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महारानी की आभा और जनता का मूड

श्रुति व्यास
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जयपुर। मध्यप्रदेश और राजस्थान में चुनाव का फर्क लीडरशीप से है। राजस्थान में मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे लोगों में महारानी वाली धमक लिए हुए है लेकिन बिना अपनेपन के व जन आक्रोश के साथ। वहीं मध्यप्रदेश में शिवराजसिंह चौहान के प्रति संतोष व अनुराग बावजूद इसके बदलाव की चाह। झालावाड़ के अपवाद को छोड़े तो लगभग हर जगह वसुंधरा राजे की वजह से ही बदलाव का हल्ला है। झालावाड और उसकी झालरापाटन का मतलब वहीं समझ आया जो अमेठी या रायबरेली के लिए सोनिया गांधी, राहुल गांधी का है। तभी इस चुनाव में भी वसुंधरा राजे सिर्फ नामांकन पत्र भरने के वास्ते एक दफा झालावाड गई। बतौर स्टार कैंपेनर जरूर गृह मंत्री राजनाथसिंह की एक सभा हुई। अन्यथा झालरापाटन में वंसुधरा राजे के बेटे दुष्यंत और उनकी पत्नी के ही जिम्मे दारोमदार है। उनसे जब पूछा क्या जीत मजे से होगी? तो जवाब था निश्चित ही!  क्या ऐसे ही राजस्थान में भी जीतेगे? दुष्यंतसिंह के जवाब में बल हल्का लगा। हां, हां, जीतेगे। 

झालरापाटन बनाम राजस्थान में जीत के आत्मविश्वास वाला फर्क सभी तरफ घूमते हुए दिखलाई दिया। राजनैतिक कार्यकर्ताओं के बीच सीटवार जीत-हार का अनुमान अलग तरह का तो प्रदेश स्तर की जीत-हार में मूड अलग तरह का। 

दो दिसंबर को दौसा के लालसोट में वसुंधरा राजे की जनसभा थी। लोग भाजपा के उम्मीदवार को ले कर उत्साह में थे। बावजूद इसके मुख्यमंत्री के लिए आई भीड़ में जो जोश होना चाहिए था वह नहीं दिखा।  मंच पर स्थानीय नेताओं का वसुंधरा राजे की तारीफ का रैला था लेकिन तालियां नहीं। वे हेलिकोप्टर से उतरी। कोई बीस मिनट भाषण दिया। बतौर महारानी उनके आभामंडल पर लोग मुग्ध दिखे लेकिन बतौर मुख्यमंत्री काम की तारीफ करते हुए नहीं मिले। 

लालसोट की ही चाय चर्चा पर गांव वालों ने कहा हम तो भाजपा उम्मीदवार रामबिलास मीणा को जीता रहे है। वह जीतेगा। तब तो वसुंधरा राजे की ही सरकार बनाएगे? तड़ाक से भीड़ के बीच चंपालाल ने कहा, नहीं हम राम बिलास को वोट देंगे लेकिन हम चाहते हैं कि अशोक गहलौत मुख्यमंत्री बने। और इस बात की फिर चंपालाल के इर्द-गिर्द खड़े लोगों ने ताकीद की। 

इसी तरह जयपुर के बाहर गुर्जर बहुल डुबली गांव में व्यक्तिगत स्तर पर उम्मीदवार विशेष की जीत के लिए लोग बोलते मिले। मगर प्रदेश स्तर पर सचिन पायलट को मुख्यमंत्री चाहते हुए।  

अलग-अलग उम्र की सभी जातियों के लोगों, पुरूष और महिलाओं से बात करते हुए लगा कि बदलाव की चाहना वैसी ही है जैसे मध्यप्रदेश में दिखी। फर्क यह है कि वसुंधरा राजे से लोग संतुष्ट नहीं है तो शिवराजसिंह से लोग संतुष्ट दिखलाई दिए। 

जाहिर है शिवराजसिंह अपने पूरे कार्यकाल में अपना चेहरा लोगों के बीच पहुंचाए हुए थे वहीं वसुंधरा राजे ने साढ़े चार साल के कार्यकाल में अपने आपको अद्श्य, निष्क्रिय बनाए रखा, इन चर्चाओं के साथ कि वे सबकी पहुंच से दूर है और उनका प्रशासन व उनके अफसर जन प्रतिनिधियों व जनता से कटे हुए। हांलाकि अगस्त 2018 में गौरव यात्रा के जरिए वसुंधरा राजे ने जनता के बीच जा कर और हाल में चुनावी विज्ञापनों में अपने चेहरे को लोगों में पैंठाना चाहा। वे उपचुनावों में हार के बाद अपने आपको जनता के बीच का मुख्यमंत्री जतलाने के लिए सक्रिय हुई। बहुत मेहनत की लेकिन वह सक्रियता साढे चार साल परकोटे में बंद रहने की बेकग्राउंड से लोकप्रियता में नहीं बदली।  

संदेह नहीं कि साल पहले राजस्थान में बदलाव का जो जन भभका था, लोगों का जो माइंड सेट था उसके हल्के बनने की बात हर कोई कह रहा है। बीस दिन पहले जो मूड था वह इस सप्ताह में भी बदला है। प्रदेश के मूड में फिलहाल अलग-अलग राय मिल रही है। भीड के चेहरों से माहौल में अनिश्चितता, कंफ्यूजन और अजीब मौन झलकता है। 

मूड का भला ऐसे बदलना क्यों? जयपुर के सियासी पत्रकारों से ले कर चाय की चर्चाओं में सर्वोपरी नंबर एक कारण कांग्रेस के टिकटों का गड़बड़झाला है। कुछ लोगों के अनुसार नरेंद्र मोदी की जनसभाओं का असर है। मोदी ने माहौल बदला है। ऐसा है या नहीं, इस पर जितने मुंह उतनी बात। इतना निश्चित है कि पंद्रह दिनों में जो हुआ है उसका लाभ निश्चित ही वसुंधरा राजे को है। वसुंधरा राजे मुकाबले मे आ गई है क्योंकि जन धारणाओं में मूड को कमांड करने की स्थिति में भाजपा को माने जाने लगा है। मगर क्या दस-पंद्रह दिन में बदलते-बनते मूड से मतदाताओं का फैसला हुआ करता है? 

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