता है। गोविन्दाचार्य जैसे विवेकवान नेता इन बातों को परख सकते हैं। शायद इसीलिए वे कह सकते हैं कि देशभक्ति और बुद्धिमत्ता किसी पार्टी की बपौती नहीं है।

परन्तु इस बिन्दु से आगे बढ़ कर विचार करना चाहिएः कि आज लोकतंत्र में राजनीतिक दलों का मुख्य काम या उपयोगिता क्या है? निस्संदेह, उत्तर होगा – चुनाव लड़ना और सत्ता सँभालना। लेकिन यह तो पाँच वर्ष में एक बार होता है! बाकी समय, उन का खड़े रहना, और सक्रियता निरर्थक है। पर उन्हें जबरन सक्रिय बनाए रखने हेतु विविध प्रपंच, पाखंड किए जाते हैं। नकली, झूठे काम, दिखावटी या हानिकारक नारे, आंदोलन आदि गढ़े जाते हैं। ताकि दल सक्रिय रहे, जबकि चुनाव लड़ने के सिवा मूलतः उस का कोई काम नहीं। इसीलिए ऊपर से नीचे तक किसी बहाने सरकारी निकायों, आयोगों, समितियों, संस्थानों, आदि की संख्या निरंतर बढ़ाई जाती है। ताकि पार्टीवालों को फिट कर कर के उन की सत्ता-भूख को कुछ शान्त किया जा सके। क्योंकि सत्ता में घुसने के सिवा किसी दलीय कर्मी का कोई लक्ष्य नहीं हो सकता। जो इस से भिन्न कहते हैं वे मिथ्यावादी या स्वयं भुलावे में हैं। 

इस प्रकार, स्थाई दलीय गतिविधि का प्रपंच यहाँ समाज में चौतरफा राजनीतिकरण, राज्यतंत्र के बेसंभाल विस्तार, राजकीय संस्थानों का बेवजह दुहराव, तिहराव और फलतः उत्तरदायित्वहीनता बढ़ते जाने का मुख्य कारण रहा है। दर्जनों मंत्रियों से लेकर देश भर में हजारों कार्यालयों तक, सभी के कार्यों की समुचित समीक्षा असंभव बन जाती है। जो और जितना काम करता है, वह स्वेच्छया। संसद, विधानसभाओं द्वारा उन की वास्तविक परख नहीं होती, क्योंकि अंतहीन राज्यतंत्र की कार्य रिपोर्टें देखना-जाँचना व्यवहारतः असंभव हो चुका है। फिर, राजनीतिक दलों के व्यापक हस्तक्षेप से संसद और विधानसभाएं भी उन की बंधक हो गई हैं। यह विकृति भी पश्चिमी लोकतंत्रों में नहीं है। 

अतः, अच्छा तो हो कि अब जीवन के 75वें वर्ष पर गोविन्दाचार्य अपने दल की गतिविधि से ‘छुट्टी’ को दलीय राजनीति से ‘त्याग-पत्र’ में बदल कर कोई ठोस सामाजिक, राष्ट्रीय कार्य करने की सोचें। राजनीतिक दलों को मर्यादा में बाँधने, और समाज की स्वायत्त रचनात्मकता को खोलने की दिशा में विचार करें। यह धर्म का कार्य होगा। उन के पास संभवतः वह सब है जिस से हमारे देश को घनघोर पार्टी-बंदी की दलदल से निकालने का काम वे आरंभ कर सकते हैं। बाकी, जैसी गोविन्द की इच्छा!

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