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ऐसा खौफ पहले कभी नहीं दिखा

श्रुति व्यास
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हर चुनाव एक कहानी कह जाता है। चुनाव की कहानी आगे की नई कथा, नए नैरेटिव की शुरुआत का विचार दे जाती हैं। नई कथा या तो बदलाव के लिए हो सकती है, या फिर पुराने ढर्रे की निरंतरता लिए होती है। 2013 में मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, दिल्ली और मिजोरम के विधानसभा चुनावों में जो परिदृश्य, जो खांका बना था, वह 2014 की नई जमीन लिए था। उसका उत्साह, उमंग प्रधानमंत्री पद के लिए नरेंद्र मोदी के आभामंडल को चमचमाते हुए उनकी उम्मीदवारी को पुख्ता बनाने वाला था। तब सरकारे राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में बनी थीं लेकिन आभामंडल नरेंद्र मोदी का खिला था। वे वादों और उम्मीदों से भरे नजर आ रहे थे। तब नरेंद्र मोदी उम्मीद बने और उम्मीदें मोदी! तब उन्हें सुनने को लेकर, उनके विचारों को लेकर, जुमलेदार शब्दों और लच्छेदार भाषा को लेकर लोगों में उत्सुकता उमड़ पड़ती थी। उन्हे सुनने लाखों लोग उनकी ओर खिंचते चले जाते थे।             

सो नरेंद्र मोदी तब थे मूड, लोगों का मूड!

और आज, उस लिहाज से देखे तो वह मूड बदला हुआ है, उसी परिपेक्ष्य, परसपेक्टीव में।

सिर्फ मध्यप्रदेश और राजस्थान में घूमने पर ही पता चल गया कि इस बार विधानसभा चुनावों के इर्दगिर्द, उसकी धुरी पर जो मूड बना है, वह एक-सा ट्रेंड बनाने वाला है। निसंदेह लोगों का मन बंटा हुआ है। बुजुर्गों, किसानों और रिटायर लोगों व कारोबारियों का सत्ता से मोह भंग हो चुका है, उनमें सरकारों के प्रति गुस्सा साफ देखा जा सकता है। जबकि नौजवानों, उत्साहित छात्र और बेरोजगार नौजवान अभी भी प्रधानमंत्री के  ‘काम’ जैसे शब्दों से खिंचे चले जा रहे थे। इनके बीच महिलाएं मौन दिखीं। लेकिन गुस्से, मोह-उत्साह और चुप्पी के अलग-अलग भाव के बीच झलका एक अजब सा खौफ। डर का मनौविज्ञान।     

मध्यप्रदेश में इच्छवार से कुछ किलोमीटर पहले कुछ बुजुर्गों और किसानों से मुलाकात हुई थी। चुनावों और नेताओं के बारे में बातचीत के लिए इनमें न कोई उत्साह था, न किसी तरह की दिलचस्पी दिखी। इनमें से एक ने कहा- अगर हमारी हालत बिगड़ी नहीं है तो सुधरी भी नहीं। समस्याएं वैसी की वैसी ही बनी हुई हैं। बिजली-पानी है नहीं, न फसलों के दाम मिल रहे हैं, कर्ज बढ़ता जा रहा है। 

और यहीं बात खत्म हो जाती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी या मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के नाम का जिक्र भी इनसे कुछ बुलवा नहीं सकता।

और सिर्फ किसान ही नहीं हैं। स्थानीय कारोबारी, सड़क किनारे खड़े ठेले वाले, पान वाले, सरकारी मुलाजिम, सभी की एक-सी हालत में है। अपनी बात कहने में सब हिचकिचाते दिखे। मैंने जयपुर में मोदी की जनसभा के बाहर अपना खोमचा लगाए चने वाले से पूछा- काम कैसा चल रहा है। उसने कहा-“ सब, ठीक चल रहा है। पहले आठ सौ बना लेते थे, अब दिन का तीन सौ बन जाता है।” मैंने पूछा- ऐसा क्या हुआ? तभी वह वहां से उठा, और दूसरी जगह के लिए रवाना हो लिया। ऐसे में आप भी वहां से चल देने को मजबूर।

लोगों के मूड को भांपना आज कोई आसान काम नहीं रह गया है। अगर आप किसी भी राजनीति या उनके नेताओं के बारे में बात करने की कोशिश करें, कुछ जानना चाहें तो मुस्कुराते हुए लोग एक-सा ही जवाब देते हैं- सब अच्छा है। लेकिन आप ये पूछ लें कि- क्या सब अच्छा है तो आपको चुप्पी के अलावा कोई जवाब नहीं मिलने वाला, इस डर से कि सामने वाला कहीं कुछ और पूछ बैठे।  

नौजवान लड़के और पुरुष अभी भी मोदी के मोह से मुक्त नहीं दिखते। बातचीत में ये लोग कहते भी हैं कि दुनिया में मोदी छा गए हैं। लेकिन आप मोदी सरकार के काम और उनकी नीतियों के बारे में बात छेड़ दें तो सब मुंह बंद कर लेते हैं और इतना ही कहते मिलेंगे कि सब अच्छा है।   

कोई शक नहीं कि इस बार विधानसभा चुनाव में एक तरह की खौफ से उपजी चुप्पी देखने को मिली। राजस्थान जैसे प्रदेश में स्थानीय स्तर तक पर लोग जहां चुप नहीं रहते, वहां भी गजब का मौन लोगों में दिखा। और खौफ भरी चुप्पी नरेंद्र मोदी की रैलियों और सभाओं में भी साफ दिखलाई दे रही थी।

चार दिसंबर को मोदी की जयपुर में एक सभा थी। सूरज ढलने को था। मंच रोशन हो चुका था। भीड़ जमा हो चुकी थी, शोर पूरा था। जैसे नरेंद्र मोदी का काफिला बढ़ रहा था, भीड़ बढ़ती जा रही थी, मंत्रियों की सांसे फूलने लगीं थीं। जैसे ही प्रधानमंत्री मंच पर पहुंचे, सूरज की आखिरी किरण भी ओझल हो चुकी थी। कैमरे तेजी से मोदी की ओर घूम रहे थे। चारों ओर लगी भारी-भरकम लाइटों की रोशनी में मंच डूबा हुआ था। जयपुर के विद्याधरनगर का यह स्टेडियम उन्मादी भीड़ से भर गया था। एक केंद्रीय मंत्री के निर्देश पर कैमरे की लाइटें मंच की ओर से घुमा दी गईं और पूरी तरह डिजिटल तरीके से मोदी की अगवानी हुई। पांच साल बाद जैसे किसी महानायक का आना हुआ और मोदी की तारीफ में कसीदे पढ़े जान लगे। लगा मोदी के लिए 2018 के ये विधानसभा भी वैसे ही अपराजेय हैं जैसे 2014 के बाद के अन्य विधानसभा चुनाव। वे अभी भी स्टार प्रचारक हैं जिनके नाम से मतदाता खिंचे चले आते हैं।

लेकिन हकीकत में लोगों का मनोभाव बदला हुआ है। मोदी के नाम पर भीड़ में पहले जो उत्साह हुआ करता था, वह अब खत्म सा हो चुका है। जैसे ही वे बोलना शुरू करते हैं, उसे सुनते ही लोगों का उत्साह खत्म हो जाता है। बार-बार एक ही भाषण, एक ही बात को सुनना लोगों को हजम नहीं होता। इसलिए लोग ध्यान भी नहीं देते। अलवर से जयपुर तक मोदी की सभाओं में जो भीड़ कम होती गई, उसकी वजह यही थी कि लोग मोदी के भाषणों के उकता चुके थे। भाषण के बीच में से ही लोग चल दे रहे थे। अगर उनसे इस बारे में पूछा जाता तो लोगों का एक ही जवाब होता- अगर जल्दी नहीं निकले तो ट्रैफिक में फंस जाएंगे।  क्या यही वजह या वाकई खौफ जो जवाब से कन्नी काटना? या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लोगों के मन से उतर चुके हैं?     

इस बार के विधानसभा चुनावों ने जनमानस की एक नई इबारत लिखी है। इस बार लोगों के मन में एक मौन भय व्याप्त रहा। ऐसा डर जो शायद ही पहले कभी दिखा हो। यह खौफ इस बात को लेकर था कि अगर सरकार के खिलाफ कुछ भी बोल दिया, अपनी नापसंद बताई तो ऊपर तक खबर पहुंचेगी। डर इस बात को लेकर था कि अगर आक्रोश या राजनीतिक पसंद-नापसंद को जाहिर कर दिया तो इसकी सजा मिलेगी। 

सचमुच गांवों से लेकर शहरों तक में मोदी के भारत की राजनीति तक में यह खौफ समाया हुआ है। सवाल है कि यह खौफ चुपचाप गुस्से में बदलता है या फिर इससे और ज्यादा भय बनेगा? आज  11 दिसंबर के दिन नतीजे बताएंगे कि क्या होना है?  निसंदेह इस चुनाव की कहानी 2019 के लोकसभा चुनावों के महाभारत की तस्वीर का खांका लिए हुए होगी। 

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