Loading... Please wait...

जात ही पूछो भगवान की!

विवेक सक्सेना
ALSO READ

जब हनुमान जी के वनवासी व आदिवासी होने के बारे में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी का बयान पढ़ा तो थोड़ा आश्चर्य हुआ। मैं हनुमानजी का भक्त हूं और पत्रकारिता में रहते व काम करते हुए मुझे दशकों से लग रहा था कि आज तक किसी ने उनकी जाति क्यों नहीं बनाई? अब सबने बयानबाजी शुरू कर दी है जबकि मेरा मानना है कि यह काम तो बहुत पहले ही शुरू कर दिया जाना चाहिए  था। अब मुझे इंतजार इस बात का है कि गणेशजी को लोग क्या कहते हैं? 

असल में हम लोगों खासतौर पर हमारे नेताओं का यह अवगुण है कि वे जाति, धर्म से बाहर जा कर कुछ नहीं देखते। बस फिर क्या था सिलसिला शुरू हो गया। लखनऊ में दलित उत्थान के बैनर तले कुछ लोगों ने हनुमान सेतु सहित बजरंगबली के मंदिरों पर हक जताया। वे यह नाम लिखी हुई तख्तियां लिए थे कि दलितो के देवता बजरंगबली का मंदिर हमारा है। इससे पहले भी हनुमानजी की जाति को लेकर चुटकुले बनते रहते थे। एक चुटकुले के मुताबिक एक बार उनके धर्म को लेकर कुछ लोगों में विवाद हो गया। एक मुसलमान उन्हें अपने धर्म का बताते हुए कह रहा था कि अली, सुलेमान सरीखे नाम मुसलमानों के ही होते हैं मगर वहां मौजूद एक जाट ने उसको काटते हुए कहा कि वे निश्चित तौर पर जाट थे। वजह पूछे जाने पर उसने कहा कि बीबी राम को और उसे उठा कर ले गया रावण। फिर भी वे अपनी पूंछ जलवाने के लिए श्रीलंका चल पड़े। इस तरह का काम कोई जाट ही कर सकता है। 

हरियाणा के एक जाट ने चुटकुला सुनाया कि एक बार किसी जाट को पूजा-पाठ का शौक चर्राया। उसने अपने घर में जहां भैसो को बांधते थे वहां एक हनुमानजी की मूर्ति स्थापित कर दी। एक दिन वह अपनी भैस को लेकर आया और उसने उसकी रस्सी उनकी दंदी वाली टांग के घुटने में बांध दी। भैंस ने कुछ समय इंतजार किया और फिर मूति से अपना शरीर रगड़ा और उन्हें उखाड़ कर चल पड़ी। हनुमानजी भी मिट्टी में लिपटते हुए खिचने लगे। रास्ते में लक्ष्मी का मंदिर पड़ा और वह उनकी यह हालात देखकर हंसने लगी। इस पर हनुमानजी ने कहां हंस ले, हंस ले, वह तू किस्मत वाली है कि बनियो के पल्ले पड़ी। जाटों के पल्ले पड़ी होती तो पता चल जाता।

असल में मेरा मानना है कि हमें इस देश में जन्म से ही संस्कार दिए जाते हैं कि हम लोग अपनी जाति व धर्म के बाहर जाकर देखना व सोचना ही पसंद नहीं करते हैं। हिंदू धर्म की एक सबसे बड़ी विडंबना यह है कि इससे आप जाति व धर्म के बिना न ही जीवन बिता सकते हैं और न ही मर सकते हैं। परिवार में बच्चे के पैदा होते ही उसके व उससे जुड़े धार्मिक संस्कार शुरू हो जाते हैं। उसकी जन्म कुंडली बनाई जाती है जिसमें उसका गोत्र, जाति और भाग्य लिखा जाता है। 

पहले तो हर जाति में किशोरावस्था में जनेऊ होता था। अब वह बंद होता जा रहा है। आज भी जन्मपत्री मिलाए बिना शादियां नहीं होती व दोनों की जाति व गोत्र मिलाए जाते हैं। कुछ मामलों में तो एक ही गोत्र में शादियां नहीं होती हैं जैसे कि जाट इस मामले में काफी आगे हैं। विवाह करते समय भी लोग अपनी ही जाति में शादी करना ज्यादा पसंद करते हैं। अगर जाति व गोत्र नहीं मिलती तो भी धर्म तो मिलना ही चाहिए। 

आज भी घर में पूजा के समय ग्राम देवता के बारे में पूछ कर उनका सम्मान करते हुए पूजा की जाती है। और तो और कोई हिंदू मर कर भी इस व्यवस्था से अलग नहीं हो सकता हे। उसके अंतिम संस्कार भी उसके व्यक्तिगत गोत्र के मुताबिक होते हैं। जब मैं अपनी सास व ससुर के अंतिम संस्कारों के सिलसिले में हरिद्वार गया तो वहां उनके पारिवारिक पंडे एक अन्य पंडे के पास ले गए जिसने कि उनके परिवार का कई पीढि़यो का ब्यौरा तैयार कर रखा था। लंबी-लंबी कापियों में उसने लिख रखा था कि उनके परिवार का कौन सा व्यक्ति वहां कब व क्या करने आया व उसके परिवार के हर सदस्य का ब्यौरा था। 

मतलब कि यह सिलसिला तो सदियो से चला आ रहा है। मुझे याद है कि हमें तो पहली कक्षा से ही इस सबके बारे में पढ़ाया जाता रहा है। पहली कक्षा से ही प्राचीन पचतंत्र की कहानियां जाति व्यवस्था से भरी पड़ी थी। उनमें पढ़ाया जाता था कि एक गरीब ब्राह्मण और एक लालची बनिया था, एक झगड़ालू ठाकुर था मतलब यह कि हमें जाति के जरिए ही सिखाया जाता था कि किस जाति में जन्में व्यक्ति का व्यवहार कैसा होता है। जब और बड़ा हुआ तो दसवीं कक्षा में हिंदी के लेखक व कवियों की जानकारी देने वाली शैली पढ़ाई जाने लगी। इसमें स्पष्ट रूप से उनकी जाति का जिक्र किया जाता था। 

अब संभवतः यह बंद कर दिया गया है। जब स्कूल गया तो देखा कि वहां छात्रों की हाजिरी दर्ज करने वाले रजिस्टर के एक हिस्से में तमाम जातियां लिखी होती थी जिनकी फीस या तो माफ कर दी जाती थी या आधी ली जाती थी। जब पत्रकारिता में आया तो देखा कि हमारे राजनीतिक दल भी धार्मिक व जातीय आधार पर बंटे हुए हैं। जैसे कि कभी मुस्लिम लीग मुस्लमानों की पार्टी मानी जाती थी। आज वह ओवैसी की पार्टी एआईएमएम कर रहा है। जबकि तमाम उत्तर भारतीय दल खुलकर जातिवाद का प्रचार करते हैं। 

भाजपा को व्यापारियों या बनियों की पार्टी माना जाता है तो कांग्रेंस को कभी ब्राह्मण, दलित व मुसलमानों की पार्टी माना जाता था। सपा को यादवों की पार्टी माना जाता है तो मायावती बड़ी गर्व के साथ अपनी पार्टी को दलितो की पार्टी बताती है। एक बार जब मैं उनकी पार्टी के सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए लखनऊ गया तो मायावती ने मंच से बसपा के कार्यकर्ताओं को होशियार करते हुए उनसे कहा कि तुम लोग राम विलास पासवान से संभल कर रहना। मैं उसे उत्तर प्रदेश में पैर नहीं रखने दूंगी। तुम लोगां को बता दूं कि वह जाटव नहीं बल्कि मुसहर है। बिहार में मुसहर अपने को पासवान लिखते हैं। जानते हो मुसहर कौन होते हैं। ये वे लोग होते हैं जो कि चूहा मार कर रखते हैं। 

सच कह दूं कि मैं इससे पहले यही सोचता था कि सारे दलित एक होते होंगे मगर वहां मुझे और भी झटका लगा। जबकि बिहार के विधानसभा चुनाव से पहले मुख्यमंत्री नीतिश कुमार ने दलितो में बंटवारा करने के लिए महादलितों की खोज कर ली। अकाली दल को सिखो की पार्टी माना जाता है तो राजा भैया से लेकर अमरसिंह तक ठाकुरो की राजनीति कर रहे हैं व किसान नेताओं चौधरी चरण सिंह व देवीलाल के बेटे अब जाटों की राजनीति तक सीमित होकर रह गए हैं। इनेलो व लोकदल को जाटों की पार्टी माना जाता है। 

दक्षिण में यही विभाजन द्रमुक व गैर-द्रमुक पार्टियो के बीच में हुआ है। हमने तो रामचरित मानस व रामायण सरीखे महान ग्रंथो के लेखको के साथ भी जाति के आधार पर भेदभाव किया। हमने भगवानों तक को नहीं बख्शा। हिंदुओ के सबसे बड़े भगवान माने जाने वाले राम को ठाकुर माना जाता है। उन्होंने जिस रावण का वध किया था वह ब्राह्मण था और जब उन्होंने इसका प्रायश्चित करने के लिए अयोध्या में यज्ञ का आयोजन किया तो उनके द्वारा की गई इस ब्रह्म हत्या के कारण देश के तमाम ब्राह्मणों ने उसमें जाने से मना कर दिया। जो ब्राह्मण किसी डर या लालच में वहां गए उन्हें सरयूपारी ब्राह्मण कहा जाने लगा व आज भी जहां उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों व ठाकुरो के बीच टकराव चला आ रहा है। 

वहीं शादी विवाह की दृष्टि से तमाम ब्राह्मण अपने को सरयूपारी ब्राह्मणों से अच्छा मानते। चित्रगुप्त कायस्थ थे व आज भी दीपावली के बाद कायस्थ उनकी पूजा करते हैं। गौतम बुद्ध को तो जाति व्यवस्था के चलते अलग राह पकडनी पड़ी। आज दलित अपने नाम के साथ बौद्ध लिखते हैं व भारत में उनके पैदा होने व ज्ञान हासिल करने में दक्षिण एशियाई देशों में यह धर्म फला-फूला। जब कुछ साल पहले आर्य समाजियों ने मुसलमान बने दलितो से धर्म परिवर्तन करवाया तब मैंने नेताओं से यह पूछा था कि आपने उन्हें हिंदू तो बना दिया मगर उनकी जाति क्या है तो वे लोग बगले झांकने लगे। लगा जाति के बिना सब सून्न।

225 Views

बताएं अपनी राय!

नीचे नजर आ रहे कॉमेंट अपने आप साइट पर लाइव हो रहे है। हमने फिल्टर लगा रखे है ताकि कोई आपत्तिजनक शब्द, कॉमेंट लाइव न हो पाए। यदि ऐसा कोई कॉमेंट- टिप्पणी लाइव हुई और लगी हुई है जिसमें अर्नगल और आपत्तिजनक बात लगती है, गाली या गंदी-अभर्द भाषा है या व्यक्तिगत आक्षेप है तो उस कॉमेंट के साथ लगे ‘ आपत्तिजनक’ लिंक पर क्लिक करें। उसके बाद आपत्ति का कारण चुने और सबमिट करें। हम उस पर कार्रवाई करते उसे जल्द से जल्द हटा देगें। अपनी टिप्पणी खोजने के लिए अपने कीबोर्ड पर एकसाथ crtl और F दबाएं व अपना नाम टाइप करें।

आपका कॉमेट लाइव होते ही इसकी सूचना ईमेल से आपको जाएगी।

© 2018 ANF Foundation
Maintained by Quantumsoftech