महिलाओं के लिए सार्थक पहल

तन्मय कुमार -- कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी अपनी चुनावी सभाओं में बार बार कह रहे हैं कि कांग्रेस की सरकार बनी तो महिला आरक्षण बिल को पास कराया जाएगा। पर उनका यह वादा बहुत भरोसा इसलिए नहीं जगाता है कि दस साल के यूपीए राज में उन्होंने इसकी कोई पहल नहीं की। 2004 से 2014 के बीच राहुल गांधी खुद भी सांसद थे और केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी। यह सभी जानते हैं कि सरकार में कोई उनकी मर्जी नहीं टाल सकता था। आखिर उन्होंने दागी सांसदों को राहत देने के लिए लाए गए अध्यादेश की कॉपी फाड़ कर उसे रूकवाया था। सो, अगर वे ईमानदार पहल करते तो महिला आरक्षण बिल पास हो सकता था।

पांच साल से भाजपा भी महिलाओं के सशक्तिकरण की बात कर रही है पर उसकी बातें भी खोखली हैं। अगर और कांग्रेस और भाजपा दोनों ईमानदारी से इसकी पहल करते तो संसद और राज्यों की विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण सुनिश्चित करने वाला बिल पास हो जाता। पर दोनों ने ऐसा नहीं किया। अब दो क्षेत्रीय पार्टियों ने इस दिशा में सार्थक पहल की है। बीजू जनता दल ने महिलाओं को 33 फीसदी टिकट देने का वादा किया है तो तृणमूल कांग्रेस ने लोकसभा की अपनी 40 फीसदी टिकटें महिलाओं को दी हैं। दोनों पार्टियों की इस पहल का स्वागत किया जाना चाहिए और उम्मीद की जानी चाहिए कि कांग्रेस, भाजपा और दूसरी राष्ट्रीय व प्रादेशिक पार्टियां इससे सबक लेंगी।

भारतीय संसद में महिलाओं का प्रतिनिधित्व बहुत कम है। 2018 के बजट से पहले संसद में पेश किए गए आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक लोकसभा में 64 महिला सांसद हैं यानी कुल संख्या का 11.8 फीसदी। इसी तरह राज्यसभा में महिला सांसदों की संख्या 27 है यानी कुल संख्या का 11 फीसदी। पिछले कई चुनावों से इसमें बहुत मामूली बढ़ोतरी होती है। आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक 2010 से 2017 के बीच लोकसभा में महिला सदस्यों की संख्या में एक फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। जबकि महिला आरक्षण बिल में 33 फीसदी सीटें आरक्षित करने का प्रावधान है।

राज्यों की विधानसभाओं में भी स्थिति इससे कुछ अलग नहीं है। ऐसे में अगर नवीन पटनायक और ममता बनर्जी ने महिलाओं को ज्यादा से ज्यादा टिकट देने का कदम उठाया है तो वह बहुत स्वागतयोग्य पहल है। कांग्रेस और भाजपा को भी इस पर अमल करना चाहिए। पहले कई बार यह बात कही जा चुकी है कि कानून बना कर आरक्षण देने की बजाय अगर पार्टियां खुद ही पहल करके महिलाओं को टिकट देंगे तो स्वाभाविक रूप से राजनीति में उनकी भागीदारी बढ़ेगी। आरक्षण की बजाय पार्टियों की पहल से टिकट देना ज्यादा बेहतर तरीका है।

देश के कई राज्यों में स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए आरक्षण का प्रावधान किया गया है। स्थानीय राजनीति में इसका असर दिखने लगा है। इस समय देश की पंचायती राज व्यवस्था के तहत करीब 14 लाख महिला प्रतिनिधि हैं, जो चुनी गई हैं और पंचायत स्तर पर काम कर रही हैं। स्थानीय निकायों के चुने हुए प्रतिनिधियों में महिला प्रतिनिधियों की संख्या 44 फीसदी के करीब है। स्थानीय निकायों में महिलाओं को आरक्षण देने के बाद शुरू में तो आमतौर पर इलाके के दबंग नेताओं और पूर्व मुखिया या उनके परिवार की महिलाएं ही राजनीति में आईं। पर धीरे धीरे इसमें बदलाव आ गया है और पढ़ी, लिखी और स्वतंत्र सोच की महिलाएं इसे अपना कैरियर बनाने लगी हैं।

अगर पार्टियां पहल करें तो यह बदलाव विधानसभा और संसद के स्तर पर भी आ सकता है। हो सकता है कि लालू प्रसाद, मुलायम सिंह यादव या शरद यादव की यह चिंता सही हो कि आरक्षण देने से उच्च वर्ग की महिलाएं ही विधायिका में पहुंचेंगी पर यह थोड़े समय की परिघटना होगी। महिलाओं के विधायिका में नहीं होने से बेहतर होगा कि किसी भी वर्ग की महिलाएं पहुंचें। धीरे धीरे इसका असर नीचे तक जाएगा। वैसे भी अगर ज्यादातर पार्टियों की कमान नीचे से आए नेताओं के हाथ में है तो उनके उम्मीदवार भी उसी पृष्ठभूमि के होंगे।

मंडल की राजनीति से निकले नेताओं के विरोध की वजह से महिला आरक्षण पिछले 20 साल से अटका है। वे आरक्षण के भीतर आरक्षण की मांग कर रहे हैं। पर मुश्किल यह है कि महिला आरक्षण में अड़ंगा लगाने वाले या इसका समर्थन करने वाले नेता अपनी पार्टी में महिलाओं का प्रतिनिधित्व नहीं बढ़ा रहे हैं। राबड़ी देवी बिहार में करीब आठ साल तक मुख्यमंत्री रहीं पर राष्ट्रीय जनता दल में महिला प्रतिनिधियों की संख्या नहीं बढ़ी। इसी तरह मायावती के हाथ में बसपा की कमान है पर उनकी पार्टी में महिलाओं की संख्या और भी कम है।

सोनिया गांधी 18 साल कांग्रेस की अध्यक्ष रहीं पर उन्होंने इस बात का कोई प्रयास नहीं किया कि आरक्षण लागू नहीं हो रहा है तो वे खुद अपनी पार्टी से महिलाओं को ज्यादा टिकट देकर उनकी संख्या बढ़ाएं। ममता बनर्जी ने पिछले लोकसभा चुनाव में 35 फीसदी टिकट महिलाओं की दी थी, जिसे बढ़ा कर उन्होंने इस बार 40 फीसदी कर दिया है। सभी पार्टियों को इससे सबक लेना चाहिए। अगर उन्होंने ममता बनर्जी या नवीन पटनायक की तरह महिलाओं के टिकट देना शुरू किया तो आरक्षण की जरूरत नहीं होगी और स्वाभाविक महिला नेतृत्व उभरेगा।

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