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करप्शन का मुद्दा काठ की हांडी

अजित द्विवेदी
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भारतीय जनता पार्टी को वैसे काठ की हांडी बार बार चढ़ाने की आदत है। तभी पिछले तीस साल से वह अयोध्या के मसले पर राजनीति कर रही है। फिर चुनावों से पहले अयोध्या चर्चा में है। अभी मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे दो अहम प्रदेशों में मतदान होना बाकी है और उससे पहले अयोध्या में लाखों लोगों के जमावड़ा हो गया है। भाजपा ने बहुत होशियारी से अपने को पीछे रखा है और विश्व हिंदू परिषद व शिव सेना को आगे किया है। जली बुझी काठ की हांडी में कुछ पके या न पके पर भाजपा उसे चूल्हे पर चढ़ाती जरूर है। 

तभी नोटबंदी के फैसले का बचाव करते हुए करप्शन के मुद्दे को फिर से प्रधानमंत्री मोदी ने हाईलाइट किया है। उन्होंने कहा कि भ्रष्ट लोगों के पास जमा काले धन को बाहर निकालने के लिए नोटबंदी की कड़वी दवाई देनी पड़ी। नोटबंदी कितनी कड़वी दवाई थी, इसका स्वाद लाखों, करोड़ों लोग बता सकते हैं क्योंकि मजबूरी में उन्हें यह दवा खानी पड़ी, जबकि उनके पास कोई काला धन नहीं था। प्रधानंमत्री के साथ साथ भाजपा अध्यक्ष अमित शाह भी फिर से धरती, पाताल, आकाश के घोटाले की बात उठाने लगे हैं। हालांकि अब वे यह नहीं कहते कि कांग्रेस ने 12 लाख करोड़ रुपए का घोटाला किया था। क्योंकि ऐसा कहने पर इसके खिलाफ पिछले साढ़े चार साल में की गई कार्रवाई का ब्योरा पूछा जाने लगेगा। 

सो, इस बार करप्शन को जरा दूसरे तरीके से मुद्दा बनाने का प्रयास है। राज्यों में प्रादेशिक क्षत्रपों के खिलाफ केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाई चल रही है। आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में विपक्षी नेताओं के खिलाफ सीबीआई, ईडी, आय कर विभाग आदि के खूब छापे पड़े हैं। इसी तरह लालू प्रसाद के खिलाफ चारा घोटाले के मामले को सीबीआई ने अंजाम पर पहुंचा दिया है। तीन मामलों में उनको सजा हो गई है। हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा के खिलाफ नया आरोपपत्र दायर कर दिया गया है। उनके ऊपर एफआईआर भी हो गई है। केंद्रीय एजेंसियों ने पी चिदंबरम को हिरासत में लेकर पूछताछ करने के लिए ऐड़ी चोटी का जोर लगाया है। ऐसा लग रहा है कि कांग्रेस और दूसरी विपक्षी पार्टियों से कुछ चेहरे चुन कर उनको जेल में डालने और उनके सहारे भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाने का प्रयास हो रहा है। नेशनल हेराल्ड मामले को लेकर सोनिया व राहुल गांधी को जमानत पर छूटा बताने का प्रचार हो रहा है।

पर यह कई कारणों से संभव नहीं है। एक कारण तो देश की सबसे प्रीमियर जांच एजेंसी सीबीआई की अपनी साख का पैंदे पर पहुंचा होना है। सीबीआई के विशेष निदेशक ने निदेशक पर रिश्वत लेने का आरोप लगाया है और कैबिनेट सचिव से शिकायत की है। निदेशक ने विशेष निदेशक के खिलाफ रिश्वतखोरी के मामले की एफआईआर दर्ज कराई है। विशेष निदेशक ने अतिरिक्त निदेशक के ऊपर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए हैं। एक डीएसपी को जांच में गड़बड़ी के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। एक डीएसपी, एक एसपी और एक डीआईजी ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा देकर एजेंसी की जांच में गड़बड़ियों के आरोप लगाए हैं। डीआईजी ने तो एक केंद्रीय मंत्री और कैबिनेट सचिव से लेकर राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार, विधि सचिव, सतर्कता आयुक्त आदि सबको भ्रष्टाचार के आरोपों में घसीट लिया है। जब सबसे बड़ी जांच एजेंसी खुद ही जांच के दायरे में है और उसके अपने लोगों ने तमाम गड़बड़ियों की पोलपट्टी खोली है तो उसकी जांच के हवाले कैसे आम लोगों में भरोसा पैदा किया जा सकेगा!

दूसरा कारण लोकपाल की नियुक्ति का है। दिल्ली में अन्ना हजारे के आंदोलन के बाद 2013 में यूपीए की सरकार ने जाते जाते लोकपाल कानून पास कर दिया था। प्रधानमंत्री पद को भी जांच के दायरे में लाने वाले इस कानून के तहत लोकपाल की नियुक्ति होनी थी। पर साढ़े चार साल बाद अभी तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली चयन समिति लोकपाल नहीं नियुक्त कर पाई है। लोकसभा में नेता विपक्ष नहीं होने के मामूली नुक्ते को बहाना बना कर सरकार ने लोकपाल की नियुक्ति टाली है। इसी सरकार ने सीबीआई के निदेशक की नियुक्ति में नेता विपक्ष की जगह विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी के नेता को मान्यता दे दी पर लोकपाल की नियुक्ति वाले मामले में सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के नेता को पूर्ण सदस्य की मान्यता देने की बजाय उसे विशेष आमंत्रित सदस्य बना दिया। इसी मामूली नुक्ते की वजह से लोकपाल की नियुक्ति टलती रही। सुप्रीम कोर्ट के डंडे से अब यह प्रक्रिया थोड़ी आगे बढ़ी है। 

तीसरा कारण ऊपर से सफाई करने के नरेंद्र मोदी के अपने वादे को नहीं पूरा करना है। प्रधानंमत्री पद के दावेदार के तौर पर मोदी ने प्रचार के दौरान कहा था कि उनकी सरकार बनी तो वे ऊपर से सफाई करेंगे। संसद और विधानसभाओं को साफ करेंगे। उन्होंने इसके लिए सांसदों और विधायकों के ऊपर दर्ज भ्रष्टाचार और दूसरे अपराधों से जुड़े मुकदमों की त्वरित सुनवाई कराने का वादा किया था। पर अफसोस की बात है कि साढ़े चार साल बाद बड़ी मुश्किल से एक दर्जन राज्यों में विशेष अदालतें बन पाई हैं और ये अदालतें भी नेताओं के खिलाफ दर्ज ज्यादातर राजनीतिक मामले ही सुन रही हैं। सुप्रीम कोर्ट इस मामले की भी सुनवाई कर रही है और उसी के डंडे से यह काम भी आगे बढ़ा है। फिर भी अदालतों की संख्या बहुत मामूली है। 

चौथा कारण यह है कि अपने आचरण से प्रधानमंत्री मोदी और उनकी पार्टी ने कोई मिसाल कायम नहीं की। भाजपा ने खूब जम कर आरोपी नेताओं को टिकट दिए। चुनाव लड़ने वाले नेताओं के हलफनामे का विश्लेषण करने वाली एजेंसियों का कहना है कि सबसे ज्यादा दागी सांसद और विधायक भाजपा के हैं। पार्टी ने खुद चुनाव जीत सकने वाले नेताओं को ही टिकट देने का पैमाना तय किया। इसलिए वह दूसरी पार्टियों पर सवाल उठाने की स्थिति में नहीं है। 

पांचवां कारण एक के बाद एक ऐसे आरोप हैं, जो विपक्षी पार्टियों की ओर से सरकार के ऊपर लगाए जा रहे हैं। भाजपा को भले लग रहा है कि आरोप लोगों पर असर नहीं डाल रहे हैं पर ऐसा नहीं है। राफेल लड़ाकू विमान सौदे का मामला लोगों तक पहुंचा है। नीरव मोदी, मेहुल चोकसी, विजय माल्या आदि का हजारों करोड़ रुपए लेकर भागना भी असर डालने वाला है। शिवराज सिंह चौहान, वसुंधरा राजे या सुषमा स्वराज पर लगे आरोपों के बारे में भले भाजपा मान रही हो कि ये दब गए हैं पर असल में लोगों के अवचेतन में ये मामले बैठे हैं। इसलिए करप्शन काठ की हांडी है, जिसे कम से कम भाजपा अगले चुनाव तक चूल्हे पर नहीं चढ़ा सकती है।  

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