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बेरोजगारों का खाली दिमाग और बदलाव!

श्रुति व्यास
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भोपाल। मतदान में अब सिर्फ दो दिन बचे हैं। लेकिन मतदाता अभी भी संशय में है। बेचैन और बात करने से हिचकता हुआ। कुछ जगह लोग भयभीत भी दिखे। खुल कर अपनी राय जाहिर करने से बचते नजर आ रहे हैं। हालांकि ऐसे भी लोग मिल जाएंगे जो मौजूदा राजनीति से सहमत हैं और खुश भी और अपने नेताओं की तरफदारी कर रहे हैं। भोपाल, मध्य भारत, बुंदेलखंड घूमते हुए हर जगह मेहनत करनी पड़ी कि लोग चुप्पी तोड़े और बोले। माहौल में चुनावी चर्चा दबी हुई और बाहरी लोगों के सामने चुप्पी। तभी चाहे तो मध्यप्रदेश के चुनावी माहौल को नीरसता वाला करार दे सकते है। पर ऐसा भी नहीं है। यदि बात शुरू करे, दबी जुबां में चल रही चर्चा में शरीक हो लें, और जरा गांवों की ओर रुख कर, भरोसा बंधा बात करें तो पता चल जाएगा कि लोगों के मन में क्या उमड घुमड़ रहा है?  वे क्या सोच रहे हैं?  

प्रदेश में अलग-अलग भूगौल-जलवायु वाले सागर-दमोह से इच्छावार-आष्टा की लंबी घूमंतूगिरी में विभिन्न वर्गों से बातचीत से उभरा लेंडस्कैप आर्थिक चिंताओं, बेरोजगारी, नौजवान बैचेनी से भरा दिखा है। परिवर्तन की बात है तो मौजूदा सरकार के अलग-अलग चेहरों और खासकर स्थानीय उम्मीदवारों को ले कर बदलाव की बयार महसूस हुई। लोगों में व्यक्तिगत स्तर तक पर नाराजगी और चिंताओं के आलम बहुरंगी है। कुछ बानगी। 

दिन में कोई तीन बजे का वक्त। सागर का रहली विधानसभा क्षेत्र। पेड़ की छांव में बैठे नौजवानों का समूह ताश खेलने में व्यस्त है। वैसे ही कुछ दूर बुजुगों का एक समूह भी अपना एक अस्थायी ठिकाना बना पत्ते खेलने में मशगूल। जैसे ही इन लोगों ने हमें देखा तो ताश बंद कर दी, इन्हें लगा कि हम लोग सरकार से हैं कही ताश खेलते देख पूछताछ के लिए तो नहीं आए है। जब हमने चुनाव को लेकर बात शुरू की पूछा चुनाव का क्या मूड है, तो वे हैरानी से देखने लगे। लंबी चुप्पी और भारी मन से इनमें से एक व्यक्ति बोला- ठीक ही हैं। जब दुबारा सवाल कर लोगों के मूड पर जोर देते हुए पूछा तो एक ने पलट कर पूछा- क्या आप लोग चुनावी सर्वे करने आए है? हमने तुरंत कहा- नहीं। तब उसने पूछा- आप किस पार्टी से है? हमने बताया- हम पत्रकार हैं और दिल्ली से आए हैं, चुनावी मूड देखने-समझने की कोशिश में। 

यह सुनने के बाद इन लोगों के चेहरे से तनाव खत्म हुआ और खुले तो जवाब भी मिले। हर आदमी अपनी बात कहने लगा। बगल में जो बुजुर्ग ताश खेल रहे थे, वे भी आ गए और बातचीत में शामिल हुए। लब्बोलुआब यह निकला कि इन्होंने (भाजपा) काम तो किया, पर इस बार बदलाव होना चाहिए। यह पूछे जाने पर कि बदलाव योंहीं कैसे? कोई तो वजह होनी चाहिए। तब नंबर एक वजह सामने आई बेरोजगारी।

एक ने कहा- हम सब मजदूर हैं। सब इस गांव में मजदूरी करत हैं, पर काम नहीं है। और दूसरा बोला- अगर काम होता तो क्या हम दोपहर तीन बजे यहां आपसे बात करते होते?

अन्य शख्स ने कहां - मुझे गुजरात जाना पड़ा काम के लिए क्योंकि यहां पर कुछ काम नहीं है। मैं गुजरात से सिर्फ वोट करने आया हूं.... बाकी साथी भी आ रहे हैं। सब बदलाव चाहते हैं। 

इलाके में, गांव में विकास पर सबने कहां बहुत काम हुआ है लेकिन अगर लोगों के पास करने को काम-धंधा नहीं हो तो फिर ये कैसा अच्छा विकास है?   राजधानी के भोपाल शहर के गोविंदपुरा इलाके का बाजार। शाम के करीब सात बजे हैं। नौजवानों का जमावड़ा सा लगा है। ज्यादातर इंजीनियरिंग के छात्र हैं। इस ठिकाने ये शाम को चाय-पानी के लिए आ जाते हैं। मुलाकात ज्योतिरादित्य मिश्रा और गजेंद्र यादव से होती है। चुनावी मूड में क्या कुछ चल रहा है, से बात शुरू की तो लगभग ठीक वैसे ही जवाब मिले जैसे सागर,  रेहली के पाराशिया गांव में नौजवानों से सुनने को मिले थे। जब इन्हें हमने भरोसा दिलाया कि हम दिल्ली से आए पत्रकार हैं और चुनावों के बारे में नौजवानों की राय जानना चाहते हैं तो फिर बहुंरगी मगर एक पैटर्न को उभारते जवाब। यहां भी बदलाव को लेकर ध्वनि सुनाई दी। एक ने कहा- हम भाजपा (मोदी) के प्रशंसक हैं, लेकिन इस बार उन्हें वोट नहीं देंगे। गजेंद्र यादव ने धीरे से कहा- शिवराज सिंह चौहान के लोगों ने बहुत करप्शन किया है.. व्यापम, इ-टेंडर। निश्चित ही शहरी हल्कों और मध्यवर्गी युवा मतदातोँ में बदलाव की चाह के साथ भ्रष्टाचार के प्रति नाराजगी का पहलू है।  

कस्बों-गांवों की चुनावी घूमंतूगिरी के साथ यदि प्रदेश के स्थानीय पत्रकारों से तस्वीर बनाना चाहे तो फिर  मध्यप्रदेश के 2003  वाले चुनाव का हवाला मिलेगा । तबके चुनाव में स्थानीय मुद्दे और उम्मीदवार प्रमुख थे, आज पंद्रह साल बाद फिर वही स्थिति है। बेरोजगारी, बुंदेलखंड में जलसंकट, किसानों का असंतोष, भ्रष्टाचार के किस्से, मंत्रियों (जयंत मलैया, गौरी शंकर शेजवाल) की जनसंपर्क में बेरूखी, बदनामी के साथ स्थानीय स्तर के मुद्दे बदलाव की बात बनाए बने हुए हैं। मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में विकास की बात सब मानते है मगर उसके बावजूद लोग बह रहे है बदलाव की बयार में तो बुनियादी कारण लोगों का टाइमपास के मोड़ में होना है। शायद ऐसा काम- धंधों की चिंता और आर्थिकी के चलते ही है। (जारी)

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