लट्टू हुए लोग हैं उपलब्धि!

श्रुति व्यास
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(image) जब कोई परंपरा लंबे वक्त से चली आ रही होती है तो हम मानने लगते हैं कि यह तो कुदरत का खेल है और ऐसा होना लिखा था। यह बात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कामों के मील के पत्थरों पर गौर करने से बखूबी समझ आएगी। वैसी ही कुछ तस्वीर उभरेगी। उस नाते नरेंद्र मोदी के बतौर प्रधानमंत्री तीन साल पूरे कर लेने का मुकाम कोई अलग नहीं है। ऐसे में चलते आ रहे रिवाज के मुताबिक अब यह तो जरूरी होगा कि प्रधानमंत्री मोदी की ‘उपलब्धियों’ का चौतरफा जोरदार गुणगान हो। तरह-तरह के जुमलों, रूपकों में वाह, वाह हो। पहले भी होता था तो अब क्यों न हो? परंपरा को आगे ही बढ़ाना है।सवाल है क्या प्रधानमंत्री की वाकई ऐसी कोई उपलब्धि है, जिसका ढिंढोरा महिमामंडन और जश्न के गाजे-बाजे से हो? क्या भारत इन तीन सालों में जरा भी आगे बढ़ा है? क्या हम अपेक्षाकृत मायने में भी ‘स्वच्छ भारत’ में रह रहे हैं? क्या लोगों को रोजगार मिला है? ऱोजगार अवसरों की बाढ़ आई हुई है? इससे भी ज्यादा महत्त्वपूर्ण सवाल है कि क्या वाकई भारत आज चमक रहा है? वाकई ‘इंडिया शाइनिंग’ है? ये ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब कोई हां में नहीं निकलेगा। लेकिन भले न निकले, भले मैं ऐसे सोचंू या आप भी ऐसा सोचने वाले हों लेकिन आम जनता, जनता जर्नादन तो ऐसा नहीं सोचती। वह तो लट्टू है और तीन साल के बाद भी ऐसा होना क्या उपलब्धि नहीं है? जनता को भी भले प्रधानमंत्री से वह नहीं मिला हो जो सोचा था, जो कहा था पर वे अभी भी उनकी, अकेली उम्मीद हैं। उनके लिए नरेंद्र मोदी अभी भी नाटकीय रूप से चमत्कारिक नेता बने हुए हैं। जनता को यह परवाह नहीं है कि कौन सी योजना परवान चढ़ी या उन समस्याओं में क्या कुछ हुआ जो विरासत में मिली हुई थी। उन्हें यह परवाह नहीं है कि भारत स्वच्छ हुआ या नहीं या भारत कितना स्वच्छ बना है। उन्हें इस बात की भी फिक्र नहीं है कि ‘मेक इन इंडिया में’ हम क्या और कितना बना पाए हैं। उन्हें इस बात की भी चिंता नहीं है कि नोटबंदी की विपदा से क्या हाल हुआ और न ही उन्हें रोजगार या बेरोजगारी की चिंता है। उन्हें इन सबकी परवाह नहीं है, वे निश्चिंत हैं। इसलिए कि नरेंद्र मोदी ने वह राग, वह सुर छेड़ा हुआ है जिसमें हर कोई माने बैठा है कि हम होंगे कामयाब एक दिन.. भारत और भारत की जनता तर्क में नहीं जी रही है, वह उपलब्धियों में नहीं जी रही है वह इस विश्वास मे जी रही है कि नरेंद्र मोदी ही वे शख्स हैं जो भारत को महान बनाने में अपनी जी-जान लगा देंगे। मोदी ही ऐसे व्यक्ति हैं जिनके पास भारत की हर समस्या का जवाब और समाधान है। इसलिए तीन साल में मोदी और उनकी सरकार का जो काम, जो उपलब्धियां हैं उससे भले स्वच्छ भारत, रोजगार, सस्ती हुई चीजे न दिखे और हकीकत चाहे जो समझ आए लेकिन भारत की बडी आबादी इस पक्के भरोसे में है कि नरेंद्र मोदी अपना कहा हुआ सच करके दिखा देंगे। तभी 2017 के भारत में भी मोदी सन 2014 के माहौल को बनवाए हुए हैं। वैसा ही राग है तो सुनने वाली जनता भी वैसी ही है। उन्हें पता है कि लोगों की उन उम्मीदों और सपनों को पूरा करना है जिसका वायदा, जिसकी बुनियाद 2014 में रखी थी। और मजेदार बात है कि उस सबमें नरेंद्र मोदी के आज के स्वर पहले से कहीं ज्यादा दमदार हैं। अपनी दमदार आवाज से वे सर्वव्यापी और सर्वशक्तिमान के रूप में अपने को ज्यादा स्थापित कर चुके हैं। वे एक ऐसी ताकत हो गए हैं कि जो कह दिया वही सही। इस भरोसे का अहसास उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान प्रदेश में घूमने के वक्त मुझे बखूबी हुआ। नौजवानों से खास कर। देखने में आया कि ये लोग खुद अपने से अपने दिमाग में नई सोच लेकर चल रहे हैं। ये हालात का विश्लेषण करने में अपने को सक्षम समझते हैं। इनमें मोदी के करिश्मे का असर ऐसा चढ़ा है कि उससे किसी इधर-उधर की बात से छुटकारा नहीं पा सकते। इनमें से कुछ कालेज में पढ़ने वाले छात्र मोदी को लेकर इसलिए अभिभूत समझ आए क्योंकि इन्होंने मान लिया है कि मोदी की अगुआई में भारत ने दुनिया में अपनी एक अलग पहचान बना ली है। सो नरेंद्र मोदी न केवल स्पष्ट रूप से, राजनीतिक रूप से अपनी ताकत कायम करने में कामयाब हैं, बल्कि मीडिया, सोशल मीडिया, पार्टी पर नियंत्रण, नेतृत्व सब मामलों में वे पहले से ज्यादा संकल्पवान और साहसी साबित हो रहे हैं। कोई शक नहीं कि आगे बढ़ने का जो हुंकारा उन्होंने 2014 में भरा था, उस रास्ते से वे लगातार बढ़ रहे हैं। इसके अच्छे-बुरे कई असर हैं। एक नतीजा तो यह है कि उन्होंने एकतरफा, वन वे व्यवस्था बना ली है। ऐसी नई दुनिया जिसमें सिर्फ एक खास तबके में एकतरफा संवाद ही सबकुछ है। और धन्य है सोशल मीडिया जो पल-पल की हर तरह की सूचना, खबर, विचार, राय याकि सब कुछ आम आदमी को स्मार्टफोन और सोशल मीडिया से मुहैया करा रहा है। इसका दुष्परिणाम भी है। और वह बौद्धिकता का गर्त में जाना है। आज आप किसी से यह पूछिए कि आपने फलां लेख या कोई किताब या कुछ पढ़ा है, तो आप महसूस करेंगे कि सबकुछ सपाट, निराकार हो गया है। विचारशून्यता घर कर गई है। मोदी एक राजनेता के रूप में सफल हैं, जनता में आस्था पैदा करने में समर्थ हैं। राजनैतिक कौशल से भ्रम, पेंतरों से वे वोट हासिल करते रहेंगे। पर इस सबसे, देश के प्रधानमंत्री के रूप में क्या वे नई इबारत लिखेंगे? तीन साल पहले मुझे लगा था और मैंने लिखा था कि नरेंद्र मोदी में मारग्रेट थैचर और रोनाल्ड रेगन जैसी स्पष्टता, दो टूक पना, ऊर्जा और उत्साह है। मोदी चतुर और बहुमुखी हैं और वे ऐसे ठोस कदम उठा सकते हैं जो भारत को आगे ले जाने के अदम्य साहस और इच्छा लिए होंगे। दरअसल एक सफल कहानी के लिए ये सब जरूरी तत्व हैं। और मोदी में तब लगा था कि वे साहस के साथ उम्मीदों को पूरा करने की कहानी लिखेंगे। लेकिन आज माहौल यह है कि बातों का, योजनाओं का ढेर है। एक बात सधती नहीं कि दूसरी शुरू हो जाती है। तर्क की जगह कुतर्क की जीत है और जिस व्यवस्था, जिस मानव संसाधन से इबारत लिखी जाती है वह या तो है नहीं या है तो बुझे मन वाली है। ऊपर से तस्वीर में कही कोई दूसरा है भी नहीं!
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