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तो अफगानिस्तान फिर गृह युद्व की ओर?

श्रुति व्यास
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अफगान संकट हल करने के लिए नियुक्त अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के विशेष दूत जालमे खालिजाद की भागदौड नतीजे के करीब पहुंच रही है। उन्होने छह दिन की वार्ता के बाद पिछले हफ्ते एलान किया कि तालिबान के साथ शांति वार्ता के लिए एक खाका है। उनकी बात माने तो देश से विदेशी फौज की वापसी के बदले में तालिबान ने भरोसा दिया है कि वह अफगानिस्तान की जमीन से किसी भी अंतरराष्ट्रीय आतंकी संगठन को हमले की इजाजत नहीं देगा। खालिजाद के इस एलान पर मिलीजुली प्रतिक्रियाएं सामने आईं। जो अमेरिकी कूटनीतिक तालिबान से बातचीत की कोशिशों में लगे थे और कामयाब नहीं हो पा रहे थे, वे खुश हुए है जबकि विदेश नीति के महारथियों को इसमें तमाम आशंकाएं नजर आ रही हैं। अफगानिस्तान के राष्ट्रपति गनी चिंतित हैं तो अंतरराष्ट्रीय समुदाय में इस कोशिश से बेचैनी स्पष्ट झलक रही है।

दरअसल, अफगानिस्तान से अमेरिकी फौज की वापसी (चाहे वह आंशिक तौर पर ही हो) को लेकर बराक ओबामा के समय से ही तमाम दावे-घोषणाएं की जाती रही हैं। लेकिन अभी तक इन घोषणाओं में गंभीरता की कमी झलकी रही ही है। मगर इस बार लगता है कि इस दिशा में कुछ ठोस हो सकता है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अब अफगानिस्तान से आधी अमेरिकी फौज हटाने पर आमदा हैं। इस वक्त अफगानिस्तान में करीब चौदह हजार अमेरिकी सैनिक तैनात हैं जिसमें से सात हजार सैनिकों की वापसी का ट्रंप इशारा कर चुके हैं। 

इसे ट्रंप का बड़ा कदम माना जा रहा है। हाल में एक ट्वीट में ट्रंप ने कहा भी था कि हम खालीफाओं के राज का पूरी तरह से खात्मा कर चुके हैं, लेकिन उन पर करीब से नजर रखे हुए हैं। अब वक्त आ गया है जब हमें घर को लौटना शुरू करना चाहिए, हमें अपने पैसे को सोच-समझ कर खर्च करना है।  

तभी सवाल है कि अगर अमेरिका सचमुच अफगानिस्तान से अपने सैनिकों को निकालना शुरू कर देता है तो खुद अमेरिका के लिए और अफगानिस्तान के लिए इसके क्या मायने हो सकते हैं? जवाब में खौफ और आतंक छिपा है। यह ऐसा वक्त है जब अमेरिकी फौज की वापसी की बात करना तो आसान है, लेकिन उसे अफगानिस्तान से हटाना उतना ही मुश्किलों भरा है। कोई शक नहीं कि अफगानिस्तान दशकों से युद्ध और आतंक की पीड़ा झेल रहा है। चालीस साल से अफगानिस्तान के लोगों ने न तो कभी खुशी देखी, न ही उसे महसूस किया। एक दिन भी सामान्य नहीं गुजरता वहां। पहले तो अफगानिस्तान सोवियत संघ (अब रूस) का शिकार हुआ और फिर तालिबान आ गया। 2001 के बाद अमेरिका ने पैर फंसाया और तालिबान का खात्मा करने का ‘ दावा‘ किया। तब लगने लगा था कि अब अफगानी लोग सामान्य जीवन जी सकेंगे। कुछ वक्त के लिए ऐसा होता दिखा भी। पश्चिम ने वादा किया था कि वह अफगानिस्तान को लावारिस छोड़ कर नहीं जाएगा, क्योंकि शीत युद्ध के दौरान सोवियत सेना को खदेड़ने के लिए मुजाहिद्दीनों का इस्तेमाल किया गया था। तब तक अफगानिस्तान पूरी तरह से जर्जर हो चुका था और आतंक के गढ़ में बदल चुका था। यही वह वक्त था जब अमेरिका पर अल कायदा का हमला हुआ था। इसलिए उसके खिलाफ कार्रवाई की सूरत में अमेरिका से उम्मीदें बहुत थीं।       

लेकिन 2003 में अमेरिका ने सद्दाम हुसैन का खात्मा करने के लिए अपने को इराक में उलझा लिया। इसका फायदा तालिबान ने उठाया। उसे लगा कि अफगानिस्तान में अब अमेरिका फंस गया है और उसका सारा जोर इराक पर है। इसका नतीजा यह हुआ कि अफगानिस्तान में तालिबान की वापसी होने लगी और जड़ें गहरी होती चली गईं। पाकिस्तान की खुफिया एजंसी आईएसआई ने हर तरह से तालिबान का साथ दिया और इस तरह तालिबान ने अफगानिस्तान की सीमाओं पर अपनी मजबूत पकड़ बना ली। इसके बाद तो तालिबान लड़ाकों ने आत्मघाती हमलों से जो कहर बरपाना शुरू किया तो वह आज तक जारी है। अफगानिस्तान को फिर गृहयुद्ध में धकेल दिया गया। आज हालात और विकट हैं। जिस हालत में अफगानिस्तान सत्रह साल पहले था, आज उससे भी बुरी हालत में पहुंच गया है। अब तो इस्लामिक स्टेट और अलकायदा दोनों ही अफगानिस्तान के लिए बड़ी और खुली चुनौती बन गए हैं। तालिबान अपनी पूरी ताकत के साथ अफगानिस्तान में अपनी पकड़ बनाए हुए है। आतंकी संगठनों की बमबारी और आत्मघाती हमले थमने का नाम नहीं ले रहे और लोगों के सर कलम करने की घटनाएं बदस्तूर जारी हैं। इसे देख लगता है कि आने वाले वक्त में अफगानिस्तान में स्थिरता के आसार नहीं हैं, जिससे अमेरिकी नीति-निर्माताओं और अंतरराष्ट्रीय समुदाय को थोड़ी राहत महसूस हो। सिर्फ अमेरिका ही नहीं, भारत, रूस, चीन और ईरान तक वहां स्थिरता चाहते हैं, सबके इसमें बड़े हित नीहित हैं, भारी निवेश है। अफगानिस्तान को आतंकियों के चंगुल से मुक्त कराना इसलिए भी जरूरी है ताकि क्षेत्रीय शांति और स्थिरता को कोई खतरा न बना रहे।  

और इन्हीं सबके बीच पाकिस्तान भी है। लंबे समय तक अफगान मामलों से जुड़े रहे अमेरिकी कूटनीतिक रिचर्ड हॉलब्रुक ने जो टिप्पणी की है, उसके गहरे अर्थ हैं। उन्होंने कहा-“ हम गलत देश में गलत दुश्मन से लड़ रहे लगते हैं।”   

पाकिस्तान अमेरिका के खिलाफ बहुत ही सफलता के साथ गोपनीय अभियान छेड़े हुए है। अमेरिका पाकिस्तान को रोक पाने में नाकाम इसलिए रहा है क्योंकि तीस साल पहले अफगानिस्तान में उसने भी आईएसआई की मदद से रूस के खिलाफ ऐसे ही अभियान चलाए थे। पाकिस्तान अब अपनी दोहरी नीति को छोड़ने वाला नहीं है। एक तरफ वह अमेरिका के साथ अफगानिस्तान में काम करता रहेगा, और दूसरी ओर तालिबान के साथ भी पूरी ताकत के साथ खड़ा रहेगा। अमेरिका भी पाकिस्तान को धमकाने की स्थिति में नहीं है। ट्रंप ने सत्ता में आने के बाद तालिबान को मदद देने के मामले में पाकिस्तान की सैन्य मदद में भारी कटौती की थी। लेकिन अब वह आतंकी संगठनों से वार्ता के मामले में पाकिस्तान के पदचिन्हों पर ही चल रहा है।

इसमें शक नहीं कि अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की वापसी को लेकर ट्रंप का जल्दबाजी भरा फैसला और तालिबान के साथ शांति-वार्ता में शामिल नहीं होने का अफगान सरकार का फैसला अफगानिस्तान को भारी पड़ सकता हैं, क्योंकि ऐसे में पाकिस्तान की गुपचुप मदद से तालिबान अफगानिस्तान की सत्ता पर फिर से काबिज हो सकते है। अमेरिकी सरकार की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछले तीन साल के दौरान  अफगानिस्तान के बड़े हिस्सों पर तालिबान की जबर्दस्त पकड़ बनी है। काबुल में चल रही सरकार का अब देश के मात्र छप्पन फीसद हिस्से प कब्जा रह गया है, जो कि 2015 में बहत्तर फीसद था।    

अफगानिस्तान की सत्ता पर तालिबान की पकड़ जिस तरह मजबूत होती जा रही है उससे साफ है कि आने वाले दिनों में अफगानिस्तान के टुकड़े भी हो सकते हैं, देश जातीय हिस्सों में बंट सकता है, उस पर आतंकी गुटों का कब्जा हो सकता है और इन सबका नतीजा देश में भयानक खून-खराबे और गृह युद्ध के रूप में सामने आएगा। ऐसे में ट्रंप और उनके सहयोगियों को समझना चाहिए कि अगर आज अमेरिका अपनी फौज हटा लेता है तो इसका मतलब होगा कि अफगानिस्तान को तालिबान के हाथों में सौंपना और फिर वहां तालिबान का जो क्रूर शासन चलेगा वह एशिया की क्षेत्रीय शांति के लिए भी खतरा बनेगा।  

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