मी टू से निकलते कई सवाल

श्रुति व्यास
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यौन उत्पीड़न के खिलाफ मी टू अभियान जोर पकड़ चुका है। पिछले साल अमेरिका से शुरू हुए इस अभियान ने आज भारत में कई नामी-गिरामी लोगों को अपनी जद में ले लिया है। इसमें फिल्म, राजनीति, माडिया, कला, साहित्य जैसे क्षेत्रों की दिग्गज हस्तियां भी शामिल हैं, जिन पर यौन उत्पीड़न के आरोप हैं। धन्य हो एलीसा मिलानो का, जिन्होंने पिछले साल न्यूयार्क टाइम्स के माध्यम से अपना यौन उत्पीड़न करने वाले हॉलीवुड के प्रोड्यूसर हार्वे वाइंस्टीन के खिलाफ खड़े होने की हिम्मत जुटाई थी। वह अभियान अब भारत में एक आंदोलन का रूप लेने की तैयारी में है। हालांकि अभी यह बिखरा हुआ है, पर सोशल मीडिया की बदौलत यह तेजी से संगठित रूप ले लेगा, इसमें कोई शक नहीं। जिन लोगों के नाम अभी तक सामने आए हैं, उनके करियर को इससे भारी धक्का लगा है। कईयों के काम छूटे हैं, आने वाले दिनों के लिए कॉंट्रैक्ट टूटे हैं और इससे भी ज्यादा यह कि अब तक जो शोहरत हासिल की थी, वह तो खाक में मिल ही गई है।

महिलाएं आज भारी गुस्से में हैं। बौखलाई हुई हैं। भारत में मी टू भले ही अपने शुरुआती दौर में हो, इससे लोगों की नींद तो उड़ ही गई है। इससे समाज में एक तरह की बेचैनी दिख रही है। इसके दो कारण हैं। एक तरफ नारीवाद है, जिसकी गूंज सिर्फ शहरी भारतीय महिलाओं की आवाज है और यह सीमित भी है। दूसरी ओर, अगर एमजे अकबर भारत के हार्वे वाइंस्टीन हैं तो फिर बहुत जल्दी ही अजीज अंसारी भी होंगे जिन्हें अन्यायपूर्ण तरीके से शर्मिंदगी का सामना करना पड़ा।

पहले जरा नारीवाद पर बात करें। भारत में नारीवाद की परिभाषा को बहुत ही जटिल बनाया हुआ है। इतना जटिल कि इसमें पाखंड ज्यादा है। और आश्चर्य और दुखद तो यह है कि यह परिभाषा खुद भारतीय अभिजात्य महिलाओं की गढ़ी हुई है। गांव-कस्बे की लड़कियां और महिलाएं तो जानती भी नहीं हैं कि आखिरकार नारीवाद होता क्या है? पारंपरिक रूप से तो नारीवाद का सीधा-सा सिद्धांत और अर्थ राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक रूप से लैंगिक समानता है। हालांकि यह सिर्फ सिद्धांत भर नहीं है। इसमें ऐसे तमाम विचारों का समावेश है जो महिला और पुरुषों में समानता सुनिश्चित करने के लिए समय-समय पर उठाए गए हैं। 

हालांकि दुनिया में नारीवादी आंदोलन दशकों पहले से चल रहे हैं, जिसमें महिलाओं को समाज में सम्मानजनक स्थान और समानता का दर्जा दिलाने के लिए महिलाएं और पुरुष मिलकर संघर्ष कर रहे हैं। इनमें उदारवादी, क्रांतिकारी, समाजवादी, मार्क्सवादी और व्यक्तिवादी सब शामिल हैं। सबका अपना अलग नजरिया है, लेकिन मूल सवाल लैंगिक समानता का ही है।

आज भारत की अभिजात्य महिलाओं के लिए नारीवाद पुरुष के प्रति नफरत का प्रतीक ज्यादा बनता जा रहा है, बजाय किसी गलत का विरोध करने के। इनके लिए नारीवाद महिलाओं की शक्ति दिखाने का हथियार है। मेनका गांधी को पसंद करने वाली नारीवादी महिलाएं हमेशा यह मानकर चलती हैं कि महिलाए ही सही हैं, भले ही वे गलत क्यों न हों। 

क्या‍ किसी ने सोचा है कि बिना सबूतों के सारे पुरुषों को जेल में क्यों ठूंस दिया जाना चाहिए? जब तक आप भारत में नारीवादी आंदोलन के औचित्य पर नजर नहीं डालेंगे, तब तक लैंगिक समानता के बारे में चर्चा बेमतलब ही रहेगी। क्या सारी महिलाओं ने कभी यह सोचा है कि समाज के भीतर पितृसत्तात्मकता की जड़ें कितनी गहरी हैं, जिसकी वजह से हम आज तक अपनी मानसिकता को बदल नहीं पाए हैं। ये बुनियादी सामाजिक व्यवस्था से जुड़ा मूल प्रश्न है।

दरअसल, समस्या यह है कि आज नारीवादी आंदोलन केवल शहरी और उच्च जाति की महिलाओं के अधिकारों और समस्याओं की ही वकालत कर रहे हैं। इसे ही महिलाओं का संघर्ष मान लिया गया है। लेकिन बुनियादी सवाल है कि आज भारतीय समाज में गांव से लेकर शहरों तक आम महिलाओं की जो स्थिति है उसके लिए ये नारीवादी आंदोलन एक दिखावे, ढोंग से ज्यादा कुछ नहीं हैं। जो महिलाएं पितृसत्तात्मक व्यवस्था में रह रही हैं और तमाम तरह की बेड़ियों में जकड़ी हुई हैं, उनके लिए कौनसा मीटू अभियान चल रहा है? या उनकी आवाज उठाने के लिए कौनसे चैनल बहस चला रहे हैं? क्या इस पितृसत्तात्मक समाज की ज्यादतियों के आवाज उठाने वाला कोई है?  

यौन उत्पीड़न के खिलाफ इस वक्त जो आवाज उठ रही है, उसके बारे में हमने अभी तक ट्वीटर या फेसबुक जैसे सोशल मीडिया मंच पर ही देखा-पढ़ा और सुना है, और इसमें सिर्फ मशहूर शहरी महिलाओं के चेहरे ही नजर आ रहे हैं। हमें विभिन्न धर्मों, समुदायों की उन सभी महिलाओं को इसमें शामिल करना होगा और बतौर सबूत सामने लाना होगा जो खौफनाक अन्याय की असली पीड़ा झेल रही हैं, जिनकी आवाज सुनने वाला कोई नहीं है, जो वाकई गरीब हैं, जिन्हें यातनाएं झेलनी पड़ रही हैं लेकिन उनकी आवाज हमारे कानों और सोशल मीडिया तक नहीं पहुंच रही। जब तक ये कहानियां सामने नहीं आतीं तब तक नारीवादी आंदोलनों और मीटू आंदोलन का मकसद पूरा नहीं होने वाला। मेनका गांधी ने हाल में जो कानूनी प्रावधान कर यह सहूलियत दी है कि दस से पंद्रह साल पुराने यौन उत्पीड़न मामले भी दर्ज कराए जा सकते हैं। यानी अब ऐसे मामलों का धमाका होगा, और हम शायद यह पता लगा पाएं कि कौन असली पीड़ित और कौन फर्जी।

जैसे ही मीटू ने जोर पकड़ा, मीडिया जगत में भी हलचलें तेज होती नजर आईं। तरह-तरह की चर्चाएं सुनने को मिलीं। जैसे- अकबर तो हमेशा करता ही ये रहता था, अब फलां का नंबर आने वाला है, अब इस पत्रकार का कच्चा चिट्ठा खुलेगा...। लेकिन इस पर चुप्पी अगर लग गई तो फिर बहस का रास्ता ही बंद हो जाएगा।

समस्या यह है कि आज भारत में महिलाओं के खिलाफ अपराधों से निपटने के लिए जो कानून बने हैं, उनका गलत इस्तेमाल ज्यादा हो रहा है, और चिंताजनक बात यह है कि खुद महिलाएं ही इसका दुरुपयोग कर रही हैं। इसीलिए सुप्रीम कोर्ट ने 498 ए को संशोधित करते हुए इसे नया रूप दिया था। तो फिर यह मीटू से अलग किस तरह होगा? इसीलिए भारत में मीटू आंदोलन के उठने को लेकर सवाल उठ रहे हैं और चिंता का विषय यहीं से शुरू होता है कि अगर कोई निर्दोष फंस जाता है तो वह कैसे अपने को सही साबित करेगा? ऐसे में एमिली लिनडिन ने ट्विटर पर जो लिखा ल वह वाकई काबिले गौर है- अगर किसी निर्दोष पुरुष की साख को धक्का लगता है तो मैं उसकी कीमत चुकाने को तैयार हूं।

तो फिर क्या यही नारीवाद है? क्या यही मीटू का मकसद है? इसमें कोई शक नहीं कि भारत में मीटू तेजी से चलेगा और सोशल मीडिया पर हमें ढेरों किस्से मिलेंगे। कुल मिलाकर गुस्सा फैलेगा और जल्द ही बड़ी बहस का विषय बन जाएगा। और फिर इसी बहस से नई बहस का जो रास्ता खुलेगा उसमें सवाल होगा कि हमें अब अपने व्यवहार के कौन से नए पैमाने गढ़ने चाहिए, जो समाज के स्वीकार्य हों, जिनकी हम जिम्मेदारी ले सकें।  

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