जागरूकता लाना प्रियंका के लिए बड़ी चुनौती..!

राकेश अग्निहोत्री प्रियंका गांधी ने मेरठ के अस्पताल में भर्ती भीम आर्मी सेना के चंद्रशेखर आजाद से मुलाकात कर जिस तरह चौंकाया  वह गौर करने लायक है.. उत्तर प्रदेश के युवा दलित नेता अंबेडकर के अनुयाई चंद्रशेखर ने प्रियंका से मुलाकात के बाद नरेंद्र मोदी के खिलाफ वाराणसी से चुनाव लड़ने की हुंकार भरी.. वह बात और  कि प्रियंका और चंद्रशेखर दोनों की ओर से राजनीतिक गुफ्तगू पर पूरी तरह चुप्पी साधी गई.. फिर भी इस मुलाकात को अंतिम समय तक गोपनीय रखा गया तो मतलब साफ है कि कोई सियासी खिचड़ी जरूर पक रही है..

क्योंकि कुछ घंटे पहले ही बसपा सुप्रीमो मायावती ने उत्तर प्रदेश समेत किसी भी राज्य में कांग्रेस से गठबंधन की सभी संभावनाओं पर पूर्णविराम लगा दिया था... तो अभी तक खुद को उत्तर प्रदेश के अमेठी रायबरेली तक सीमित रखने वाली प्रियंका गांधी के लखनऊ रोड शो को छोड़ दिया जाए तो दिल्ली से बाहर सीधे गुजरात पहुंचकर सीडब्ल्यूसी मीटिंग के बाद कांग्रेस के मंच से आमसभा को संबोधित करते हुए देश के मतदाताओं का आव्हान किया था.. कि वो ध्यान भटकाने वाले मुद्दों से दूर रहकर जागरूकता का परिचय दें, यही सच्ची देशभक्ति है..

तो सवाल खड़ा होना लाजमी है कि अहमदाबाद से वापस यूपी पहुंचने के पहले जिस भाजपा के निशाने पर रॉबर्ट वाड्रा के घोटालों के तार प्रियंका गांधी, राहुल गांधी से जोड़ने का आरोप भाजपा की ओर से स्मृति ईरानी ने लगाया.. उसके बाद प्रियंका गांधी की उत्तर प्रदेश में मतदाताओं को जागरूक करने की जो मुहिम शुरू होने वाली आखिर वह क्या गुल खिलाएगी.. जब पुलवामा और उसके बाद की गई एयर स्ट्राइक के बाद प्रियंका ने लंबी सियासी चुप्पी साथ ली थी.. यदि अब यह चुप्पी टूटने लगी तो फिर क्या प्रियंका गांधी जिनके चुनाव लड़ने को लेकर अभी भी सस्पेंस खत्म नहीं हुआ है..

वह उत्तर प्रदेश से मध्यप्रदेश समेत दूसरे राज्यों में भी प्रचार का हिस्सा बनेंगी.. क्योंकि कांग्रेस यदि मुलायम सिंह और अखिलेश के परिवार से सॉफ्ट कॉर्नर जता रही तो भीम आर्मी चीफ चंद शेखर से प्रियंका की मुलाकात के बाद मायावती का गुस्सा वरना और उसका सामने आने से इनकार नहीं किया जा सकता. लंबे अरसे बाद एक बार फिर प्रियंका गांधी चर्चा में लौटी है तो उसकी वजह है केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी का रॉबर्ट वाड्रा के साथ राहुल और प्रियंका दोनों के खिलाफ सीधा मोर्चा खोलना..प्रियंका गांधी ने कांग्रेस महासचिव की भूमिका में पिछले दिनों जब राहुल गांधी और ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ उत्तर प्रदेश में रोड शो किया था.. तब भी मीडिया से उन्होंने दूरी बनाई थी..

इस बीच उनके पति रॉबर्ट वाड्रा से ईडी द्वारा की गई पूछताछ का सिलसिला बदस्तूर जारी रहा, तो पुलवामा कांड और एयर स्ट्राइक के बाद प्रियंका ने अपनी सियासी चुप्पी को कांग्रेस के जिस मंच से तोड़ा.. वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का गुजरात ही था, जहां से कांग्रेस ने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की यादों के साथ उनके सिद्धांत और विचारधारा की याद दिलाते हुए 2019 लोकसभा चुनाव के लिए प्रियंका को सामने ला खड़ा कर दिया.. कार्यकर्ताओं और अपने समर्थकों से 7 मिनट के संवाद के दौरान प्रियंका गांधी ने एक ऐसी महिला नेत्री के तौर पर छाप छोड़ी, जो कांग्रेस और राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी के सामने खड़ी चुनौतियों से अच्छी तरह वाकिफ है..

शायद यही वजह थी जो प्रियंका ने जोर देकर जागरूकता लाने की आवश्यकता जताई.. बिना लिखी स्कि्रप्ट तो मंच के सामने बैठे लोगों से कनेक्शन ऐसा, जिसमें अपनापन और अपेक्षाओं का संदेश छुपा हुआ था.. यही नहीं, चुनौतियां और चिंता से वाकिफ कराते हुए बिना नरेंद्र मोदी का नाम लिए अपने समर्थकों को चुनाव का मूल मंत्र दिया कि मतदाता जागरूक हो, जिनका कहना था तमाम गैरजरूरी, बेबुनियाद मुद्दे इस चुनाव में उछाले जाएंगे, लेकिन फैसला सोच समझ कर मतदाताओं को लेना होगा.. जिस रफेल के मुद्दे पर राहुल सीधे मोदी को निशाने पर लगातार लिए हुए हैं उस पर प्रियंका ने कुछ भी कहना मुनासिब नहीं समझा..

राष्ट्रवाद के बरगलाने में ना आएं और मतदाता सच्ची देशभक्ति को समझें.. राहुल के एंग्री यंगमैन और आक्रामक अंदाज से जुदा प्रियंका जिनमें उनके चाहने वाले इंदिरा गांधी का अक्स देखते हैं, धीर-गंभीर नजर आईं.. चाहे फिर वह उनका अंदाज ए बयां हो या फिर ज्वलंत मुद्दे जिसके जरिए केंद्र की मोदी सरकार पर वादाखिलाफी का आरोप लगाते हुए सवालों की झड़ी लगाई जा सकती.. प्रियंका ने साबरमती के आश्रम में सीडब्ल्यूसी मीटिंग के दौरान सोनिया, राहुल और मनमोहन के अगल-बगल से बहुत दूरी बनाते हुए ज्योतिरादित्य के साथ बतौर महासचिव बैठी नजर आईं..

समझा जा सकता है जब मोदी, शाह और भाजपा के निशाने में परिवारवाद के मुद्दे पर भाई, बहन, जीजा, साले, मां, बेटे के आरोपों से यह परिवार घिरा हुआ है तब प्रियंका ने यह संदेश देने की कोशिश की कि वह जिम्मेदार पदाधिकारी के तौर पर कांग्रेस के हाथ मजबूत करने के लिए सामने आई हैं, ना कि इंदिरा राजीव के परिवार के सदस्य के तौर पर सीधे चुनाव मैदान में उतरना उनका लक्ष्य है.. यही वजह है कि सोनिया और राहुल की परंपरागत रायबरेली-अमेठी सीट से उम्मीदवार का ऐलान कर दिया गया तो प्रियंका के नाम पर कांग्रेस ने अपने पत्ते नहीं खोले..

ऐसे में दिल्ली और उत्तर प्रदेश से दूर मोदी के गुजरात में पाटीदार नेता हार्दिक पटेल की कांग्रेस में एंट्री और उनकी प्रियंका से अलग से मुलाकात हो या फिर जिस उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी प्रियंका को सौंपी गई.. वहां के युवा दलित नेता भीम आर्मी के चंद्रशेखर आजाद से उनकी अस्पताल में गोपनीय मुलाकात को.. यदि जोड़ कर देखा जाए तो संदेश इसमें भी छुपा है.. हार्दिक पहले ही राहुल गांधी और अहमद पटेल के संपर्क में थे तो अब मोदी को उनके गुजरात में मात देने के लिए कांग्रेस ने न सिर्फ हार्दिक को जोड़ा, बल्कि अल्पेश के भाजपा में जाने की चर्चाओं पर भी पूर्णविराम लगाया..

यानी राज्यों के युवा नेताओं पर कांग्रेस खासतौर से राहुल और प्रियंका की पहली नजर है.. पीढ़ी परिवर्तन के इस दौर में कर्नाटक में कुमारस्वामी, तमिलनाडु में स्टालिन तो बिहार में तेजस्वी यादव से गठबंधन को टूटने नहीं दिया.. उत्तर प्रदेश में भी भीम आर्मी के चंद्रशेखर आजाद पर अपनी नजर टिका रखी है, जहां जयंत चौधरी, अखिलेश, मायावती के गठबंधन से कांग्रेस को बाहर करने के बाद प्रियंका, ज्योतिरादित्य के साथ मिलकर नए समीकरण गठबंधन को लेकर बनाने में विशेष रुचि ले रही हैं..

चंद्रशेखर ने उत्तर प्रदेश की लोकसभा उपचुनाव में योगी और भाजपा के विरोध को ताकत दी तो कभी मायावती की खुलकर मुखालफत नहीं की.. अब प्रियंका गांधी की भीम आर्मी चंद्रशेखर से मुलाक़ात  और अहमदाबाद में कांग्रेस के मंच से प्रियंका के उद्बोधन के बाद भाजपा की ओर से केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने सीधा मोर्चा राहुल गांधी, रॉबर्ट वाड्रा और प्रियंका गांधी के खिलाफ एक बार फिर खोला.. यानी भाजपा ने मोदी, योगी और शाह की बजाए स्मृति का चयन कर संदेश दे दिया कि इस परिवार के खिलाफ स्मृति ही मोर्चा संभालने के लिए काफी हैं, जो पिछला चुनाव राहुल गांधी के खिलाफ हार चुकी हैं तो एक बार फिर लड़ने की तैयारी में हैं, जो अभी तक राहुल गांधी के खिलाफ समय-समय पर मोर्चा खोलती रही हैं तो अब उनकी बहन प्रियंका के खिलाफ इस मुहिम को वह ही आगे बढ़ाएंगी..

प्रियंका गांधी की बढ़ती सक्रियता के बीच भाजपा ने जिस तरह से राबर्ट वाड्रा को लेकर घेराबंदी तेज कर राहुल और प्रियंका दोनों को आरोपों के घेरे में लिया है.. उसके बाद राहुल गांधी को सवाल के जवाब में यह कहना पड़ा कि वाड्रा के मामले में जांच एजेंसियां अपना काम करें, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ भी राफेल के मुद्दे पर जांच शुरू हो.. तो देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में जहां कांग्रेस ने ज्योतिरादित्य और प्रियंका गांधी को संयुक्त तौर पर जिम्मेदारी सौंपी है..

वहां भाजपा, मोदी और योगी से सीधे दो-दो हाथ करने के पहले मायावती, अखिलेश और जयंत चौधरी से तालमेल बनाने की बजाय प्रियंका ने इन दोनों से दूरी बनाने वाले छोटे दलों का समर्थन हासिल करने की रणनीति पर काम करना शुरू कर दिया, तो देखना दिलचस्प होगा कि जो मायावती सीधे कांग्रेस के खिलाफ मुहिम शुरू कर चुकी हैं.. आखिर उनके खिलाफ महिला नेत्री के तौर पर प्रियंका मुखालफत करते हुए किस हद तक आगे बढ़ती हैं.. सपा और बसपा पहले ही समझौते के बाद रायबरेली और अमेठी सीट पर गठबंधन के उम्मीदवार उतारने का ऐलान कर चुके .. तो बदलते सियासी परिदृश्य में कांग्रेस ने मायावती के सहयोगी अखिलेश के खिलाफ अभी तक सॉफ्ट कॉर्नर यह करके दिखाया है कि मुलायम सिंह परिवार के खिलाफ कांग्रेस सीधे उम्मीदवार उतारने से बचेगी..

ऐसे में प्रधानमंत्री की लोकसभा सीट वाराणसी जो बसपा ने सपा के लिए छोड़ रखी है वहां से चंद्रशेखर आजाद ने प्रियंका गांधी से मुलाकात के बाद चुनाव लड़ने की इच्छा जताई है, तो देखना दिलचस्प होगा कि बसपा सपा संयुक्त तौर पर जब भाजपा के साथ कांग्रेस के खिलाफ मैदान में अपने उम्मीदवार उतारना शुरू कर चुकी है.. तब प्रधानमंत्री के वाराणसी में क्या मोदी, भाजपा और एनडीए विरोधी किसी एक उम्मीदवार को मैदान में उतारने में सफल होते हैं, तो सवाल यह भी खड़ा होता है कि क्या प्रियंका गांधी हार्दिक पटेल की तरह भीम आर्मी के चंद्रशेखर आजाद को कांग्रेस के झंडे के नीचे लाने में रुचि लेंगी, तो क्या उन्हें इसमें सफलता मिलेगी..

पहले भी राहुल गांधी जिग्नेश हार्दिक और अल्पेश की तिकड़ी को भरोसे में लेकर गुजरात विधानसभा चुनाव में भाजपा के खिलाफ माहौल बनाने में जरूर सफल रहे लेकिन तो भी सत्ता तक नहीं पहुंच पाए.. बड़ा सवाल यह भी खड़ा होता है कि क्या प्रियंका गांधी के कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव बनने के बाद लोकसभा चुनाव में कांग्रेस महिलाओं के लिए पार्टी के अंदर आरक्षण के प्रावधान को आगे बढ़ाएगी.. क्योंकि खुद राहुल गांधी ने महिला आरक्षण को फिर एक चुनावी मुद्दा बनाने का अभियान शुरू कर दिया है, तो उड़ीसा में बीजू पटनायक से लेकर पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी ने दूसरे राजनीतिक दलों की तुलना में महिला उम्मीदवारों को टिकट देने की प्राथमिकता दी है..

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