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खाली दिमाग बोलेगा या लाडली-लक्ष्मी?

श्रुति व्यास
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सन 2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी की दलील थी कि बदलाव लाओं ताकि अच्छे दिन आए। उन्होने लोगों में बदलाव की जरूरत बनाई। बदलाव की अहमियत बताई। तभी मतदान से पहले लोग परिवर्तन की बात करने लगे थे। वह कैसे हुआ, क्यों हुआ उसमें दस तरह की बातें है। कुल मिलाकर मोदी सफल और विजयी हुए। क्या बदलाव की वैसी जरूरत मध्यप्रदेश में फील होती है?  जवाब आसान नहीं है। इसलिए कि बेरोजगार, नौजवान, किसान कई जगह, एक अंदाज में बदलाव की बात बोलते है तो दूसरी और मौन मतदाताओं (खासकर महिलाओं, लडकियों) में शिवराजसिंह चौहान को ले कर जो संतोष दिखलाई देता है तो वह इस दलील के साथ है कि भला ‘मामा’ की जगह और क्यों?  

एक और अजीब पहलू है कि कांग्रेस बदलाव की बात करने वाले मुखर चेहरों के बीच भी नहीं है तो मौन महिलाओं के बीच भी नहीं है। शिवराजसिंह चौहान की ताकत का कोर आधार घर की महिलाएं और लडकियां है। 2006 की लाड़ली लक्ष्मी योजना से ले कर, साईकिल वितरण, लडकियों की शादी में सरकार से मदद ले कर रक्षा बंधन के मौके पर लाखों महिलाओं को पत्र भेजने, फिर स्वंय सहायता ग्रुप की महिलाओं के जरिए गांव-देहात में संपर्क का ऐसा ताना-बाना मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने अपने प्रंबंधन में बनवाया हुआ है कि उसंकी न कांग्रेस को खबर है और न उन तक पार्टी की पहुंच है।  

उस नाते जनता के बीच कांग्रेस निरपेक्ष नैरेटिव है। न कांग्रेस की मेहनत है और न उसका हल्ला। न लोगों के दिल-दिमाग में कमलनाथ या दिग्विजयसिंह या राहुल गांधी का चेहरा छाया हुआ है। कांग्रेस के पास न आक्रामक कार्यकर्ता है और न साधन। बावजूद इसके कांग्रेस के लिए सुकून वाली यह बात है जो दूरदराज के गांव में लड़के, बुढ़े बदलाव की बात करते मिले।

क्या है बदलाव? कैसे इसे परिभाषित करें? परंपरागत तौर पर बदलाव आर्दशवाद का परिपेक्ष्य लिए होता है। उसी से दिमाग परिवर्तन की चाहना बनाता है। बाद में इसे चेहरों, शख्शियत की धुरी पर सोचा जाने लगा। मगर मध्यप्रदेश में मैंने परिवर्तन की चाहना को रोटी और सब्जी के संदर्भ में सुना। एक गांव वाले ने कहां- ‘सात दिन भी अगर एक सब्जी खाए तो आठवें दिन दूसरी सब्जी जरूरत बन जाती है।‘ इससे पहले सुनने को मिला था कि ‘रोटी को समय-समय पर पलटते रहना चाहिए।‘

मतलब जिनके पास काम नहीं है या जो चिंताओं के मारे है वे खाली दिमाग परिवर्तन चाह रहे है। शिवराजसिंह चौहान के प्रति गुस्सा नही है। मगर हां, यह भाव है कि महाराज बहुत हुए पंद्रह साल! इस ऊब को शिवराज सिंह का धुआधार प्रचार काट पाएगा या नहीं, उनका करिश्मा इस बोरियत को खत्म कर पाएगा या नहीं यह चुनाव नतीजों से मालूम होगा। फिलहाल इतना समझे कि आम आदमी की परिवर्तन की चाहना रोटी, सब्जी की तुलना लिए हुए है तो इस आम आदमी के विभिन्न वर्गों के छोटे-छोटे तर्क भी है। जब पूछा कि किसलिए बदलाव, जब विकास है तो बदलाव क्यों या बदलाव की जरूरत आखिर है क्या?

बतौर जवाब एक किसान के इस वाक्य पर गौर करें- “शहर स्मार्ट शहर बन जाएंगे, और गांव और कंगाल होते जाएंगे तो हम क्या करेगें!  यह बात  हालातों की वजह से किसानी छोड़ कर आष्टा गांव में किराने की छोटी-सी दुकान पर काम करने को मजबूर एक किसाब की है। उसके इन शब्दों ने मुझे बेचैन किया। उसकी दर्दभरी आवाज मेरे विचारों को मंथती रही। मैं सोचती रही, आखिर क्या मतलब रहा होगा उसके यह कहने का?  

एक वक्त में मध्यप्रदेश देश के प्रमुख बीमारू राज्यों में गिना जाता था। आज, बिहार और उत्तर प्रदेश से आगे मध्यप्रदेश ने सहज रूप से विकास किया है और नई ऊंचाइयों को छुआ है। शहरों और गांवों को जोड़ने वाला सड़कों का विशालकाय नेटवर्क है। पूरे राज्य में बिजली है, जिससे घर-घर रोशन हुआ पड़ा है। लेकिन अब बिजली और सड़क से भी ज्यादा की भूख बदलाव को लेकर है, खासतौर से ग्रामीण इलाकों में।   

मध्यप्रदेश के ग्रामीण इलाकों की खाक छानने और हर तबके व उम्र के लोगों- नौजवानों, प्रौढ़ों और बुजुर्गों से बात करने पर उनके मन की सही तस्वीर खुलती है। जब आप शहरों से गांवों की ओर जाते हैं तो इंन्फ्रास्क्ट्रचर और सामाजिक बदलाव घटता जाता है। हालांकि सारे गांव सड़कों से जुड़े हैं, बिजली है, लेकिन गरीबी का चेहरा वही है।

मकान कच्चे-टूटे-फूटे से हैं, नालियां खुली और भरी पड़ी हैं, शौचालय नहीं हैं, अगर किसी ने बना भी लिए तो उनका इस्तेमाल भूसा रखने में हो रहा है। लोग अशिक्षित हैं, रोजगार है नहीं। काम के नाम पर सिर्फ कुछ लोगों के पास खेती है। इस तरह शहर और गांव के बीच एक बड़ी बनी खाई साफ नजर आ जाती है। 

और यही वह सबसे बड़ी वजह है जिससे शहरी और ग्रामीण मतदाताओं के रुख की खाई का भी पता चलता है। इसी फर्क ने शहरी और ग्रामीण मतदाताओं को बांटा है। बदलाव की इच्छा और कुलबुलाहट गांवों में ज्यादा मुखर है। बिजली, सड़क जैसी बुनियादी सुविधाएं हासिल होने के बाद गांव के लोग अब अपना उत्थान चाहते हैं, मानव विकास (जिसमें शिक्षा और स्वास्थ्य प्रमुख हैं) चाहते हैं, अपना सामाजिक विकास चाहते हैं। मध्यप्रदेश के ग्रामीण मतदाताओं में इस बात की समझ व पीड़ा साफ तौर पर देखी जा सकती है कि पंद्रह सालों में विकास हुआ लेकिन अब अटके पड़े है। इस जड़ता को, जहां का तहां पड़े रहने के भाव ने ग्रामीण मतदाता में बदलाव की आवाज बनवाई है।

एक वक्त हुआ करता था जब मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह चौहान बदलाव के लिए जनता के बीच एकमात्र चेहरा थे। उन्ही से बदलाव था। अब वह बात नहीं रही। लोग उन्हे सुन लेते है लेकिन उनका चुनाव में खड़ा उम्मीदवार उन्हे जस की तस दशा की याद करवाता है। लोग हताश हो चुके हैं। बार-बार एक ही मंत्री से (और अब उनके बेटों से भी), पुराने चले आ रहे उम्मीदवार से। ग्रामीण आबादी ऐसे पुराने चेहरों से उकता चुकी है। पर आधी आबादी याकि महिलाओं में वह भाव नहीं है। मध्यप्रदेश में महिलाओं की मुखरता कही नहीं मिली।  बात भी हुई तो शिवराजसिंह के प्रति नाराजगी या बदलाव का डॉयलाग सुनने को नहीं मिला। तभी उनका मौन, उनके संतोष की गुत्थी अलग है। मध्यप्रदेश के चुनाव बाकि चार राज्यों के चुनावों के मुकाबले निसंदेह अंहम है। भोपाल और शहरों में लगता है कि शिवराजसिंह चौहान का विकल्प नहीं है। पर हकीकत में भी लोगों में विकल्प वाली चिंता नहीं है। सिर्फ भभका सा है। वह यह कि बस बदलाव हो!  देखना है 28 नवंबर के मतदान में भभका वोट में कनवर्ट होता है या भभका, भभके की ही तरह हवा में उड़ा मिलता है। 

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