तभी नहीं मनता ‘हिंदी पत्रकारिता दिवस’

श्रुति व्यास
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(image) क्या आपको मालूम था कि 30 मई को ‘हिंदी पत्रकारिता दिवस’ था? शायद ही पता रहा हो। ‘हिंदी पत्रकारिता दिवस’ को लेकर किसी ने कोई ट्वीट नहीं किया। लेकिन हां, यह कह सकती हूं कि तीन मई को ‘वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम डे’ यानी ‘विश्व प्रेस आजादी दिवस’ की याद सबको थी। खूब ट्वीट हुए, अखबारों में लेख भी छपे। भारत में इसका जम कर प्रचार हुआ। कुल मिला कर जोर-शोर के साथ टवर्ल्ड प्रेस फ्रीडम डेट मनाया गया। दरअसल सिर्फ ‘वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम डे’ ही एक ऐसा दिवस है जिसके मायने नागरिक समाज से लेकर राजनेता और आम जनता तक बखूबी समझती है। यही ऐसा दिवस है जो प्रेस की आजादी, पत्रकारिता के पेशे और पत्रकार के कर्म की अहमियत को लोगों को समझाता है। विश्व प्रेस आजादी दिवस किसी भी पत्रकार के लिए न सिर्फ गर्व करने का दिन है, बल्कि यह हमारे लिए अपने भीतर झांकने का भी दिन है। तो फिर सवाल है कि ‘वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम डे’ जैसा उत्साह और जोश 30 मई को होने वाले ‘हिंदी पत्रकारिता दिवस’ के दिन क्यों नहीं जाहिर हुआ? क्या ऐसा नहीं हो सकता था कि हम 30 मई को हिंदी पत्रकारिता की 188वीं सालगिरह ठीक वैसे ही मनाते, जैसे दुनिया भर में प्रेस की आजादी का झंडा बुलंद करते हुए होता है। पत्रकारों की जमात में ही कोई क्यों नहीं जानता इस दिन विशेष के बारे में? आखिर ऐसा क्यों है कि राष्ट्रवादी बनने का दावा करने वाले अंग्रेजी के अखबार भी हिंदी के योगदान की चर्चा करना जरूरी नहीं समझते ? लगता है इसका एक बड़ा कारण ये है कि हिंदी पत्रकारिता का पेशा वैसी चमक-दमक वाला नहीं बन पाया है जो कि अंग्रेजी की पत्रकारिता का है। ये कुछ ऐसे गंभीर सवाल हैं जो हमारी व्यवस्था के असली चेहरे की ओर इशारा करते हैं। और उस माहौल को दिखाते हैं जिसमें हम लक्ष्हीन गोते लगा रहे हैं। मैं इस बारे में अपना एक तजुर्बा बताना चाहती हूं। बात तब की है जब मैं विदेश में थी। कालेज के दिन थे। अलग-अलग मुल्कों से आए दोस्त, सबकी भाषा-नागरिकता अलग। इनमें चीनी, अफ्रीकी, इटैलियन सब थे। एक दिन चाय पर बैठे चर्चा कर रहे थे। और हम सबके बीच संवाद का एकमात्र जरिया अंग्रेजी थी। फिर भी चीनी दोस्त मेंड्ररिन में और इटली वाला अपनी भाषा में बोल जाता था। लेकिन हम भारतीय अंग्रेजी में ही संवाद करते रहे। जब हम चलने को हुए तो मेरे इटली वाले दोस्त ने मुझसे आकर पूछा- अरे, आप लोग अपनी भाषा में बात क्यों नहीं करते? उसकी इस बात ने मुझे भीतर से झकझोर कर रख दिया था। लाजिमी था ऐसा होना। पर ये तब की बात थी। कुछ सालों के बाद मुझे इसका जवाब मिल गया है। लुटियन की नई दिल्ली में कई तरह की सभाओं-मीटिंगों, मेल-मुलाकातों में मैंने यह महसूस किया कि अंग्रेजी का भूत हर जगह बुरी तरह से हावी है। व्यवस्था की जड़ में गहरी पैठ बना चुकी है अंग्रेजी। इन जगहों पर मैंने पाया कि यहां हर जगह अंग्रेजी के पत्रकारों का ही दबदबा है। प्रिंट हो या इलैक्ट्रानिक, राजनीति कवर करने वाले पत्रकार हों या राजनेता, सब जगह अंग्रेजी बोलने वाले ही छाए हुए हैं। चाहे आपसी बातचीत हो, या कोई संवाद-चर्चा, सब अंग्रेजी में। अगर आप अंग्रेजी नहीं बोल पाते हैं तो आप उस भीड़ का हिस्सा नहीं बन सकते। लेकिन इस अंग्रेजी बोलने वाली भीड़ में मैं अपने पिताजी को अकेले देखती हूं जो अकेले हिंदी की वकालत करते हैं और अंग्रेजी के उस अभिजात्य समूह में हिंदी पत्रकारिता बिरादरी वालों की नुमाइंदगी करते हैं। मेरे लिए यह गर्व की बात है। लेकिन कई बार हताशा भी पैदा करती है। जो लोग हिंदी पत्रकारिता के अगुआ हैं वो अपनी ही जमात में रहते हुए भी बाहर हैं। और यह वाकई बहुत ही पीड़ादायक हकीकत है। अगर राजनीति के गढ़ दिल्ली में, जहां सभी संस्कृतियां और भाषाएं देखने को मिलती हैं, सिर्फ अंग्रेजी और इसका मीडिया ही सर्वोच्चता का मजा ले, तो इससे इस बात का अहसास हो जाएगा कि किस तरह हमने अपने माहौल और व्यवस्था को खत्म कर डाला है। अंग्रेजी को एक भाषा से कहीं ज्यादा वजनदार बनाते हुए उसे ऐसा बना डाला और फिर उसे आत्मसात भी कर लिया। इस बारे में टाइम्स ऑफ इंडिया में इंद्रजीत हाजरा के लिखे लेख का जिक्र करना यहां जरूरी है। हाजरा ने लिखा था- “जैसी कि ये सच्चाई है कि बहुभाषी भारत के लिए अंग्रेजी न सिर्फ संपर्क भाषा है, बल्कि ये सत्ता की भी भाषा है। इसका इस्तेमाल, खासतौर से जो अंग्रेजी माध्यम की शिक्षा के साथ एक ऐसा भरोसा लेकर आता है कि इसका इस्तेमाल सुदर्शन चक्र की तरह किया जाएगा और इसके सामने वाला निहत्था होगा।” अंग्रेजी के साथ सत्ता और सत्ता से अंग्रेजी कैसे जुड़ी है, ये हाजरा के इस लेख से पता चलता है। हमने अंग्रेजी को सुर्दशन चक्र बना दिया है! ठीक है, अंग्रेजी महत्त्वपूर्ण है। दुनिया भर में ज्यादातर लोगों की भाषा है। दुनिया के कारोबार के लिए ये जरूरी भी है। पर क्या ये जरूरी है कि ये हमारी संस्कृति का हिस्सा भी बन जाए? और वह संस्कृति फिर मातृ भाषा को ही भुला दे! दरअसल बात यह है कि हम खुद अंग्रेजी को इस कदर आत्मसात कर चुके हैं कि हमें खुद नहीं पता कि हमारी अपनी मातृ भाषा की जड़ें कहां हैं? हम अंग्रेज बनने के लिए पैदा नहीं हुए थे। हमारा जन्म तो देसी बनने के लिए ही हुआ था। पर हमने अपने देसीपन को अपनाने के बजाय सत्ता की उस विदेशी भाषा को अपनाना पसंद किया है जो हम पर राज करती है। भारत जैसे बहुभाषी देश में हमारी पहली भाषा अंग्रेजी है, हिंदी या और कोई प्रांतीय भाषा नहीं। अंग्रेजी नहीं आती तो बड़ी समस्या हो जाती है और मन-मस्तिष्क हीनता से भर जाता है, पर अगर हिंदी नहीं तो तो कोई फर्क नहीं पड़ता, चलता है यार । ये स्थिति इसलिए बन गई है कि क्योंकि अंग्रेजी का भूत हम पर हावी है। हम उस अंग्रेजी संस्कृति और मानसिकता में अपने को इस कदर रचा-बसा चुके हैं कि उससे बाहर निकलने की कल्पना भी नहीं कर सकते। इसकी वजह यह है कि हम अंग्रेजी के महिमामंडन और उसके मोहपाश में जकड़ गए हैं। और ऐसा क्यों नहीं होगा जब हाजरा जैसे लेखक अंग्रेजी के प्रबल पक्षधर होंगे। अंग्रेजी में सोचेंगे उसी में लिखेंगे। यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण और दुखद है कि हमारे लेखक, पत्रकार अंग्रेजी के महिमामंडन और आकर्षण से मुक्त नहीं हो पाते और इसके पीछे ऐसे तर्कों का इस्तेमाल करते हैं जिनका कोई मतलब नहीं है। इसका नतीजा यह हुआ है कि अंग्रेजी मानसिकता वाले वर्ग को फिजूल की अहमियत मिलती चली गई। इसी का नतीजा रहा कि सत्ता प्रतिष्ठान को अंग्रेजी मीडिया घरानों और अंग्रेजीदां पत्रकारों का अनवरत समर्थन जारी है। इसलिए अंग्रेजी मीडिया की ताकत को असरदार माना जाता है। आज की पीढ़ी ट्वीटर और फेसबुक वाली है। सोशल मीडिया पर अंग्रेजी के शब्द और रायशुमारी में वह अपने को फौरन शामिल करती है। नतीजा क्या होता है इसका? हिंदी बोलने वाला प्रधानमंत्री और अंग्रेजी का लेखक या पत्रकार जो प्रतिष्ठा यहां पा रहा है, वैसी हिंदी के पत्रकार को नसीब नहीं है। भारत में आज भी बड़ी संख्या में ऐसे पत्रकार हैं जो हिंदी या दूसरी भारतीय भाषाओं में लिखते-पढ़ते हैं और बोलते हैं। लेकिन उनकी पहचान नहीं बन पाई। हिंदी में बहुत ही कम ऐसे लेखक हैं जिनकी खासी पहचान है और अपने लेखन के बल पर जाने जाते हैं। यही वजह है कि 30 मई को हिंदी पत्रकारिता दिवस के रूप में कोई नहीं जानता। और इस बात की बूहुत संभावना है कि अगले साल भी कोई इस दिन को याद नहीं रख पाएगा। पर मैं इसे लेकर कभी निराश होने वाली नहीं हूं। एक दिन हिंदी को ( और हमारी सभी भारतीय भाषाओं को) वो स्थान जरूर मिलेगा जो उनके लिए है और वजह आगे का तकनीकी विकास है।
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