Loading... Please wait...

राम मंदिर क्यों अटका रहा है?

शंकर शरण
ALSO READ

भाजपा नेता डॉ. सुब्रह्ममण्यम स्वामी ने इधर बार-बार कहा कि यदि राजीव गाँधी, नरसिंह राव या चंद्रशेखर को कुछ और समय मिला होता, तो उन में से कोई भी अयोध्या में राम मंदिर बनवा चुका होता। अर्थात् किसी भाजपा सत्ताधारी में यह क्षमता, इच्छा नहीं रही है? 

सचमुच, सत्ताधारी भाजपा के तमाम क्रिया-कलापों, प्रचार, बयान, गतिविधि आदि के अंबार में किसी हिन्दू चिंता का संकेत तक नहीं मिलता। वे सारा समय और संसाधन कांग्रेस निंदा या अपनी प्रशंसा में लगाते हैं। उन के समर्थक बौद्धिक ही गंगा सफाई, आदि को जैसे-तैसे उस से जोड़ने की कोशिश करते हैं। ऐसी ही सतही समझ से अयोध्या में राम मंदिर को भी ईंट-पत्थर की एक इमारत बनाने भर काम मानते हैं। उस से जुड़ी असल समस्या से नजर चुराते हैं कि इस्लामी हमलावरों के हाथों हजारों मंदिरों का ध्वंस क्यों हुआ? और आज भी काशी, मथुरा जैसे महानतम् हिन्दू तीर्थ भी इस्लामी कब्जे में क्यों हैं? सच पूछिए, तो इस प्रश्न पर चुप्पी रखना हिन्दू-शत्रुओं की भारी सेवा करना है! 

यद्यपि यह दशकों पुरानी स्थिति है। भाजपा भी गाँधीजी की तरह शत्रुओं को ‘जीत लेने’ के लोभ में हिन्दू हितों की बलि चढ़ाती रही है। उस के कई नेता तो राम मंदिर जैसे विषयों को तात्कालिक लाभ उठाने का हैंडल भर समझते हैं। इसीलिए वह मूल समस्या नहीं उठाते जिस ने स्वतंत्र भारत में पहली बार सभी हिन्दुओं को भेद-भाव भूल कर एक कर दिया था।

नोबेल पुरस्कार से सम्मानित लेखक वी. एस. नायपाल ने अयोध्या आंदोलन को हिन्दुओं के ऐतिहासिक पुनर्जागरण और आत्म-विस्मरण से मुक्ति का संकेत कहा था। हिन्दू चिंतक राम स्वरूप ने रामजन्म-भूमि मंदिर के शिलान्यास दिवस (9 नवंबर 1989) को 15 अगस्त 1947 जैसा महत्वपूर्ण बताया था। 

किंतु उस आंदोलन में भाजपा के कूदने के बाद जल्द साफ हो गया कि वह उस हिन्दू आलोड़न को समझने में भी विफल रही – उस का नेतृत्व करना तो बड़ी दूर की बात थी! वरना उस ने आत्म-स्मृति की भावना, जिस ने विश्व-भर के हिन्दुओं को एकबद्ध किया, को महज एक इमारत बनाने के लक्ष्य में सीमित न किया होता। यह जितना बचकाना है, उतना ही लज्जाजनक भी - कि यह महान हिन्दू धरती आज कितनी प्रतिभाहीन हो गई है!

वस्तुतः मात्र एक विवादित स्थल का मामला तो छब्बीस वर्ष पहले ही हल हो चुका! आकस्मिक या योजनाबद्ध, जैसे भी अयोध्या श्रद्धास्थल पर हिन्दुओं के लिए सतत अपमानजनक विजातीय मजहबी साम्राज्यवादी सत्ता-प्रतीक को ध्वस्त कर देने से वह कार्य खत्म हुआ। वहाँ मंदिर-भवन बने न बने, यह तभी महत्वहीन हो गया था। इसे सामान्य हिन्दू और मुस्लिम दोनों समझते हैं। अतः सीमित अर्थ में अयोध्या प्रश्न निपट चुका। यही कह कर गाँधीवादी चिंतक धर्मपाल ने 6 दिसंबर 1992 की संध्या को राहत की साँस ली थी।

इसीलिए तब से उसे लेकर दोनों समुदायों में कोई उद्वेग नहीं रह गया। जहाँ तक उस विराट आत्म-स्मृति का प्रश्न है जिस का अयोध्या आंदोलन एक प्रतीक बना था - कि भारत सनातन धर्म की भूमि है; कि यहाँ हिन्दू धर्म संस्कृति को विजातीय विचारों, निर्देशों, सत्ताओं के अधीन उपेक्षित, अपमानित करके नहीं रखा जा सकता; कि विश्व मंू हिन्दू सभ्यता को भी समान प्रतिष्ठा मिले – तो इस संपूर्ण अर्थ में हिन्दू स्वाभिमान को व्यक्त करने वाला कोई योग्य, संगठित स्वर नहीं है। इसीलिए हिन्दू पुनः अपनी पुरानी उदासीन मुद्रा में आ गए।

जनता अपने नेताओं की वास्तविकता जानती है। चाहे भाजपा स्वयं जब-तब मंदिर, मंदिर कहती है, किंतु हिन्दुओं में कोई उत्साह नहीं जगता। यदि नेता इसे नहीं देखते तो इसलिए कि वे अपने दलीय हितों पर केंद्रित हैं। उन के बयान मानो ठंढ से ठिठुरते व्यक्ति के लिए कब्ज की दवा जुटाने का वादा प्रतीत होते हैं। 

चूँकि हिन्दू चिंताओं से भाजपा का जीवंत संबंध नहीं, इसीलिए वह नहीं देख पाती कि हिन्दू समाज किन समस्याओं से आक्रांत हो रहा है। भाजपा यहाँ प्रचलित ‘सेक्यूलर’ राजनीति पर ही गर्व-पूर्वक चलती है। इसीलिए उस के नेता संविधान को धर्मग्रंथ कहते और विकास के नेहरूवादी मार्ग की कसम खाते हैं। यह हिन्दू राजनीति है ही नहीं। 

अब जो हालत हो चुकी (इस में दस वर्ष के भाजपा राज का भी योगदान है), उस में इस सेक्यूलरवाद ने उस संविधान को और विकृत किया जो पहले ही हिन्दुओं के लिए संवेदनहीन था। अब तो संविधान में दर्ज धार्मिक समानता, मातृभाषा में शिक्षा, समान नागरिक संहिता, धारा 370 का अस्थायीत्व, गोहत्या पर रोक, आदि कई धाराओं को मृत सा बनाया जा चुका है। हिन्दुओं में अधिकाधिक जातिगत विखंडन और दूसरों को विशेषाधिकार बढ़ाए जा रहे हैं। सभी राजनीतिक दल मुस्लिम वोटों को प्रथम लक्ष्य बना रहे हैं, जिस से हिन्दू चिन्ताओं की खुली उपेक्षा भी हो रही है।

इसीलिए आज हिन्दुओं को हिन्दू के रूप में संगठित करने के लिए अयोध्या में एक भवन बनाने से बहुत अधिक की जरूरत है। उसे पूरा करना तो दूर, कहने तक की इच्छा भाजपा नहीं रखती। इसीलिए यहाँ बाहर-अंदर से जन-सांख्यिकी अतिक्रमण, जिहादी कटिबद्धता, कश्मीर में अलगाववाद, मजहबी आरक्षण, शरीयत अदालतें, चर्च की विस्तारवादी योजना, आदि प्रश्नों पर कोई राष्ट्रीय चर्चा तक नहीं है। सब चुप हैं।

इन बुनियादी प्रश्नों पर हिन्दू और अन्य समुदाय भिन्न-भिन्न सोचते हैं। हिन्दू भावना राष्ट्रीय अखंडता के अनुरूप है, जबकि दूसरों के लिए मजहबी वर्चस्व बढ़ाना अधिक महत्वपूर्ण हैं। अतः कोई दल यदि केवल राष्ट्र-हित दृष्टि से अपनी नीतियाँ बनाए तो हिन्दू उसे पसंद करेंगे। अन्य समुदायों में भी संजीदा लोग समर्थन देंगे। किंतु यहाँ सभी दल अपने कार्यक्रम किसी न किसी तरह वोट पाने के लिए बनाते हैं, जिस में राष्ट्रीय हित का स्थान दूसरा या कहीं नहीं होता। भाजपा ने भी यही दिखाया है। 

वह भी ‘सब को साथ लेकर चलने’ के नाम पर संगठित वोट-बैंकों को येन-केन लुभाना चाहती है। तब हिन्दू हितों से समझौता करना ही होता है, जो उस वोट-बैंक की शर्त है। 1998-2004 ई. के बीच भी सब को संतुष्ट रखने के लोभ ने राष्ट्रीय आकांक्षाओं को किनारे किया था। अभी फिर वही हुआ है। अतः जब तक भाजपा कठिन प्रश्नों को हाथ में लेने की ताब नहीं जुटाती, तब तक उस से हिन्दू विकल्प बनने की आशा छोड़ देनी चाहिए। 

महज सत्ता लेने को हिन्दूवादी या राष्ट्रवादी शब्दावली का प्रयोग विश्वासघात है। हिन्दुओं को जाति, भाषा, क्षेत्र और दलों में बाँट रखा गया है। उन्हें वास्तविक हिन्दू चेतना ही एक कर सकती है, जो जुमलेबाजी से नहीं बन सकती। भाजपा नेताओं द्वारा ‘मंदिर दो, मस्जिद लो!’ जैसे बयान तो हीनता बोध ही कराते हैं। नतीजन आक्रामक विचारधाराएं अपने दाँव बढ़ाती जाती हैं, जबकि हिन्दू अपने ही देश में अतिक्रमण हटाने के लिए विनती और लेन-देन को लाचार हैं। जब तक यह स्थिति रहेगी, एक राम मंदिर बन कर भी हिन्दू धर्म-समाज का कोई उत्थान नहीं होगा। डॉ. स्वामी को इस पर भी ऊँगली रखनी चाहिए।

329 Views

बताएं अपनी राय!

नीचे नजर आ रहे कॉमेंट अपने आप साइट पर लाइव हो रहे है। हमने फिल्टर लगा रखे है ताकि कोई आपत्तिजनक शब्द, कॉमेंट लाइव न हो पाए। यदि ऐसा कोई कॉमेंट- टिप्पणी लाइव हुई और लगी हुई है जिसमें अर्नगल और आपत्तिजनक बात लगती है, गाली या गंदी-अभर्द भाषा है या व्यक्तिगत आक्षेप है तो उस कॉमेंट के साथ लगे ‘ आपत्तिजनक’ लिंक पर क्लिक करें। उसके बाद आपत्ति का कारण चुने और सबमिट करें। हम उस पर कार्रवाई करते उसे जल्द से जल्द हटा देगें। अपनी टिप्पणी खोजने के लिए अपने कीबोर्ड पर एकसाथ crtl और F दबाएं व अपना नाम टाइप करें।

आपका कॉमेट लाइव होते ही इसकी सूचना ईमेल से आपको जाएगी।

© 2019 ANF Foundation
Maintained by Quantumsoftech