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विदेश नीति: मोदी के जरिए क्या कुछ?

श्रुति व्यास
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किसी भी देश की विदेश नीति उसके नेताओं के विश्वास और माहौल के दबाव का मिलाजुला प्रतिबिंब होती है। लेकिन दुर्भाग्य से भारत की स्थिति हमेशा से ऐसी रही है कि जब दुनिया से रिश्ते बनाने की बात आती है तो हम कहीं न कहीं बचाव की मुद्रा में ही नजर आते हैं। हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कुछ हद तक इसे तोड़ा है। मोदी ने वायदा किया था कि भारत ऐसी ठोस और स्पष्ट विदेश नीति बनाएगा जिससे दुनिया में यह संदेश जाए कि भारत अब किसी से दब कर रहने वाला नहीं है। उस नाते यह सवाल अंहम है कि क्या चार साल में मोदी विदेश नीति के मोर्चे पर कामयाबी की कोई इबारत लिख पाए हैं?

अपने पूर्ववर्तियों से अलग, प्रधानमंत्री मोदी शुरू से ही विदेश नीति में ज्यादा राजनीतिक ऊर्जा डालने वाले रहे हैं। विदेश नीति को असरदार बनाने के लिए पूरी ताकत झोंकी है। उन्होंने निजी तौर पर सारे देशों की यात्राएं की और भारत में आए विदेशी मेहमानों का भी सत्कार खुद ही किया। विदेशी मामलों में उन्होंने व्यक्तिगत रूप से दिलचस्पी दिखाई, जरूरत के मुताबिक पूरा दखल रखा, बल्कि इतना कि एक तरह से विदेश मंत्री सुषमा स्वराज तो नाम की रह गईं तो विदेश राज्यमंत्री की भूमिका भी खुद प्रधानमंत्री तय करते हुए।  जाहिर है नरेंद्र मोदी इस बात को अच्छी तरह समझ कर काम करते रहे हैं कि कूटनीतिक छवि एक बड़ा हथियार होती हैष इसलिए इसी सोच के अनुसार वे निजी तौर पर कूटनीति में सीधे जुड इसे अंतरराष्ट्रीय संबंधों में सबकुछ खुद करते दिखे। तभी वे सीधे खुद विदेश नीति मामले में खुद जवाबदेह है। यह सवाल बनता है कि लीक से हटकर प्रधानमंत्री जिस कूटनीति के सहारे दुनिया में बढ़ रहे हैं, वह कहां तक खरी साबित होती है और दुनिया में भारत का कैसा जलवा बना है।

नरेंद्र मोदी मोदी ने चार साल में विदेश नीति को लेकर जो किया है, उसमें उपलब्धियां अपनी जगह हैं। उदाहरण के लिए मोदी के शासन में भारत-अमेरिका के रिश्ते मजबूत हुए हैं। सबसे पहले उन्होंने अपना कद बढ़ाते हुए जिस धुंआधार तरीके से अमेरिका की यात्रा की और फिर 2015 में गणतंत्र दिवस परेड के लिए बराक ओबामा को मुख्य अतिथि के रूप में बुलाया (और इस बार डोनाल्ड ट्रंप को भी बुलाया जा सकता है), वह सही दिशा में बड़ा कदम था। 

इससे पहले भारत के इतिहास में किसी अमेरिकी राष्ट्रपति को ऐसा सम्मान नहीं मिला था। और फिर इसके बाद उन्होंने उस बड़े कारोबारी समझौते को अंतिम रूप दिया जो वर्षों से अटका पड़ा था। इसके बाद सरकार और सक्रिय हुई। आस्ट्रेलिया, जापान और अमेरिका के साथ सामरिक, नौ-सुरक्षा वार्ता में भारत भागीदार बना। इसी तरह, फ्रांस के साथ मजबूत रिश्ते बने, खासतौर से पश्चिमी भारतीय महासागर में दबदबा बनाने की दिशा में यह बड़ा कदम रहा। 

इसके अलावा, जलवायु संकट के मसले पर फ्रांस सहित दूसरे राष्ट्रों के साथ मोदी कंधे से कंधा मिलाकर चले और ऐसा कर उन्होंने फ्रांस के युवा राष्ट्रपति इमेनुएल मैक्रां का दिल जीत लिया। इससे फ्रांस के साथ ऐसा रिश्ता कायम हो गया कि आतंकवाद, जलवायु संकट, टिकाऊ वृद्धि और विकास, बुनियादी क्षेत्र, शहरीकरण और विकास, विज्ञान, तकनीकी जैसे बड़े मुद्दों और क्षेत्रों में मिल कर काम करने की सहमति बनती गई। इसी तरह मध्यपूर्व में भी भारत की भूमिका बढ़ी है। 

पुराने रिश्तों ने नया रूप लिया, नेताओं की नई जमात आई और सबने भारत की लुक वेस्ट यानी पश्चिम की ओर देखो की नीति का स्वागत किया, और खासतौर से आज के भू-राजनैतिक परिदृश्य में यह ज्यादा महत्त्वपूर्ण है। तेल की दुनिया में अपना वर्चस्व रखने वाले छह अरब राष्ट्रों के साथ भारत के पुराने संबंधों को एक तरफ रखते हुए मोदी ने इजराइल को अपना दोस्त बनाया और मजबूत रिश्तों की नींव रखी। ईरान और फिलस्तीन जैसे मुद्दों को अलग रखते हुए, इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतान्याहू इस साल जनवरी में भारत आए और तमाम मुद्दों पर सकारात्मक रुख दिखाते हुए मिलकर काम का भरोसा दिया।

लेकिन पूरब में क्या रहा? इस पर भी विचार होना चाहिए। चीन और पाकिस्तान दोनों ताकत के रूप में उभरते रहे और मोदी के भारत को नजरदांज किया। सर्जिकल स्ट्राइक जनता की निगाह में तो भारत को सुपरमैन बना सकता है, लेकिन हकीकत कुछ और ही है, यह दुखदायी और पीड़ाभरी है। मोदी की ‘पड़ोसी पहले ’ वाली नीति क्षेत्र में बेअसर साबित हुई है। नेपाल, श्रीलंका और मालद्वीव में चीन की रणनीति का प्रभाव साफ नजर आ रहा है। मालद्वीव जैसे छोटे-से द्वीपीय देश में चीन ने पट्टे पर जमीन हासिल कर ली है और वहां अपना नौसैनिक अड्डा बना रहा है जो पाकिस्तान में चीनी नियंत्रण वाले ग्वादर बंदरगाह तक पहुंच बनाने का रास्ता होगा। अगर चीन इसमें कामयाब हो गया तो समंदर के रास्ते वह भारत की उसी तरह से घेराबंदी कर लेगा जैसे हिमालय में तिब्बत के जरिए कर रखी है।

कुल मिलाकर पड़ोस से होने वाले नुकसान का मोदी के पास कोई तोड़ नहीं है। भारत अपनी भौगोलिक परिस्थितयों का मारा है। ऐसे में दो ही रास्ते हैं। या तो अपनी क्षेत्रीय सुरक्षा को मजबूत करे और बड़ी भूमिका निभाने को आगे आए, या फिर पड़ोसियों के दबदबे का शिकार हो।

मोदी ने भारत की विदेश नीति में एक तरह से नई जान डाली है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय नीति को देख कर लगता है कि अभी भी इसमें दूरदृष्टि की भारी कमी है। कुछ राजनयिक पेतरे वाकई काफी सुलझे हुए हैं, लेकिन वे बहुत कुछ कर पाने में सक्षम नहीं है। इसी तरह बड़ी समस्या यह है कि सेना तो हमारे पास विशालकाय है, लेकिन उसके पास वक्त की जरूरत के हिसाब से हथियार नहीं हैं, दक्षिण एशिया के बाहर कोई सैन्य-रणनीति बनाने की सोच नहीं हैं।

प्रधानमंत्री ने अब तक जो किया है, वह पुरानी नीतियों पर ही चलते हुए नए कीर्तिमान बनाने की कोशिश है, कोई क्रांतिकारी बदलाव की हवा नहीं बनती नजर आ रही, जैसा कि दावा किया जा रहा है। अगर भारत को दुनिया की आर्थिक ताकत बनाना है तो मोदी को सबसे पहला ध्यान आर्थिक वृद्धि पर देना होगा। दुर्भाग्य से मोदी का मेक इन इंडिया अभी तक अमली जामा नहीं पहन पाया है, जबकि देश की जीडीपी में विनिर्माण क्षेत्र का हिस्सा कम होता जा रहा है।

इसलिए खुश कैसे हुआ जा सकता है? हमें एक ऐसा प्रधानमंत्री मिला है जो भारी-भरकम वादे करके सत्ता में आया था और देश को बड़े बदलाव के सपने दिखाए थे। हालांकि अब जैसे-जैसे वक्त निकलता जा रहा है, लोग समझ रहे हैं कि कोई बड़ा बदलाव नहीं आने वाला। चीजें तब बदलती हैं जब एक पीढ़ी उसमें अपने को खपाती है, लेकिन मोदी उस पीढ़ी को अपने बदलाव के अभियान में शामिल कर पाने में नाकाम रहे हैं। मतलब किसी क्रांतिकारी बदलाव में उनका भरोसा नहीं है।   

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