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कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन क्या कामयाब होगा?

ज़ुबैर अहमद -- मुंबई में महिला कांग्रेस की उभरती नेता भावना जैन 'बदलती' कांग्रेस पार्टी का नया चेहरा हैं। जुहू की कच्ची बस्ती नेहरू नगर में लोगों के बीच खड़ी वो दूर से पहचानी जा सकती हैं। उनका अंदाज़ आक्रामक है, ‘ये वाली सड़क बनानी चाहिए न पूरी’। उनके हाव-भाव में आत्मविश्वास है। नेहरू नगर में पार्टी के दफ़्तर में भी जब वो बैठती हैं तो एक लीडर की तरह, जिनके इर्द-गिर्द बस्ती से आए पार्टी कार्यकर्ता स्थानीय समस्याओं के बारे में बातें कर रहे हैं। 10 साल पहले वो अमरीका की जगमगाती कॉर्पोरेट की दुनिया का हिस्सा थीं।

उन्होंने उस दुनिया को छोड़कर मुंबई की कच्ची बस्तियों में काम करने का फ़ैसला क्यों किया? भावना जैन ने कहा, ‘मेरी आत्मा की आवाज़ थी कि मैं जनता की सेवा करूँ। मुझे राजनीतिक जीवन के रूप में इसे हासिल करने के लिए एक माध्यम मिल गया।;

लेकिन कांग्रेस में ही क्यों शामिल हुईं? जवाब आया, ‘मुझे एक ऐसी पार्टी को चुनना था जो सभी समुदाय, सभी जाति, सभी की आकांक्षाओं की नुमाइंदगी करे। एक ऐसी पार्टी जो कश्मीर से कन्याकुमारी तक जनता का प्रतिनिधित्व करे। कांग्रेस में मुझे वही पार्टी दिखी।’

भारत लौटकर कांग्रेस पार्टी में शामिल होने की दूसरी वजह थी उस समय की पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी से उनका प्रभावित होना। लेकिन पार्टी में उनकी थोड़ी-बहुत पहचान बनी राहुल गांधी के अध्यक्ष बनने के बाद, ‘राहुल जी के नेतृत्व में मुझे ये लगता है कि कहीं न कहीं मुझे कांग्रेस पार्टी ने मेरा टैलेंट को इस्तेमाल करने का मौक़ा दिया है।’

राहुल गांधी पार्टी को नए सिरे से संगठित करने की कोशिश कर रहे हैं, युवाओं को आगे बढ़ा रहे हैं और भावना उसकी एक मिसाल हैं।

सत्यजीत तांबे इस कोशिश की एक और मिसाल हैं, हालांकि वो महाराष्ट्र यूथ कांग्रेस के अध्यक्ष पार्टी के अंदर हुए चुनाव लड़कर बने लेकिन इस बात से किसी को इनकार नहीं कि इस पद के सभी उम्मीदवार राहुल गांधी के क़रीब थे। देखने में तांबे भोले लगते हैं लेकिन आक्रमण उनकी विशेष स्टाइल है। ये वही युवा नेता हैं जिन्होंने नारे लगाते हुए अपने समर्थकों के साथ मिलकर प्रधानमंत्री मोदी के एक बड़े पोस्टर पर कालिख से पोती थी। पार्टी के बाहर इस पर विवाद हुआ लेकिन पार्टी के अंदर उनका क़द ऊंचा हुआ।

तांबे साफ़ बोलने वालों में से हैं। अपनी पार्टी की आलोचना से भी नहीं पीछे हटते, ‘हमने देखा है कि जहां कांग्रेस कई सालों तक सत्ता में नहीं रही, वहां नेताओं और कार्यकर्ताओं को सिर्फ हवाबाज़ी करते देखा। केवल नेतागिरी करते देखा। ग्रासरूट तक मजबूत नहीं काम करते हैं। इसलिए जब तक वे स्थानीय लोगों और स्थानीय श्रमिकों से नहीं जुड़ेंगे और अपना आधार मजबूत नहीं करेंगे, तब तक वे सफल नहीं होंगे।’ तांबे महाराष्ट्र कांग्रेस को संगठित और कार्यकर्ताओं जुड़ी पार्टी मानते हैं। ‘महाराष्ट्र में हम एक संगठन के रूप में मज़बूत हैं, यहाँ हमारे संबंध कार्यकर्ताओं के साथ बहुत मज़बूत हैं जो कहीं और मौजूद नहीं हैं।’ इन दिनों वो महाराष्ट्र यूथ कांग्रेस के अध्यक्ष की हैसियत से पार्टी के ‘चलो पंचायत’ अभियान का नेतृत्व कर रहे हैं जिसका लक्ष्य पांच करोड़ लोगों तक पहुंचना है। वे कहते हैं, इस चलो पंचायत अभियान में हम लोगों को पांच मुद्दों से आगाह कर रहे हैं-

 बेरोज़गार युवा पंजीकरण
किसान शक्ति कार्ड पंजीकरण
किसान कर्ज़ माफ़ी

रियलिटी चेक कर रहे हैं कि बीजेपी ने जो भी चुनावी वादे किए थे उन्हें कितना पूरा किया है। प्रत्येक गाँव में हम युवा कांग्रेस के द्वार खोल रहे हैं और  गांवों की समस्याओं को दर्ज कर रहे हैं। साल 2014 के लोकसभा चुनाव में महाराष्ट्र की 48 सीटों में से कांग्रेस को केवल दो सीटें मिली थीं। तांबे के अनुसार महाराष्ट्र में कांग्रेस के इस ख़राब प्रदर्शन के कई कारण थे जिनमें से एक अहम वजह थी युवाओं और पहली बार वोट डालने वालों का नरेंद्र मोदी की तरफ़ झुकाव। तांबे इन युवाओं को कांग्रेस की तरफ़ लाने के एक बड़ी चुनौती भी मानते हैं और प्राथमिकता भी। राज्य में विधानसभा का चुनाव आम चुनाव के कुछ महीनों के बाद ही हुआ था। उसमे भी सत्तारूढ़ कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के गठबंधन को हार का सामना करना पड़ा था। उस समय महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चौहान थे।

वो इस हार की वजह बताते हुए कहते हैं, ‘महाराष्ट्र में कांग्रेस का दबदबा पहले से है। लेकिन 1999 में कांग्रेस में विभाजन के बाद पार्टी अपने दम पर सत्ता में नहीं आयी है। हमने इससे पहले राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के साथ मिलकर चुनाव (विधानसभा का) लड़ा है। और हम जीतते रहे हैं। लेकिन 2014 के विधानसभा चुनाव में एनसीपी ने हम से अलग होकर चुनाव लड़ा। हम हार गए।’

पिछले चुनाव में कांग्रेस का प्रदर्शन ख़राब ज़रूर रहा था, लेकिन आम तौर से महाराष्ट्र को कांग्रेस का गढ़ माना जाता है, जहां इसका 135 साल पहले जन्म हुआ। महाराष्ट्र में कांग्रेस पार्टी तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, ओडिशा और उत्तर प्रदेश की तरह कमज़ोर कभी नहीं हुई। कहा जाता है कि इसके पीछे यहाँ के दशकों पुराने सहकारी आंदोलन का हाथ है, जिससे लाखों किसान जुड़े हैं।

ये एक तरह से एक बड़े वोट बैंक की तरह हैं। इस आंदोलन की स्थापना कांग्रेस पार्टी ने ही की थी। दूध, चीनी और कपास वाले इस क्षेत्र ने कांग्रेस के कई बड़े नेता पैदा किए। महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण कहते हैं, ‘यहाँ पर कोऑपरेटिव मूवमेंट जो चल रहा है, इस सहकारी आंदोलन में कांग्रेस के नेताओं ने बहुत अच्छा काम किया है। खास तौर से ग्रामीण अर्थव्यवस्था में। चीनी, डेयरी, कपास हो, बैंक हो, शिक्षा का क्षेत्र हो, इनमें कांग्रेस पार्टी ने बहुत बुनियादी काम किया है। इसका फ़ायदा हमें अब भी मिल रहा है।’

पृथ्वीराज चह्वाण एक राजनीतिक परिवार से हैं, उनके माता और पिता दोनों कांग्रेस के बड़े नेता माने जाते थे। उन्होंने कांग्रेस का सुनहरा दौर देखा है। तब और अब की कांग्रेस के बारे में वो कहते हैं, ‘उस समय कोई बड़ा विपक्ष नहीं था। केवल कुछ समाजवादी पार्टियाँ थीं। केवल हाल ही में बीजेपी एक बड़ी चुनौती के रूप में उभरी है।’

पृथ्वीराज चह्वाण के अनुसार कांग्रेस का सब से बड़ा दुश्मन खुद कांग्रेस ही है, ‘कांग्रेस का विरोधी दल ख़ुद कांग्रेस थी। आपसी फूट और मतभेद के कारण पार्टी को नुक़सान हुआ।’

लेकिन महाराष्ट्र में पार्टी का दबदबा कभी कम नहीं हुआ है। इलाक़े के कांग्रेस विधायक के मुताबिक़ पार्टी ने महाराष्ट्र और देश को बड़े-बड़े नेता दिए हैं जिनका योगदान पार्टी, राज्य और पूरे देश के लिए था। वो कहते हैं, ‘हमारा ऊंचे क़द के नेता यहाँ हमेशा से रहे हैं, जैसे कि यशवंत राव चह्वाण, वसंत राउ नायक, वसंत दादा पाटिल। ये लोग प्रगतिशील और विकास पुरुष थे इसलिए कांग्रेस ने यहां अच्छा प्रदर्शन किया है।’ इस बार कांग्रेस और एनसीपी पहली बार लोकसभा का चुनाव एक साथ मिलकर लड़ रही हैं। अब तक दोनों पार्टियों ने 48 सीटों में से 40 पर समझौता होने की घोषणा कर दी है। विधायक कहते हैं कि गठबंधन समय का तक़ाज़ा है, ‘हम अपने दम पर चुनाव नहीं लड़ सकते। एनसीपी के साथ हमारा गठबंधन होगा। हम कड़ा मुक़ाबला देंगे (बीजेपी-शिव सेना को)। हमारी टैली अच्छी होगी।’

कांग्रेस के कार्यकर्ता अभी से चुनावी प्रचार में जुट गए हैं। पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं में जोश है। लेकिन वो ये भी जानते हैं कि महाराष्ट्र में पिछले चुनाव में आयी मोदी लहर का असर अब भी बाक़ी है।

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