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पानीपत की पाँचवीं लड़ाई

शंकर शरण
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अब वे ‘पानीपत युद्ध’ की बात कर रहे हैं, जो उन के अनुसार बस अगले दो-तीन महीने में होने वाला है। यह कह कर कि यदि 2019 का चुनाव भाजपा हारती है तो इस के दुष्परिणाम वैसे ही युगान्तरकारी होंगे। दुर्भाग्यवश, इस संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता। किन्तु तब, इस से कई गंभीर प्रश्न उभरते हैं। 

पहला, यह उन्हें कब पता चला? फिर, यहाँ पानीपत की लड़ाई बाहरी हमलावर के विरुद्ध लड़ी गई थी। तो यह शत्रु कौन है? तीसरे, वह इस लड़ाई की तैयारी कब से कर रहा है? यदि लंबे समय से कर रहा है, तो अभी तक उस से निपटने के लिए क्या किया गया? विकास, गैस-कनेक्शन, शौचालय, बैंक-खाता, आदि की बातें तो देश ने सुनी, पर किसी ऐतिहासिक हमले का अंदेशा नहीं सुना था। इसलिए, यदि अभी इस की खबर लगी, तब जिम्मेदार लोग अब तक कहाँ सोए थे?

पर यदि पानीपत जैसे हमले की तैयारी ही अब शुरू हुई है, तो कोई सबूत भी देना चाहिए। वरना मसखरे कहेंगे कि वोट घटने के भय को ही पानीपत का हमला कहा जा रहा है! इसलिए बात जरा साफ होनी चाहिए। वरना, ऐसे मुहावरों से भ्रम ही फैलेगा।  

बिना शत्रु-बोध के लड़ाई नहीं होती। पार्टियों के बीच कुर्सी-दौड़ खेलने के लिए युद्ध नहीं लड़े जाते। इसलिए किन्हीं अदद व्यक्तियों को कहीं बनाए रखने के लिए देश के लोग चौकन्ने नहीं होंगे। बल्कि उलटे क्षोभ हो सकता है कि फिर हवाई बातें की जा रही हैं। जिस का ‘अच्छे दिन’ की तरह कोई मतलब या बेमतलब भी हो सकता है। 

अतः प्रश्न हैः यह पानीपत वाला हाल कब से बना? ऐसा अनिष्ट मुहावरा भारत पर बड़ी हमलावर गोलबंदी का इशारा है। यदि यह लंबी अवधि से हो रही थी, तो इस पर अब तक आप की करनी-कथनी क्या रही है? 

पिछले पाँच-दस वर्षों के कार्यक्रमों, घोषणाओं का आकलन दिखाता है कि आपने न तो इस का कोई संकेत किया, न ऐसे कोई निर्णय लिए, जो किसी युद्ध-प्रतिकार की तैयारी का संकेत करते। उलटे, पिछले ‘इंडिया शाइनिंग’ की तरह ऐसे कई बयान आए जिस में दावा था कि भारत गजब का जोरदार बन गया है। कि जर्मनी, फ्रांस, ब्रिटेन, जैसे देश के लोग अब हमारे जैसा नेतृत्व चाहते हैं, वगैरह-वगैरह। साहब के अन्य बयान भी सदैव जातियों या गरीब-अमीर की शब्दावली में आते रहे, और अभी भी आ रहे हैं। तो क्या यह पानीपत यहाँ गरीबों-अमीरों या इन उन जाति-समूहों के बीच होगा? 

सो, पहले तो अपनी स्थिति बताएं कि आप गरीबों के, किन्हीं जातियों, किसी पार्टी, या बस केवल अपने ही सरदार हैं? डॉन किहोते की तरह। फिर हमलावर शत्रु की पहचान स्पष्ट करें। वरना, लोग इसे एक और जुमला मान कर मुँह फेर रहेंगे। चाहे बाद में वही हो जिस का डर आप दिखा रहे हैं। क्योंकि आज भी पानीपत की लड़ाई एकदम कोरी कल्पना नहीं है, चाहे साहब लोग इस से परिचित हों या नहीं। इस की खुली चुनौती दी जाती रही है। 

यहाँ एक बड़े आलिम मौलाना अकबर शाह खान ने 1926 ई. में पंडित मदन मोहन मालवीय को सार्वजनिक चुनौती दी थी कि ‘पानीपत का चौथा युद्ध’ आयोजित किया जाए। मौलाना ने प्रस्ताव दिया कि उस में भारत की तात्कालीन आबादी के अनुपात से, 700 मुस्लिम और 2200 हिन्दू रहें। घमंड से मौलाना ने यहाँ तक कहा कि वे साधारण मुसलमान ही लाएंगे, पठान या अफगान नहीं, जिन से हिन्दू “प्रायः आतंकित रहते हैं।” फिर मौलाना ने कहा कि सात सौ मुस्लिम बाइस सौ हिन्दुओं को यूँ ही कुचल देंगे। यह वक्तव्य बहुचर्चित हुआ था। (टाइम्स ऑफ इंडिया, ¬20 जून 1926)। डॉ. भीमराव अंबेदकर ने अपनी पुस्तक ‘पाकिस्तान ऑर पार्टीशन ऑफ इंडिया’ में इस प्रसंग को विस्तार से दिया है। 

तो क्या वह युद्ध हुआ? जी हाँ। चाहे उस तरह, और उस समय नहीं। पर 1946-47 ई. में और क्या हुआ था?  अगस्त 1946 में कलकत्ते में हिन्दुओं के कत्लेआम के बाद यहाँ मुस्लिम लीग के नेता जिन्ना ने कांग्रेस नेताओं को खुली धमकी दी थी कि वे देश-विभाजन कर मुसलमानो के लिए पाकिस्तान बनाने की माँग मान लें – ‘‘और नहीं तो हिन्दुओं की जान बचाने के लिए ही।’’ इस प्रकार, मौलाना की वह चुनौती और बीस वर्ष बाद जिन्ना की धमकी, एक ही चुनौती के दो रूप थे। 

इस प्रकार, हुआ तो वही, जिस का मौलाना खान ने दावा किया था। एक चौथाई मुसलमान तीन चौथाई से अधिक हिन्दुओं को आतंकित करके देश का एक बड़ा हिस्सा तोड़ ले गए। कोई बाहरी हमलावर और क्या करता है? इस तरह, पानीपत का वह ‘चौथा युद्ध’ हुआ, और हम अपनी मातृभूमि का एक बड़ा हिस्सा खो बैठे! लेकिन नेताओं को याद रखना चाहिए, कि यह हार हिन्दू जनता की उतनी नहीं, जितनी उन के नेताओं की थी। अभी भी हालत वही है। 

इसीलिए, कोई नेता उन प्रसंगों को याद भी नहीं करता। क्या साहबों के किसी भाषण, लेखन, पार्टी दस्तावेज, आदि में उस हार को दुहराने से बचने का कोई उल्लेख है? बाल ठाकरे जैसे अपवाद छोड़ दें, तो सभी नेताओं ने वह इतिहास तहखाने में दबा डाला है। फलतः आज हमारे अनेक युवा जानते भी नहीं कि रावलपिंडी और ढाका इसी देश के अंग थे। ऐसे भगोड़ेपन का वही नतीजा होता, जो हो रहा हैः शत्रु की आक्रामकता को शह मिलना, चाहे होशियारीवश अभी वह शान्त है।

पर इस देश में फिर वही चुनौती लंबे समय से है। तब मौलाना अकबर खान थे, आज अकबरुद्दीन ओवैसी हैं। वे वर्षों से वैसी ही बातें बोल रहे हैं। इतनी हिंसक और भद्दी कि छापी नहीं जा सकती, मगर जिसे वे यहाँ हजारों की भीड़ में खुले आम ललकार कर कहते हैं। यह बिना शक पानीपत की पाँचवीं लड़ाई की चुनौती है। 

तो हमारे साहबों ने अकबरुद्दीन का क्या किया? कुछ नहीं। मानो कुछ सुना ही नहीं। ठीक वही व्यवहार, जो महात्मा गाँधी करते थे। इन्होंने दावा किया कि ‘विकास में सारी समस्याओं का समाधान है।’ जैसे गाँधीजी प्रेम से सब को जीतने के दावे करते थे। वैसे ही, ये अपने विविध विकास कार्यों, पार्टी-प्रचार और प्रवचनों से हमें दुर्जेय बना रहे हैं। 

पर पानीपत के चौथे युद्ध का सबक याद रखें! वह युद्ध हिन्दू इसलिए हारे कि उन्होंने महात्मा कहे जाने वाले एक नेता पर भरोसा कर लिया! उस ने वचन दिया था कि देश का विभाजन उस की लाश पर होगा। उस में अपना वचन पूरा करने की सामर्थ्य नहीं थी। पर उस ने नेतृत्व करने की जिद न छोड़ी। हिन्दू इसीलिए हारे। गलत सेनापति के कारण हारे, जो लड़ना ही नहीं जानता था। वरना योद्धाओं से भरे पंजाब और चिंतकों से भरे बंगाल ने अपनी रक्षा का कोई उपाय सोचा होता, जिन का सर्वाधिक संहार हुआ। यदि उन्हें समय रहते स्पष्ट बताया जाता कि एक मर्मांतक शत्रु है जिस का उन्हें सामरिक मुकाबला भी करना पड़ सकता है। 

इसीलिए, प्रश्न है - क्या आज पानीपत की चेतावनी देने वाले शत्रु की पहचान बताएंगे, और उस से लड़ सकने की योग्यता का परिचय देंगे? यदि नहीं, तो हिन्दू फिर मारे जाएंगे। लगभग उसी तरह, गफलत के कारण। नेताओं के विश्वासघात के कारण। उन्हें बार-बार भेड़िया आया, भेड़िया आया, के आवाहन करके केवल दलीय स्वार्थ साधा जाता है। जिस से वे भेड़िया न होने के भ्रम में ही डूब जाएंगे, और अंततः खत्म कर दिए जाएंगे। एकबारगी, पूर्वी बंगालियों, पश्चिमी पंजाबियों की तरह; अथवा धीरे-धीरे, कश्मीरी पंडितों की तरह ...

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