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भाजपा के लिए सबक लेने का समय

बलबीर पुंज
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यह सही है कि हाल ही में जिन पांच प्रदेशों- मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, तेलंगाना और मिजोरम में विधानसभा चुनाव हुए- वहां भारतीय जनता पार्टी को किसी में भी सरकार बनाने का अवसर जनता ने नहीं दिया। जहां कांग्रेस एक छोटे राज्य मिजोरम का चुनाव हारीं, तो उसने तीन बड़े राज्यों की सत्ता में वापसी की है। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में तो उसका 15 वर्षों का वनवास समाप्त हुआ है। इन नतीजों से एक बात तो स्पष्ट है कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी स्वयं को एक सशक्त विपक्षी नेता के रूप में स्थापित करने में सफल हुए है। अब सतह के नीचे जाकर यह भी जानना आवश्यक है कि इन परिणामों का वास्तविक आशय क्या है? 

कांग्रेस, तृणमूल, वामपंथी सहित अधिकांश भाजपा विरोधी दल, हालिया चुनाव नतीजों से संभावित तथाकथित महागठबंधन को बल मिलने और 2019 के लोकसभा चुनाव में अपनी-अपनी संभावनाओं के रूप में देख रहे है। इनका वास्तविक उद्देश्य क्या है- वह तेलंगाना में कांग्रेस-तेलुगु देशम पार्टी (तेदेपा) गठबंधन की करारी हार और मध्यप्रदेश में बहुजन समाज पार्टी द्वारा "दिल पर पत्थर रखकर" कांग्रेस को समर्थन दिए जाने से स्पष्ट हो जाता है। 

चुनाव नतीजों पर बसपा अध्यक्षा मायावती कहती हैं, ‘कांग्रेस के राज में भी दलित-आदिवासी-मुस्लिमों की उपेक्षा हुई, भाजपा राज में भी ऐसा ही हुआ है। स्वतंत्रता के बाद इन राज्यों में कांग्रेस ने ही राज किया है, फिर भी इनका भला नहीं हो पाया है। फिर भी भाजपा को रोकने के लिए कांग्रेस की नीतियों से सहमति ना जताते हुए भी बसपा कांग्रेस को समर्थन करेगी, ताकि भाजपा राज्य में सरकार ना बना पाए। राजस्थान में भी यदि कांग्रेस को सरकार बनाने से लिए समर्थन की जरूरत हुई तो बसपा वहां समर्थन करेगी।’ 

कटु सत्य है कि कांग्रेस, बसपा सहित भाजपा विरोधी दलों का उद्देश्य वैकल्पिक दृष्टिकोण, नीतियां, विकास का प्रारूप और जनहित से जुड़े कल्याण न होकर केवल और केवल भाजपा- विशेषकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सत्ता में वापसी से रोकना है। उसका कारण यह है कि अधिकांश विपक्षी नेता- चाहे वह राहुल गांधी हो या मायावती- इन सभी पर कई आपराधिक मामले लंबित है और उनका महागठबंधन का प्रयास वास्तव में, स्वयं की गर्दन को बचाना मात्र है। 

तेलंगाना में विधानसभा चुनाव के समय तेदेपा प्रमुख, पूर्व राजग सहयोगी और आंध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने कांग्रेस के साथ मिलकर भाजपा के खिलाफ ‘किंकर्तव्यविमूढ़’ महागठबंधन करके स्वयं को भाजपा-विरोधी गुट का नया पुरोधा बनने का प्रयास किया था। किंतु तेलंगाना विधानसभा चुनाव में जनता ने कांग्रेस-तेदेपा गठबंधन को सिरे से ही नकार दिया। यहां सत्तारुढ़ तेलंगाना राष्ट्र समिति ने लगभग 47 प्रतिशत मतों के साथ 119 सदस्यीय विधानसभा में 88 सीट जीतने में सफलता प्राप्त की है, जबकि कांग्रेस से गठबंधन के कारण तेदेपा 15 सीटों से सीधे 2 सीटों पर पहुंच गई, जबकि स्वयं कांग्रेस भी ढलान की ओर है। तेलंगाना में अपने निराशाजनक प्रदर्शन के लिए प्रदेश कांग्रेस ने चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर पुन: सवाल उठाते हुए ईवीएम से छेड़छाड़ का आरोप मढ़ दिया। क्या यह कांग्रेस का पाखंड नहीं? यदि ऐसा है तो क्या कांग्रेस मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के परिणामों पर सवाल खड़े करने का साहस दिखाएगी? 

सार्वजनिक विमर्श में इस चर्चा को केंद्र में रखने का प्रयास किया जा रहा है कि चुनाव नतीजों का व्यापक प्रभाव 2019 के आम चुनाव में पड़ेगा। वर्ष 2003 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में कांग्रेसी शासन को अपदस्थ कर सरकार बनाई थी। किंतु कुछ माह पश्चात जब 2004 में लोकसभा के चुनाव हुए, तो केंद्र की तत्कालीन अटल बिहारी वाजपेयी सरकार को पराजय का मुंह देखना पड़ा था और कांग्रेस सरकार बनाने में सफल हुई थी। 

स्वाभाविक रूप से भाजपा के शीर्ष नेतृत्व और पदाधिकारियों को इन चुनाव परिणामों पर गहन चिंतन करने और आगामी दिनों अत्याधिक परिश्रम करने की आवश्यकता है। अभी जिन पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव हुए है, उसमें मध्यप्रदेश लोकसभा सीटों (29) के संदर्भ में सबसे बड़ा और राजस्थान (25) का दूसरा बड़ा राज्य स्थान है- क्या इन दोनों प्रदेशों में सत्तारुढ़ दलों की हार को भाजपा से मोहभंग की संज्ञा देना उचित है? 

मध्यप्रदेश में भाजपा का 15 वर्षों से शासन था, जिसमें शिवराज सिंह चौहान ने वर्ष 2005 से सर्वाधिक 13 वर्षों तक मुख्यमंत्री के रूप में काम किया। इस बार सामने आए नतीजों में कांग्रेस सबसे बड़े दल के रूप में उभरा है, जिसमें 230 सदस्यीय विधानसभा में उसे 40.9 प्रतिशत मत प्रतिशत के साथ 114 स्थानों पर विजयी हुई है, जबकि सत्तारुढ़ भाजपा को 41 प्रतिशत मतों के साथ 109 सीटों पर संतोष करना पड़ा है। ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि प्रदेश की कई सीटों पर हार और जीत का अंतर बहुत मामूली रहा। 

यहां ‘नोटा’ (नन ऑफ द एबव) अर्थात ‘इनमें से कोई नहीं’- उसका उपयोग करने वालों की संख्या भी 5.42 लाख रही, जिनमें अधिकांश लोग भाजपा और प्रदेश सरकार की नीतियों से नाराज तो थे, किंतु वह प्रदेश में कांग्रेस सहित अन्य किसी अन्य दल को भाजपा का विकल्प भी नहीं मान रहे थे। स्पष्ट है कि सत्ता विरोधी लहर के बावजूद प्रदेश के एक बड़े भाग का 15 वर्षों से शिवराज और भाजपा पर विश्वास है। 

पिछले 25 वर्षों का इतिहास साक्षी है कि राजस्थान की जनता हर पांच में सत्ता विरोधी लहर में सरकार को बदल देती है। इस बार भी वैसा ही हुआ। किंतु विपक्षी दलों और मीडिया के एक भाग (अधिकांश चुनावी पंडितों) द्वारा बार-बार यह कहा जा रहा था कि जैसे 2013 के विधानसभा चुनाव में सत्ता-विरोधी लहर में कांग्रेस 2008 में जीतीं 96 सीटों से सीधा 21 (33 प्रतिशत मतों के साथ) पर सिमट गई थी, जिसमें भाजपा को 45 प्रतिशत मतों के साथ 163 सीटें प्राप्त हुई थी- वैसा ही जनआक्रोश इस बार सत्तारुढ़ भाजपा को भी झेलना होगा और उसका लाभ कांग्रेस को मिलेगा। किंतु हुआ क्या? 200 सदस्यीय राजस्थान विधानसभा में कांग्रेस इस बार 39.3 मत प्रतिशत के साथ 99 सीटें में सफल हुई है, जबकि भाजपा 38.8 वोट प्रतिशत के साथ 73 सीटों पर विजय प्राप्त की है। यहां भी नोटा का उपयोग 4.67 लाख लोगों ने किया है। 

वास्तव में, इन विधानसभा चुनावों में भाजपा की पराजय या यूं कहे करारी हार केवल छत्तीसगढ़ में हुई है। स्वाभाविक रूप से यहां भी सत्ता-विरोधी पिछले 15 वर्षों से है और तीनों बार रमन सिंह ने बतौर मुख्यमंत्री इसका सामना किया है। इस बार 90 सदस्यीय छत्तीसगढ़ विधानसभा में कांग्रेस 43 प्रतिशत मतों के साथ 68 स्थान जीतने में सफल रही, जबकि सत्तारुढ़ भाजपा 33 प्रतिशत वोटों के साथ 15 सीटों पर सिमट गई। यहां भाजपा की बुरी पराजय का एक प्रमुख कारण बेलगाम नक्सलवाद है। 

एक आंकड़े के अनुसार, देश में कुल जितने सुरक्षाबल नक्सलियों के लाल आतंक का शिकार होते है, उसमें लगभग 80 प्रतिशत जवानों की शहादत अकेले छत्तीसगढ़ में हुई है। 2017 में जहां देशभर के 74 सुरक्षाबल नक्सल विरोधी अभियान के दौरान शहीद हुए थे, उसमें 59 जवान अकेले छत्तीसगढ़ में नक्सलियों के शिकार बने है। गत दिनों भी छत्तीसगढ़ के बीजापुर में नक्सलियों ने हमला कर दिया था। 

इन्हीं विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने पूर्वोत्तर भारत में अपना एकमात्र राज्य मिजोरम गंवा दिया। दस वर्षों से यहां शासन कर रही कांग्रेस के खिलाफ इस बार सत्ता विरोधी लहर इतनी तीव्र थी कि मुख्यमंत्री लल थनहवला तक भी अपनी दोनों सीटें- चम्फाई और सेरछिप भी नहीं बचा पाए। 40 सदस्यीय विधानसभा में मिजो नेशनल फ्रंट (एम.एन.एफ.) को 26 सीटों के साथ स्पष्ट बहुमत मिला है। केवल 5 सीटों पर सिमटकर रह गई है, यहां पिछली बार उसे 34 सीटें मिली थी। इस बार भाजपा ने अपना प्रदर्शन सुधारते हुए 8 प्रतिशत मतों के साथ एक सीट जीतने में सफलता प्राप्त की है। यह महत्वपूर्ण इसलिए भी है, क्योंकि 2013 के चुनाव में भाजपा यहां सीट तो दूर, कुल वोट का आधा प्रतिशत भी प्राप्त नहीं कर पाई थी। 

अब देखना होगा कि भाजपा अपनी गलतियों से कितना सबक लेती है और संभावित महागठबंधन रूपी ऊंट आगामी लोकसभा चुनाव में किस करवट बैठता है, क्योंकि हालिया प्रदर्शन गदगद कांग्रेस अब संभवत: ही क्षेत्रीय दलों के दवाब में आएं।

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