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गलतियों को दोहराती कांग्रेस

बलबीर पुंज
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देश के पांच राज्यों- मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, तेलंगाना और मिजोरम में विधानसभा चुनाव चल रहे है। इस संबंध में कई चुनावी सर्वेक्षण और भविष्यवक्ता अपना-अपना आकलन प्रस्तुत कर रहे है। अब इन चुनावों के परिणाम क्या आएंगे- वह तो 11 दिसंबर को स्पष्ट होगा, जब मतगणना होगी। किंतु चुनाव में जिस प्रकार विपक्षी दल- विशेषकर कांग्रेस की रणनीति सामने आई है, उससे दो बातें स्पष्ट रूप से रेखांकित होती है। पहली- स्वतंत्र भारत में 50 वर्षों पर शासन कर चुकी और दोबारा सत्ता पाने के लिए लालायित कांग्रेस पुरानी गलतियों से कुछ भी सीखने को तैयार नहीं है। और दूसरी- वह अब भी वामपंथियों के अप्रासंगिक बौद्धिक खुराक के दम पर अपने अस्तित्व को बचाने की जुगत में है। 

वर्तमान चुनाव सहित बीते एक वर्ष में जितने भी विधानसभा चुनाव हुए है- उसमें कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी का मंदिरों में पूजा-पाठ करते दिखाई दिए है। यहां तक, उनकी कैलाश मानसरोवर यात्रा पूरी होने का भी दावा पार्टी कर रही है। क्या कांग्रेस द्वारा यह सब चुनावी कसरत केवल इसलिए नहीं हो रही है- क्योंकि एके एंटनी समिति ने वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में पार्टी की हिंदू विरोधी छवि को पराजय का मुख्य कारण बताया था? 

यक्ष प्रश्न है कि राहुल गांधी जिस प्रकार अनेकों मंदिरों का दौरा कर स्वयं को सच्चा हिंदू, जनेऊधारी ब्राह्मण आदि प्रस्तुत करने का प्रयास किया है, तो उसके बाद भी उन्हे ‘वांछित फल’प्राप्त क्यों नहीं हो रहा है? इसका स्पष्ट कारण यह है कि राहुल गांधी और उनके राजनीतिक परामर्शकर्ता (वामपंथी चिंतक सहित) जनभावना से न केवल पूरी तरह कट हुए हैं, साथ ही वह ‘वांछित फल’ नहीं मिलने के कारणों का भी सटीक आकलन नहीं कर पा रहे हैं। 

जब शाह बानो प्रकारण के बीच 1989 के लोकसभा चुनाव में रामजन्मभूमि आंदोलन चरम पर था, तब तत्कालीन राजीव गांधी सरकार ने राजनीतिक समायोजन करते हुए अयोध्या में राम मंदिर के शिलान्यास कार्यक्रम की स्वीकृति दे दी थी, फिर भी वह चुनाव हार गए। ऐसा इसलिए हुआ- क्योंकि राजीव गांधी की कोशिश विशुद्ध रूप से चुनावी राजनीति से प्रेरित थी, उन्होंने अयोध्या से जुड़ी सदियों पुरानी आस्था और करोड़ों लोगों की भव्य राम मंदिर के पुनर्निर्माण की मांग के पीछे जुड़ी आहत भावना को समझा नहीं। क्या राहुल गांधी भी उसी गलती को दोहरा नहीं रहे है?

मध्यप्रदेश में कांग्रेस की ओर से जो "वचनपत्र" जारी हुआ है, उसमें एक घोषणा यह भी है, ‘शासकीय परिसरों पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आर.एस.एस.) की शाखाएं लगाने पर प्रतिबंध लगाएंगे। साथ ही अधिकारियों और कर्मचारियों को शाखाओं में छूट संबंधी आदेश को भी निरस्त करेंगे।’ पूर्व केंद्रीय मंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी.चिदंबरम इसे सही ठहराते है। संघ के प्रति कांग्रेस की दुर्भावना कोई नई बात नहीं है। गत दिनों विदेश दौरे पर गए कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी ने भी संघ की तुलना कट्टरपंथी इस्लामी संगठन मुस्लिम ब्रदरहुड से की थी। 

संघ के प्रति कांग्रेस के इस दृष्टिकोण की जड़े किसमें निहित है? अपनी प्रखर राष्ट्रवादी और भारत की सनातन संस्कृति और मूल्यों से जुड़े होने कारण संघ प्रारंभ से ही कांग्रेस और वामपंथियों के निशाने पर रहा है। जब संघ की स्थापना हुई, तब खिलाफत आंदोलन और मोपला दंगे की पृष्ठभूमि में मुस्लिम अलगाववाद का प्रश्न देश में हावी हो रहा था। 1930-40 के दशक में जहां वामपंथी पाकिस्तान के सृजन के लिए दुबले होते जा रहे थे, तो वहीं कांग्रेस जिन्नाह की विभाजनकारी मानसिकता के समक्ष समर्पण कर चुकी थी, जबकि संघ अखंड भारत की वकालत कर रहा था। 

संघ की राष्ट्रनिष्ठा कभी भी संदिग्ध नहीं रही। भारत विभाजन के दौरान पाकिस्तान चले गए क्षेत्रों से हिंदू-सिखों को सुरक्षित बाहर निकालने का दायित्व संघ ने निभाया, तो कश्मीर पर पाकिस्तान पोषित कबाइलियों के हमले के बाद भारतीय सेना के लिए श्रीनगर हवाईअड्डे का रातोंरात निर्माण करने के साथ कोटली में अपनी शहादत देने में भी स्वयंसेवक पीछे नहीं रहे। 1962 के युद्ध में जब वामपंथी समान विचारधारा के कारण चीन का साथ दे रहे थे, तब संघ के कार्यकर्ताओं ने सीमा पर जवानों को आवश्यक राहत साम्रगी पहुंचाई। तत्कालीन प्रधानमंत्री पं.नेहरू इससे इतने अभिभूत हुए कि उन्होंने 26 जनवरी 1963 के गणतंत्र दिवस की परेड में शामिल होने के लिए संघ को निमंत्रण भेजा। 

दुर्भाग्य है कि कांग्रेस ने पं.नेहरु के समय की इस घटना से भी कोई सबक नहीं सीखा। जिस दौर में विश्व ने इस्लामी आतंकवाद का बड़ा दंश 9/11 के रूप में झेला, तब कांग्रेस ने न केवल विकृत तथ्यों के आधार पर 2007-08 में ‘हिंदू/भगवा आतंकवाद" शब्द की रचना की, बल्कि 2013 में संघ की शाखाओं में आतंकवाद का प्रशिक्षण दिए जाने का आरोप मढ़ दिया। यहां तक, कांग्रेस के वर्तमान अध्यक्ष राहुल गांधी ने 2010 में अमेरिकी राजदूत से देश में ‘हिंदू आतंकवाद’ को लश्कर-ए-तैयबा से अधिक खतरनाक बता दिया। इसी दौर में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह देश के संसाधनों पर मुस्लिमों के पहले अधिकार की घोषणा कर चुके थे। इन सबसे कांग्रेस का क्या हश्र हुआ- यह सर्विदित है। 

कांग्रेस स्वयं को पंथनिरपेक्षता का प्रतीक और रक्षक बताती थकती नहीं। वह और उसकी बौद्धिक आपूर्तिकर्ता वामपंथियों सहित अन्य स्वघोषित सेकुलरिस्टों की ‘सेकुलरवाद’ की परिभाषा आज कितनी विकृत है- वह केरल और तेलंगाना के घटनाक्रमों से स्पष्ट है। केरल स्थित सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर चल रहे विवाद के बीच वहां की वामपंथी सरकार ने उच्च न्यायालय में कहा है कि यह मंदिर ‘सेकुलर’ है, इसलिए यहां सभी के लिए दरवाजे खुले हैं। यदि सबरीमाला मंदिर के स्थान पर मामला किसी मस्जिद या चर्च और संबंधित आस्था से जुड़ा होता, साथ ही परिस्थितियां भी सबरीमाला जैसी होती- तो क्या तब भी वामपंथी उन धार्मिक स्थलों को ‘सेकुलर’ कहते? 

बीते दिनों सर्वोच्च न्यायालय के एक निर्णय के बाद जिस प्रकार सबरीमाला मंदिर में महिला स्वतंत्रता के नाम पर कुछ अनैतिक तत्वों ने हिंदुओं की आस्था को चोटिल करने का प्रयास किया था, उसके खिलाफ स्थानीय भाजपा नेता ने अदालत में याचिका दायर कर मंदिर में गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर प्रतिबंध लगाने की मांग की है, जिसपर केरल सरकार ने उपरोक्त जवाब भेजा है। क्या देश में पंथनिरपेक्ष मूल्य, स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकार- बहुसंख्यकों की आस्था को रौंदने का विशेषाधिकार देता है? 

तेलंगाना में स्वयंभू सेकुलरिस्टों की स्थिति क्या है? मीडिया रिपोर्ट्स से खुलासा हुआ है कि तेलंगाना कांग्रेस ईकाई ने विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए 9 अक्टूबर को एक धर्म विशेष के लिए अलग से घोषणाएं करने की योजना का प्रस्ताव दिया था। ‘क्रिश्चियन मैनिफेस्टो’ नामक इस दस्तावेज में जिन मुख्य घोषणाओं को स्थान दिया गया है- उसमें कांग्रेस द्वारा ईसाई पादरियों को संरक्षण देना, पादरियों को वेतन, चर्च और कब्रिस्तान के लिए सरकारी भूमि आवंटन आदि शामिल है। इसने कांग्रेस विभाजनकारी और अल्पसंख्यकों को तुष्ट करने की मानसिकता को पुन: स्पष्ट कर दिया है। ऐसी की रणनीति कांग्रेस कर्नाटक में लिंगायत और गुजरात में पाटिदार समुदायों के संदर्भ में अपना चुकी है- जहां उसे असफलता ही मिली है। 

स्वतंत्रता से पूर्व, गांधीजी का राष्ट्रवादी व्यक्तित्व और उनका हिंदू-सनातनी चिंतन कांग्रेस की असली पूंजी थी, जिसे उनके नृशंस हत्या के बाद तत्कालीन नेतृत्व ने तिलांजलि दे दी। तब बौद्धिक रूप से खाली हुई कांग्रेस ने उस विदेशी वामपंथी चिंतन को आत्मसात किया, जिसके मूल में ही देश की सनातन परंपराओं, संस्कृति और बहुसंख्यकों की आस्था के लिए घृणा का भाव था। शिक्षा, रक्षा सहित कई महत्वपूर्ण विभागों में वामपंथियों की नियुक्ति इसका प्रमाण है। 

विश्व के शेष भागों के साथ भारत में भी वामपंथी दर्शन लगभग विलुप्त हो चुका है और उसके झंडाबरदार राष्ट्रीय राजनीति में सीमित हो गए है- आज ठीक उन्हीं के पदचिन्हों पर कांग्रेस भी चल रही है। यदि राहुल गांधी कांग्रेस को पुनर्जीवित करना चाहते है, तो उन्हें विकृत वाम-दर्शन और औपनिवेशी मानसिकता से स्वयं को मुक्त करना होगा। क्या ऐसा संभव है?

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