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राम का नाम ही आखिरी सहारा!

अजित द्विवेदी
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कहते हैं कि राम से ज्यादा राम के नाम में शक्ति होती है। राम के नाम से पत्थर भी पानी पर तैरने लगते हैं। शायद तभी भाजपा के नेता राम का काम करने से ज्यादा राम का नाम लेने में रूचि रखते हैं। 32 साल हो गए। राम का नाम लेकर भाजपा की दूसरी पीढ़ी राजनीति के शीर्ष पर पहुंच गई पर राम का काम नहीं हुआ। इस बार ऐसा लग रहा था कि भाजपा ने विकास का बड़ा हल्ला किया है और सीधे शिखर पर बैठे व्यक्ति द्वारा दावा किया जा रहा है कि 65 साल में जो नहीं हुआ वह 48 महीने में कर दिया गया है तो शायद भाजपा राम की बजाय काम पर वोट मांगेगी।  

पर अफसोस की बात है कि इतना काम करने के दावे के बावजूद वोट राम के नाम पर ही मांगने की तैयारी चल रही है। राम का मंदिर बनाएंगे, राज का राज ले आएंगे, राम की मूर्ति बनाएंगे, राम का म्यूजियम बनाएंगे, ये चंद वादे हैं, जो पिछले कुछ समय से सुनाई दे रहे हैं। अयोध्या में पिछले साल सरयू के किनारे दीपोत्सव मनाया गया, जिसमें राम की वन से वापसी की लीला का मंचन हुआ। इस साल शायद सरयू के किनारे भगवान राम की विशाल मूर्ति की घोषणा होने वाली है। म्यूजियम बनाने की घोषणा पहले हो चुकी है। यानी मंदिर के साथ साथ मूर्ति और म्यूजियम भी जुड़ गए हैं। 

सवाल है कि इतना काम करने के दावे के बावजूद राम का नाम लेने की क्या मजबूरी है? क्या काम के दावे में दम नहीं है या इस बात की चिंता है कि विपक्ष के नेता भी रामनामी ओढ़ कर घूम रहे हैं? असल में ईमानदारी और काम के जो दावे पिछले साढ़े चार साल से किए जा रहे हैं उनकी हकीकत दूसरी निकल रही है। ईमानदारी के गुब्बारे में राफेल की पिन चुभ गई है। धीरे धीरे उसकी हवा निकल रही है और वह गुब्बारा नीचे आ रहा है। चुनिंदा और पसंदीदा उद्योगपतियों और कारोबारियों को फायदा पहुंचाने के चक्कर में किस तरह से सार्वजनिक उपक्रमों का और बैंकों का भट्ठा बैठाया जा रहा है उसके भी किस्से लोगों तक पहुंचने लगे हैं। न खाऊंगा, न खाने दूंगा के नारे के बावजूद ढेर सारे लोग खा पीकर और कुछ बांध कर भी देश से बाहर ले गए और चौकीदारी के लिए आई सरकार कुछ नहीं कर पाई। 

बहुत गर्व के साथ बताया जाता है कि सरकार ने एक सौ नई योजनाएं शुरू की हैं। उनके चुनिंदा लाभार्थियों से एप के जरिए संवाद भी किया जाता है। पर इसकी भी असलियत जाहिर हो चुकी है। संवाद के लिए कैमरे पर आने से पहले कथित लाभार्थी को समझाया जाता है कि उसे क्या बोलना है। सरकार की मशीनरी और उसका प्रचार तंत्र यह काम करता है। सरकारी मशीनरी और प्रचार तंत्र के बल पर काम का ढिंढोरा पीटा जा रहा है। कारोबार सुगमता में भारत की रैंकिंग में कमाल का सुधार हुआ है पर पिछले साढ़े चार साल में एक भी बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनी भारत में कारोबार करने या उद्योग लगाने आई है, इसकी खबर नहीं है। नोएडा में सैमसंग के जिस मोबाइल संयंत्र का उद्घाटन हुआ है उसकी नींव तब पड़ी थी, जब भारत कारोबार सुगमता की रैंकिंग में बहुत नीचे था।

दो करोड़ रोजगार हर साल देने के दावे की हकीकत यह है कि हाल ही में नीति आयोग के उपाध्यक्ष पद से इस्तीफा देने वाले अर्थशास्त्री अरविंद पनगढ़िया ने कहा है कि ‘अगर मैं कहूं कि मैं रोजगार सृजन से संतुष्ट हूं तो यह झूठ होगा’। हालांकि उन्होंने यह भी कहा है कि रोजगार के मोर्चे पर निराश होने की भी वजह नहीं है। इसका कारण यह है कि हुक्मरानों ने बहुत सावधानी से रोजगार को स्वरोजगार में बदल दिया है और पकौड़े तलने से लेकर पान की गुमटी खोलने तक के सुझाव देश की युवा पीढ़ी को दे डाला है। नौकरियों की कमी से लोग स्वरोजगार की ओर आकर्षित हुए हैं, शायद इसी वजह से कारोबार सुगमता में रैंकिंग सुधार रही हो!

महंगाई का मोर्चा भी फतह होते होते रह गया। कहां तो वजीरे आला के नसीब से पेट्रोल, डीजल के दाम घट रहे थे और अब कहां दाम आसमान छू रहे हैं। तभी लग रहा है कि ईमानदारी, विकास, रोजगार, महंगाई आदि का मोर्चा जीत कर वोट मांगने की बजाय राम के नाम पर वोट मांगना ज्यादा मुफीद माना गया है। सो, मर्यादा पुरुषोत्तम राम फिर चुनावी मुद्दा हैं। 

भाजपा के पितृ संगठन आरएसएस ने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट ने हिंदुओं का अपमान किया है। संघ 1992 जैसे आंदोलन की तैयारी में है। संघ से भाजपा में भेजे गए एक महासचिव ने कहा है कि देश के हालात 1992 जैसे बन गए हैं। 1992 जैसे हालात का मतलब है, जब अयोध्या में विवादित ढांचा ढहाया गया था और देश भर में दंगे हुए थे। पर 1992 में तो तीन साल की घनघोर राजनीतिक अस्थिरता, तीन साल में तीन प्रधानमंत्री बनने, आर्थिक अराजकता, सोना गिरवी रखे जाने, मंदिर आंदोलन, मंडल रिपोर्ट आदि के कारण हालात बिगड़े थे। अभी तो पिछले साढ़े चार साल से देश में ‘राम राज’ चल रहा है, फिर हालात 1992 जैसे कैसे हो गए! कहीं ऐसा तो नहीं कि राम के नाम पर हालात 1992 जैसा बनाया जा रहा है?

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