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न कहानी बन रही न आइडिया!

श्रुति व्यास
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कहते हैं महाकवि, उपन्यासकार, नाट्यलेखकों का गढ़ा चिरस्थायी लेखन, उनकी बताई कहानी, नैरेटिव देश विशेष की पहचान, उसकी परिभाषा लिए होती है (भारत के संदर्भ में सोचे वाल्मीकि, वेद व्यास, कालिदास..)। अक्सर यह नैरेटिव अतिरंजित होता है, कई बार विवादित होता है और अक्सर वक्त के साथ बदलता रहता है। यह बदलाव कभी कभी अच्छा होता है पर ज्यादातर समय बुरा होता है। जैसे भारत को लेकर दुनिया की सुनी हुई कहानियां हैं। हाल की सदियों में असंख्य कवियों, कहानीकारों, घुमक्कड़ लेखकों, फिल्मकारों (इनमें असंख्य विदेशी) ने सीरिज में भारत की पहचान का नैरेटिव बनाया। वह नैरेटिव, विमर्श जिसमें भारत गरीब है, गंदा है, आबादी से भरा पड़ा है और जो खुद अपनी रीति-नीतियों से अपने को खाली, खोखला बनाता जा रहा है!

हां, बहुत समय से- तब भी जब आर्थिक तौर पर भारत ताकतवर बनने लगा, हम यह एकपक्षीय कहानी पुराने गंदे-खुरदरे रिकार्ड की तरह बार-बार लगातार सुनते-सुनाते रहे हैं। 

लेकिन कहानी के रचियता कलाकार, सृजक ही नहीं होते, नेता और नियंता भी उसमें योगदान देने वाले होते हैं तो उसके औजार भी। आखिर कुछ भी हो नेता जो कहानी गढ़ते हैं, बनाते हैं वह इसलिए सशक्त, आधारपूर्ण होती है क्योंकि वह ‘हम’ लोगों की अनिवार्य कहानी लिए होती है।

दुर्भाग्यवश भारत में, हम सब इससे अरसे से वंचित रहे। हमें बताने वाले, हमारी कहानी जहां निरंतर बाहरी लोग लिखते-बताते रहे वहीं अपने नेता मौन, मूक और सृजनविहीन रहे। मतलब ‘हमे’ पुनर्परिभाषित करने, हमारा, हमारे देश का नया नैरेटिव बनवाने में असमर्थ और मूक!

वह स्थिति एकदम बदली 2014 में! मंच पर आया एक बड़ी गाथा सुनाने वाला, ग्रैंड स्टोरीटेलर! जिसने बताया कि वह गढ़ेगा नई कहानी! वह बदलेगा पुरानी कहानी और भारत की बनाएगा नई, चमचमाती, शाईनिंग कहानी! तभी हम सवा सौ करोड़ भारतीयों ने नरेंद्र मोदी में ‘अपने’ को देखा। हम जो चाहते हैं, हमें जो सुनना है, जो पाना है, अपनी जो कहानी बनानी है उसका सच्चा कथाकार है यह नरेंद्र मोदी!

उस नाते 2105 में नरेंद्र मोदी ने जब बतौर प्रधानमंत्री एक साल का कार्यकाल पूरा किया तब मैंने लिखा था, कोशिश की थी यह तलाशने की कि नरेंद्र मोदी नाम के नए कथाकार ने भारत की नई कथा, नए नैरेटिव के लिए जो कलम पकड़ी है तो उसमें क्या लिखा जा रहा है? मैं संजीदगी से तब विश्वास (और अब भी) करती थी कि भारत ने ऐसा मंत्रमुग्ध बना देने वाला, लाइवली कथाकार पहले नहीं पाया जो नरेंद्र मोदी के नाते अब प्राप्त है। उनमें वे तमाम खूबियां हैं जो एक असरदार, मनभावक कथाकार में होती हैं। उन्हें पता है कि कब विराम लें, कब भावुक हुआ जाए, अपने और अपने देश के संघर्ष को गिनाया जाए और उसमें संकल्प गुंथ कर दर्शाया जाए। 

हां, संपूर्ण कथा, परफेक्ट नैरिटिव रचने, लिखने के जरूरी सभी कोर तत्वों को लिए हुए कथाकार!

पर एक साल के उस मौके पर कथाकार की बनती कहानी की तलाश में वक्त के संदर्भ ढूंढने की मेरी कोशिश पर तब कहा गया कि इतनी जल्दी ठीक नहीं है। तभी मेरा विचार भी बना कि अभी उम्मीद के दरवाजे पर इंतजार किया जाना चाहिए। 

और आज चार साल हो गए हैं। मैं फिर कहानी समझने की कोशिश में हूं!

निसंदेह चार सालों में नरेंद्र मोदी ने अपनी कहानी को, नैरेटिव की भुजाओं को कसते हुए उसे अपनी कहानी, अपनी सरकार की कहानी को देश के नैरेटिव में परिवर्तित करने की जिद्द में बदला है। अंतरराष्ट्रीय संदर्भ में हमें कथा के अलग-अलग हिस्सों से अहसास कराया जा रहा है कि प्रधानमंत्री बदलती विश्व व्यवस्था में भारत का नया, बड़ा रोल बनवा दे रहे हैं। यहीं कहानी का चटकता वह हिस्सा है, जिससे कथाकार भारत के लोगों में यह कौतुक पैदा किए हुए है कि वाह क्या बात!

मगर घरेलू और आर्थिक मामलों या शायद इन दोनों के बीच में नरेंद्र मोदी कथा का अपना कथानक, प्लॉट गंवा बैठे हैं। उनका नेतृत्व, उनकी नेतागिरी अधिकतम सीमा को छूकर चुनाव जीतने के सर्वोच्च लक्ष्य में बंध गई है। वे नेता मैक्सिमम हैं, जिसका ध्येय सिर्फ चुनाव है! सो, पार्टी का प्रबंधन, पार्टी को पूरे देश का बना डालने में सब कुछ सिमटा हुआ है। भारत की नई कहानी के लिए उनकी कलम से निकले मेक इन इंडिया, डिजिटल इंडिया, स्टार्टअप इंडिया, स्मार्ट सिटी, स्वच्छ भारत सब नगाड़ों के शोर में खोए जुमले हैं। नगाड़ों के शोर में न्यू इंडिया की नई धुन यों कथानक में उम्मीद का सस्पेंस बंधाने, बनाने का नया मोड़ है लेकिन सुनने वाले हम, भारत के लोग भी तो महसूस कर रहे हैं कि न्यू इंडिया के लिए आर्थिकी में भला भाप कहां बची है? उस आर्थिकी में न्यू इंडिया कैसे संभव है, जिसका नोटबंदी ने बेड़ा गर्क किया, जो जीएसटी के अराजक क्रियान्वयन से ठिठकी हुई है। कैसे तब न्यू इंडिया जब अभिव्यक्ति की आजादी स्मृति ईरानी जैसों से घुटी हुई है, जिसकी उद्यमशीलता, काम करने का जोश सब चोर करार दिए जाने वाली सरकार की प्रवृति और इनकम टैक्स के नोटिसों से दबी पड़ी है।

सो, ये चार साल! क्या लगता नहीं कि 2014 में भारत के मंच पर अवतरित बड़ा कथाकार बिना इस समझ के है कि विजन क्या, नीतियां क्या, साहस कैसे और जुमलेबाजी किधर ले जा रही है उसकी बनाई जा रही कथित कहानी को?  

कथा प्रारंभ इस आशा से था कि नरेंद्र मोदी हमें, हम लोगों को पुराने नैरेटिव से बाहर निकाल नए सूत्र देंगें, जिस पर हम सब, सवा सौ करोड़ लोग मंत्रमुग्ध विचार, मनन को प्रेरित होंगे। वे हमें ऐसी कहानी देंगें, जो हमें निज आग्रह-पूर्वाग्रह से ऊपर उठा तर्क, बुद्धि की गूंज वाले नए इतिहास चैंबर में हमारा प्रवेश करा हमें गौरवान्वित बनवाएंगी। 

लेकिन आज जिस मुकाम पर ‘हम’, मैं हूं उससे लगता है कहानी बेतरतीब हो गई है। वह खो गई है जुमलेबाजी के अराजक प्लॉट में, गुत्थियों में, मझधार में! कहानीकार मंच पर है, ठसके से है, दबंगी से है लेकिन उसके सुनाए जा रहे, बनाए जा रहे नैरेटिव में न उद्देश्य है और न गति। कहानीकार अब कहानी बनाने वाला, दुनिया को भारत की नई कथा बताने वाला नहीं रहा, बल्कि वह परफॉर्मर, एक प्रदर्शक हो गया है। वे भारत के लोगों को भारत की नई कहानी बताते हुए अब लोगों को मंत्रमुग्ध नहीं बना रहे हैं, बल्कि अपने को प्रदर्शक, अभिनेता प्रधानमंत्री बना बैठे हैं। मंच पर प्रधानमंत्री का ध्येय लोगों में यह भरोसा भर बनाने का बच गया है कि उन पर भरोसा करें कि वे अच्छे परफॉर्मर हैं। कुछ मुहावरे, छोटी-छोटी कुछ बातें, पंचलाइन, ताली बजा किसी पर कटाक्ष तो किसी को खलनायक बना कर वह सब करना, जिससे लगे कि वे दूसरों से बेहतर परफॉर्मर हैं! 

उनकी इस कोशिश में वह आइडिया गुल है, लुप्त है, जिसने कभी नए आइडिया ऑफ इंडिया का आशावाद बनाया था। जिसने नरेंद्र मोदी की कलम से भारत की नई कहानी लिखे जाने की उम्मीद में हम लोगों को मंत्रमुग्ध बनाया था।      

नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री हैं और जैसा की कई राजनीतिक पंडित, भक्त बता रहे हैं वे लगातार शायद कुछ साल प्रधानमंत्री रह सकते हैं लेकिन बतौर श्रोता, देश-दुनिया उस अच्छी कहानी को नहीं पाने वाली है, जो देश की नई परिभाषा बनाने का रोमांच लिए हुए हो। और यह त्रासद होगा- इसलिए कि वह व्यक्ति जो इनसाइडर होते हुए भी बाहरी लोगों की निर्ममता का अनुभव लिए हुए है वह ‘वह’ कहानी नहीं गढ़ पा रहा हैं, जो सुसंगत, ध्यान बांधती अनिवार्यतः वह नैरेटिव लिए हो जो खुद उसके इतिहास को बतलाने वाली हो तो ‘हमारे’ लिए भी हो!

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